scriptWho is responsible for plight of Yamuna River in Delhi | आखिर यमुना की इस बदहाली के लिए सबसे बड़ा जिम्मेदार कौन है? | Patrika News

आखिर यमुना की इस बदहाली के लिए सबसे बड़ा जिम्मेदार कौन है?

1909 तक यमुना साफ थी, परंतु जैसे-जैसे दिल्ली में अबादी बढ़ती गई, उद्योग बढ़े, वैसे-वैसे यमुना में शहरी कचरे और औद्योगिक अपशिष्‍ट का स्तर भी बढ़ता गया।

नई दिल्ली

Updated: November 08, 2021 11:11:43 pm

हर साल छठ पर्व आते ही यमुना में प्रदूषण को लेकर चर्चा तेज हो जाती है। झाग की मोटी चादर नदी में तैर रही है, यमुना के गंदे पानी में डूबकी लगा रही हैं महिलायें, जैसी खबरें सोशल मीडिया से लेकर न्यूज़ चैनलों तक में अक्सर आपको भी दिखाई और पढ़ाई जाती हैं। इन खबरों को पढ़कर आप दुख जताते हैं तो कभी आप सरकार को दोष देते हैं, परंतु यमुना की इस हालत के लिए कौन जिम्मेदार है? इसका जवाब ढूंढने निकेलेंगे तो जवाब कम सवाल, आरोप-प्रत्यारोप अधिक देखने को मिलेंगे।
Yamuna Delhi
आज यमुना नदी की हालत देखकर ऐसा कहना गलत नहीं होगा कि ये नदी मर चुकी है और इसकी पुष्टि स्वयं केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड यमुना नदी भी कर चुका है। इस नदी का पानी सीवेज के पानी जैसा हो गया है और अमोनिया का स्तर भी खतरनाक स्तर पर जा रहा है।
अमोनिया की मात्रा से बढ़ी दिल्लीवासियों की मुश्किलें

वर्तमान में यमुना नदी में अमोनिया की मात्रा तीन पीपीएम तक बढ़ गई है, जिससे दिल्ली के कई इलाकों में पानी की अपूर्ति बाधित हो गई है। इसकी जानकारी देते हुए दिल्ली जल बोर्ड (DJB) के उपाध्यक्ष राघव चड्ढा ने इसके लिए हरियाणा पर दोष मढ़ा कि हरियाणा भारी मात्रा में सीवेज और औद्योगिक कचरा नदी में छोड़ रहा है, जिससे दिल्ली के जल शोधन संयंत्रों में उत्पादन प्रभावित हो रहा है। उपाध्यक्ष राघव चड्ढा ने आगे कहा है कि यमुना नदी में अमोनिया का स्तर बढ़ गया है जिस कारण पूर्वी, उत्तर-पूर्वी, दक्षिणी दिल्ली और नई दिल्ली नगर निगम के कुछ इलाकों में पानी की आपूर्ति प्रभावित हुई है। हमने पर्याप्त संख्या में पानी के टैंकरों की व्यवस्था की, ताकि लोगों को परेशानी न हो। हालांकि, बाद में जल शोधन संयंत्रों को ठीक कर दिया गया है।
यमुना नदी के प्रदूषित होने के कारण
1909 तक यमुना साफ थी, परंतु जैसे-जैसे दिल्ली में अबादी बढ़ती गई, उद्योग बढ़े, वैसे-वैसे यमुना में शहरी कचरे और औद्योगिक अपशिष्‍ट का स्तर बढ़ता गया। आंकड़ों की मानें तो दिल्ली के 90 फीसदी घरों से निकलने वाला खराब पानी यमुना नदी में जाता है और इस शहर का 58 प्रतिशत कचरा भी यमुना नदी में जाता है। सबसे ज्यादा प्रदूषण वजीराबाद से होता है, जहां से यमुना दिल्ली में प्रवेश करती है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) द्वारा गठित उच्चस्तरीय समिति की रिपोर्ट ने भी इसपर प्रकाश डालते हुए बताया था कि वजीराबाद से ओखला के बीच महज 22 किलोमीटर की दूरी में यमुना नदी 76 फीसदी गंदी है और ये दूरी यमुना की कुल लंबाई का महज 2 फीसदी है।
वर्षों से यमुना को साफ करने की योजनायें चलाई जा रही हैं, परंतु नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा। इसका सबसे बड़ा कारण शहरों का गंदा पानी भारी मात्रा में सीधे नदी में जा रहा है और इसे रोकने में सरकारें असफल रही हैं।
इसी वर्ष फरवरी माह में यमुना से जुड़े एक मामले पर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने सुप्रीम कोर्ट में बताया था कि दिल्ली में कुल 35 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट काम कर रहे हैं, जिनकी कुल कार्य क्षमता लगभग 2,715 मिलियन लीटर प्रतिदिन शोधन की है, जबकि अभी दिल्ली के जल-मल की मात्रा 3000 मिलियन लीटर प्रतिदिन है। मूल कारण ये है कि केवल एक प्लांट ही चालू है जो 90 मिलियन लीटर ही साफ कर पाता है और बाकि सीवेज का गंदा पानी सीधे यमुना में जाता है। इस गंदे पानी में फॉस्फेट और एसिड भी होता है जिससे पानी में जहरीला झाग बनता है जो एक गंभीर चिंता का विषय है।
आप इसी से अंदाजा लगा सकते हैं कैसे सरकार की तरफ से बरती जा रही लापरवाही के कारण प्रतिदिन सीवेज का हजारों लीटर गंदा पानी सीधे यमुना में जा रहा है और ये नदी अब किसी नाले की भांति दिखाई देती है। आसपास रहने वाले लोग भी किसी नियम का पालन नहीं करते हैं, इसके विपरीत कचरा फेंकने का काम अवश्य करते हैं। यमुना की हालत आज के समय में इतनी खराब हो चुकी है कि अब इस नदी में कोई जलीय जीवन भी अस्तित्वमय नहीं हो सकता। यमुना किनारे आने वाले पक्षियों की संख्या एशियन वाटर बर्ड-2018 की गणना के अनुसार करीब 80 फीसदी तक गिर गई थी अब तो ये संख्या और कम हो गई होगी।
यमुना की इस दुर्दशा पर किए गए वादे

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा जुलाई 2018 में गठित की गई यमुना मॉनिटरिंग कमेटी की सिफारिशों के बाद जागी दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने इसी वर्ष जून में जल प्रदूषण को रोकने के लिए एक बड़ा निर्णय लिया। इस निर्णय में नवीनतम बीआईएस मानकों का पालन न करने वाले साबुन, डिटर्जेंट की बिक्री, भंडारण, परिवहन और मार्केटिंग पर बैन लगा दिया था। इसके साथ ही केजरीवाल सरकार ने कहा था कि 2023 तक यमुना नदी को 90 फीसदी तक स्वच्छ किया जाएगा।
इससे पहले 19 जनवरी, 2020 को, विधानसभा चुनाव के लिए, मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि अगले पांच वर्षों में यमुना को साफ और प्रदूषण मुक्त बनाया जाएगा। इसके बाद 9 मार्च को, अपने बजट भाषण के दौरान, उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा था कि "यमुना अब अगले तीन वर्षों में पूरी तरह से साफ हो जायेगी।"
हालांकि, दिल्ली सरकार इस वादे को पूरा कर पाती है या नहीं ये आने वाला समय बतायेगा, परंतु अभी जो यमुना का हाल है उसे देखकर तो यही लगता है कि ये भी केवल राजनीतिक बोल हैं। पिछले पांच सालों से दिल्ली सरकार यही वादा करती रही है।
यमुना की सफाई के लिए वर्ष 1993 में यमुना कार्य योजना (वाईएपी) औपचारिक रूप से शुरू की गई जिसे तीन चरणों में पूरा किया जाना है। इस योजना के 25 वर्षों के दौरान 1514 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा चुके हैं। लोकसभा में पीके कुनहालिकुट्टी के प्रश्न के लिखित उत्तर में पूर्व जल संसाधन राज्य मंत्री सत्यपाल सिंह ने कहा था कि यमुना कार्य योजना के चरण-1 एवं चरण-2 के तहत कुल 1514.70 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। इसके बावजूद यमुना नदी का प्रदूषण कम होने का नाम नहीं ले रहा है। पूर्व की यूपीए सरकार भी कई बार यमुना में बढ़ते प्रदूषण को लेकर चिंता जता चुकी है। वर्ष 2015 में तो यमुना की सफाई के लिए एनडीए शासित केंद्र सरकार और दिल्ली की आप सरकार ने हाथ भी मिलाया था, परंतु धरातल पर कोई बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिल रहा है।
वास्तव में आम जनता हो या सरकारें सभी आज यमुना की इस हालत के लिए दोषी हैं। आम जनता जारी किये गये दिशानिर्देशों का पालन नहीं करती, तो वहीं सरकारें अपने किये वादों को चुनावों के बाद भूल जाती हैं।

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