scriptwhen Media questioned for its role in 26/11 mumbai Attack | मीडिया और वो अधिकारी जो 26/11 के बाद देश की सुरक्षा को खतरे में डालने के लिए चर्चा में आए थे | Patrika News

मीडिया और वो अधिकारी जो 26/11 के बाद देश की सुरक्षा को खतरे में डालने के लिए चर्चा में आए थे

मुंबई हमले ने तत्कालीन भारत सरकार को आतंकवादी गतिविधियों के खिलाफ सख्त एक्शन लेने के लिए मजबूर कर दिया था। उस समय पूरी दुनिया में इस हमले की निंदा की गई थी, परंतु उस समय कुछ ऐसे भी खुलासे हुए जिसने मीडिया की भूमिका के साथ ही कुछ बड़े अधिकारियों की लापरवाही पर सवाल उठाए थे।

नई दिल्ली

Published: November 26, 2021 06:23:29 pm

आज मुंबई हमले को 13 वर्ष पूरे हो गए। आज से 13 वर्ष इसी दिन 2008 में पाकिस्तान के 10 आतंकियों ने मुंबई को चार दिनों तक एक के बाद एक हमले से दहला दिया था। आतंकियों ने सपनों की नागरी में ताज होटल, नरीमन हाउस, मेट्रो सिनेमा और छत्रपति शिवाजी टर्मिनस समेत कई जगहों पर हमला किया था। इस हमले में 15 देशों के 166 लोग मारे गए थे और 300 से अधिक लोग घायल हुए थे जबकि आतंकियों के खिलाफ जंग में मुंबई पुलिस, होमगॉर्ड, ATS, NSG कमांडों सहित कुल 22 सुरक्षाबल शहीद हो गए थे।
mumbai-attack 26/11 Media
इस हमले ने तत्कालीन भारत सरकार को आतंकवादी गतिविधियों के खिलाफ सख्त एक्शन लेने के लिए मजबूर कर दिया था। उस समय पूरी दुनिया में इस हमले की निंदा की गई थी, परंतु उस समय कुछ ऐसे भी खुलासे हुए जिसने मीडिया की भूमिका के साथ ही कुछ बड़े अधिकारियों की लापरवाही पर सवाल उठाए थे। आइए जानते हैं विस्तार से..
मीडिया की लापरवाही

पूरी दुनिया में संकट के समय में मीडिया और पत्रकार आम जनता तक किसी भी घटना की जानकारी पहुंचाते हैं। आतंकवादी हमले या किसी को बंधक बनाए जाने की स्थिति में मीडिया की भूमिका जटिल हो जाती है। 9/11 हो या 7/7 को लंदन में बमबारी के बाद की कवरेज के मामले हो मीडिया ने संभलकर जनता तक सूचनाएँ पहुंचाई हैं, परंतु 26/11 के समय ऐसा नहीं हुआ। मुंबई हमले के समय पत्रकारों से लेकर मीडियाकर्मी तक दुर्घटनास्थलों के पास पहुंचने के प्रयास कर रहे थे। तब राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड के प्रमुख जे.के. दत्ता के साथ भी कुछ मीडियाकर्मी खड़े पाए गए थे। ये मीडिया पर प्रसारित होने वाली खबरें ही थीं जिससे आतंकियों को पता चला था कि ओबेरॉय होटल तथा यहूदी चबाड हाउस की छतों पर हेलीकॉप्टर उतारने के प्रयास किये जा रहे थे। आतंकियों को सुरक्षाबलों के हर एक्शन की खबर मिल रही थी। जब सरकार को ये पता चला कि पाकिस्तान में बैठे आतंकियों के आका न्यूज चैनल देखकर आतंकियों को निर्देश दे रहे हैं तब चैनल के लाइव प्रसारण पर रोक लगा दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने 26/11 के आतंकवादी हमलों पर एक सुनवाई के दौरान लाइव कवरेज के लिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को लताड़ भी लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ऐसा करके भारतीय टीवी चैनलों ने राष्ट्रीय हित को किनारे कर दिया।
जस्टिस आफताब आलम और सी के प्रसाद की पीठ ने कहा था कि 'टीवी चैनलों द्वारा लाइव दिखाए जाने वाले दृश्यों को सभी आतंकवादियों के निष्प्रभावी होने और सुरक्षा अभियान समाप्त होने के बाद भी दिखाया जा सकता था। परंतु मीडिया ने ऐसा नहीं किया क्योंकि उन्हें टीआरपी रेटिंग के बड़े शॉट लगाने थे। ऐसी परिस्थितियों में ही किसी संस्था की विश्वसनीयता की परीक्षा होती है। मुख्यधारा की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा मुंबई आतंकी हमले की कवरेज ने इस तर्क को मजबूत किया है कि मीडिया को भी रेगुलेट करने की आवश्यकता है।'
जब गफूर ने लगाए थे आरोप

मीडिया के अलावा भी कई ऐसे अधिकारी हैं जो अपने कर्तव्य का पालन न करने के कारण सवालों के घेरे में आए थे। जब मुंबई पर आतंकवादी हमला हुआ था तब मुंबई पुलिस कमिश्नर हसन गफूर थे। गफूर नई तत्कालीन एटीएस चीफ परमबीर सिंह सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारियों पर अपने कर्तव्य का पालन करने से पीछे हटने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि क्राइम ब्रांच के अतिरिक्त आयुक्त देवेन भारती, दक्षिणी क्षेत्र के अतिरिक्त आयुक्त के.वेंकटेशम, कानून-व्यवस्था के संयुक्त आयुक्त केएल प्रसाद और एटीएस चीफ परमबीर सिंह मुंबई आतंकी हमले के दौरान अपनी ड्यूटी निभाने में असफल रहे थे। ताजा मामले में मुंबई पुलिस के पूर्व एसीपी शमशेर खान पठान ने भी परमबीर सिंह पर कसाब का फोन चुराने का आरोप लगाया है। इसके साथ ही तत्कालीन कमिश्नर वेंकेटेशम ने भी जानकारी होने के बावजूद कोई एक्शन नहीं लिया था।
राहुल गांधी भी आए थे निशाने पर

मुंबई हमले के समय राहुल गांधी भी कांन्ग्रेस महासचिव भी चर्चा में थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इससे पहले कि मेजर संदीप उन्नीकृष्णन की मां के आंसू सूखते, कांग्रेस महासचिव और उत्तराधिकारी राहुल गांधी दिल्ली के बाहरी इलाके में एक फार्महाउस में अपने दोस्तों के साथ पार्टी कर रहे थे।
rahul_gandhi.jpegवहीं, उद्धव ठाकरे ने भी वर्ष 2010 में राहुल गांधी पर निशान साधते हुए कहा था, “राहुल गाँधी ने 26/11 मुंबई हमलों में वीरगति को प्राप्त हुए जवानों का अपमान किया है। उन्होंने देश के लिए अपनी जान न्योछावर करने वाले हेमंत करकरे, अशोक कामटे, तुकाराम अम्बोले और विजय सालस्कर जैसे मराठा पुलिसकर्मियों की बहादुरी का अपमान किया है। उन्होंने एनएसजी के मेजर संदीप उन्नीकृष्णन को अपमानित किया है। जब मुंबई में हमला हुआ, तब राहुल कहाँ थे?”
बता दें कि मुंबई पर हमला करने के लिए साजिश के तहत लश्कर-ए-तैयबा के 10 आतंकी समुद्र के रास्ते मुंबई में दाखिल हुए थे। हमले की खबर मिलते ही रैपिड एक्शन फोर्ड (आरपीएफ), मैरीन कमांडो और एनएसजी कमांडो ने मोर्चा संभाला था, परंतु आतंकियों का खात्मा करने में सुरक्षा बलों को 3 दिन लग गए। आतंकियों के खिलाफ 60 घंटे तल चली इस लड़ाई के बाद सुरक्षा बलों ने 9 आतंकियों को मार गिराया था, जबकि अजमल आमिर कसाब को जिंदा पकड़ा गया था। अजमल कसाब को वर्ष 2012 में फांसी की सजा हुई थी।

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