scriptWhy congress bow down to Harish Rawat revolt? | आखिर क्यों हरीश रावत की बगावत के सामने झुकने को मजबूर हुआ कांग्रेस हाई कमान ? | Patrika News

आखिर क्यों हरीश रावत की बगावत के सामने झुकने को मजबूर हुआ कांग्रेस हाई कमान ?

जो पार्टी हाई कमान पंजाब में अमरिंदर सिंह के समक्ष नहीं झुका वो भला यहाँ कैसे झुक गया ? इसे समझिए विस्तार से...

Published: December 24, 2021 07:11:13 pm

कांग्रेस नेता और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने बुधवार को 2022 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव से पहले ही बगावत के संकेत दिए। उन्होंने कहा कि पार्टी संगठन ने उनसे मुंह मोड़ लिया है। इस बगावत के बात उत्तराखंड कांग्रेस में खुलकर गुटबाजी भी सामने आ गई। इससे कांग्रेस हाई कमान ने तुरंत हरीश रावत समेत उत्तराखंड के सभी बड़े नेताओं को दिल्ली तलब किया। हाई लेवल की मीटिंग करने के बाद हरीश रावत को ही उत्तराखंड विधानसभा का चुनावी चेहरा बनाने का निर्णय लिया गया। अब सवाल ये है कि आखिर जो पार्टी हाई कमान पंजाब में अमरिंदर सिंह के समक्ष नहीं झुका वो भला यहाँ कैसे झुक गया ?
Harish Rawat Uttarakhand
Rahul Gandhi And Harish Rawat

जब-जब हरीश रावत के किया विरोध पार्टी टूटने के कगार पर पहुंची


इसे समझने के लिए उत्तराखंड में हरीश रावत की लोकप्रियता और समर्थकों के बीच उनकी छवि है। ये वही राजनेता हैं जिन्होंने वर्ष 2012 में अपने समर्थकों के साथ पार्टी द्वारा विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाये जाने का विरोध किया था। इस विरोध के कारण पार्टी में बड़ी दरार पड़ने लगी थी।

यहां तक कि हरीश रावत और उनके समर्थकों ने बहुगुणा के शपथ समारोह का भी बहिष्कार किया था। केवल 12 कांग्रेसी विधायक ही शपथ समारोह में शामिल हुए थे। इसके बाद कांग्रेस ने हरीश रावत को मनाया और बाद में मुख्यमंत्री भी बनाया था। हरीश रावत ने वर्ष 2002 में नारायण दत्त तिवारी को मुख्यमंत्री बनाए जाने का भी विरोध किया था। इसी से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हरीश रावत का प्रभाव पार्टी में कितना बड़ा है।

जब-जब हरीश रावत ने पार्टी के खिलाफ आवाज उठाई है तब तब पार्टी टूटने की कगार पर पहुंची है।

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हरीश रावत का हिंट


इस बार की स्थिति थोड़ी अलग थी। कांग्रेस ने उत्तराखंड विधानसभा चुनावों को लेकर अपना उम्मीदवार तय तो नहीं किया पर हरीश रावत के नाम पर मुहर भी नहीं लगाई। इससे हरीश रावत खफा हो गए और सोशल मीडिया पर अपनी भड़ास निकाली। इसके बाद तो उनके समर्थकों ने खुलकर पार्ट में प्रीतम सिंह गुट के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। यहाँ तक कि पार्टी छोड़ने और नई पार्टी बनाने तक के संकेत दे दिए। इससे कांग्रेस के अधिकतर विधायक रावत के खेमे में जाते ऐसा कहना गलत नहीं होगा।

उत्तराखंड कांग्रेस अध्यक्ष हरीश गोदियाल ने हरीश रावत का कदम को सही ठहराते हुए कहा, 'हरीश रावत की चिंता वाजिब है।' इसके साथ ही उन्होंने इस बात से भी मना नहीं किया कि उत्तराखंड में हरीश रावत की नाराजगी पार्टी पर भारी पड़ सकती है।

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'कांग्रेस का मतलब रावत, रावत का मतलब कांग्रेस है'

वास्तव में हरीश रावत उत्तराखंड की जनता में काफी लोकप्रिय है। यहां तक कि हाल के कुछ चुनावी सर्वे में कांग्रेस को बढ़त मिलते दिखाई दी थी जिसका कारण हरीश रावत को ही बताया जा रहा था। खुद उत्तराखंड के कई कांग्रेसी नेता इस बात से सहमति रखते हैं कि उत्तराखंड में 'कांग्रेस का मतलब रावत, रावत का मतलब कांग्रेस है' और रावत इसी धारणा का फायदा उठा रहे हैं।

उत्तराखंड में रिस्क नहीं ले सकती पार्टी

शायद ये बात हरीश रावत अच्छे से समझते भी हैं तभी उन्होंने अपनी पार्टी के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया।

इस बात को कांग्रेस भी समझती है कि हरीश रावत की बगावत उत्तराखंड में उसकी स्थिति को पूरी तरह कमजोर कर देगी।

यहां तक कि पार्टी में बड़ी फूट पड़ जाती और कांग्रेस का संगठन कमजोर पड़ जाता। पहले ही पार्टी पंजाब में अमरिंदर सिंह के पार्टी छोड़ने से कमजोर स्थिति में है। ऐसे में उत्तराखंड में किसी भी तरह का रिस्क पार्टी पर भारी पड़ सकता था। यही कारण है कि इस बार भी कांग्रेस हाई कमान को हरीश रावत की बगावत का समक्ष झुकना पड़ा है।

अब कांग्रेस ने हरीश रावत के नेतृत्व में पार्टी ने उत्तराखंड का आगामी विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान किया है।

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