scriptWhy liquor ban failed in Bihar ? | आखिर क्यों बिहार में शराबबंदी फेल साबित हो रही है? | Patrika News

आखिर क्यों बिहार में शराबबंदी फेल साबित हो रही है?

बिहार में भले ही पूर्ण शराबबंदी है, लेकिन शराब पीने के मामले में ये प्रदेश महाराष्ट्र से भी आगे है।

नई दिल्ली

Published: November 17, 2021 08:31:23 pm

बिहार में शराबबंदी के बावजूद नकली शराब पीने से हो रही मौतों के आंकड़ों पर विराम नहीं लग रहा। इसी के मद्देनजर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मंगलवार को शराबबंदी को लेकर सात घंटे तक मैराथन समीक्षा बैठक की। इस दौरान उन्होंने कहा कि जिन्हें जो जिम्मेदारी दी गई है वो पूरी मुस्तैदी और मनोयोग के साथ काम करें। न राज्य में शराब आने देंगे और न किसी को शराब पीने देंगे, इसी मानसिकता के साथ सभी को काम करना है। हालांकि, यहाँ सवाल ये उठता है कि आखिर शराबबंदी राज्य में पूरी तरह से फेल क्यों साबित हो रही है?

nitish kumar

सीएम नीतीश कुमार ने बिहार में 5 अप्रैल 2016 से शराब की बिक्री और खपत पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की घोषणा की थी। प्रतिबंध की अवज्ञा पर सख्त सजा के प्रावधान भी किए गए थे। बैन लगने के बाद से ही राज्य पुलिस ने राज्य आबकारी और शराबबंदी विंग के अधिकारियों के साथ मिलकर शराब की आपूर्ति, बिक्री और तस्करी की जांच के लिए स्थानों पर छापेमारी जारी रखी। शराबबंदी के कारण शराबबंदी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में रिकॉर्ड संख्या में गिरफ़्तारी भी की गईं। कैबिनेट ने मद्य निषेध के लिए आईजी का नया पद तक सृजित किया था।

बिहार में पूर्ण शराबबंदी का सच

शराबबंदी जब लागू हुई थी तब तो सभी में डर बैठ गया था। तमाम लोगों ने शराब से तौबा कर लिया, परंतु समय के साथ चीजें बदलने लगीं और लोग शराब पाने के लिए नए-नए विकल्प तलाशने लगे, जिससे शराब बेचने वालों ने भी नए तरीके ढूंढ निकाले। बिहार में झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और नेपाल से शराब की बड़ी खेप तस्करी कर लाई जाती है। आलम ये है कि पुलिस और मद्य निषेध विभाग की टीम औसतन 1341 लीटर शराब यहां हर घंटे जब्त करती है।

हैरान कर देने वाले आँकड़े तो तब सामने आए जब बिहार में 2016 से पूर्ण शराबबंदी के बावजूद महाराष्ट्र की तुलना में शराब की खपत सबसे अधिक पाई गई। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) 2020 के मुताबिक, शराबबंदी के बावजूद बिहार के पुरुष शराब पीने में आगे हैं। शराब सेवन को लेकर जो आँकड़े सामने आए हैं, उसमें पाया गया है कि बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में 14.05% लोग शराब का सेवन करते हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में ये आंकड़ा 15.8% है। वहीं, पूरे बिहार का आंकड़ा 15.5% है, जबकि महाराष्ट्र के शहरी क्षेत्र में 13 प्रतिशत आबादी ही शराब का सेवन करती है। वहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में ये आंकड़ा 14.7 फीसदी है। खपत ही नहीं, बिहार में शराबबंदी को कमाई का जरिया बनाकर अवैध व नकली शराब बेचने वाले तस्करों की संख्या में बढ़ोतरी देखने को मिली है। इन नकली शराब के सेवन से बिहार में हर साल यहाँ मौत होती हैं, जो चिंता का विषय है।

कब कहां कितनी मौत?

  • इस वर्ष जनवरी से लेकर 31 अक्टूबर तक शराब पीने से नवादा, पश्चिमी चंपारण, मुजफ्फरपुर, सीवान और रोहतास जिलों के करीब 72 लोगों की मौत हो चुकी है।
  • फरवरी, 2020 में गिरिडीह जिला में नकली और जहरीली शराब पीने से 4 दिन के भीतर 15 लोगों की मौत हो गयी थी
  • 29 जुलाई 2017 को मुंगेर में जहरीली शराब के सेवन से 8 लोगों की मौत हुई थी।
  • सितंबर, 2017 में रांची में जहरीली शराब पीने से एक दर्जन से अधिक लोगों की मौत हुई थी।
  • अगस्त 2016 में गोपालगंज के खजुर्बानी में जहरीली शराब पीने से 19 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 6 लोगों की आंखों की रोशनी चली गई थी।

शराबबंदी के बाद शराब तस्करों का उदय

बिहार में शराबबंदी के बाद प्रदेशभर में काला बाजारी बड़ी संख्या में हो रही है। शराबबंदी के कारण राज्य भर में स्थानीय शराब तस्करों के गिरोह का उदय हुआ और बिहार पुलिस बल में भी भ्रष्टाचार देखने को मिला है। यह भी बताया गया है कि शराब पीने वाले और शराब के तस्कर पुलिस द्वारा छापेमारी की आशंका से गिरफ्तारी से बचने के लिए शराब की बोतलें खेतों में फेंक देते हैं।

ये तस्कर शराब की बोतलों को माल कंटेनर, एम्बुलेंस, टायर ट्यूब, स्कूल बैग, या पोस्टल पार्सल के रूप में छुपा कर रखते हैं। इस तरह चोरी छिपे शराब बेचने और उसका सेवन करने का खेल बढ़ता गया और धीरे-धीरे प्रदेश में इसका नेटवर्क मजबूत होता गया। इन माफियाओं को किसी का डर नहीं है और यदि ये पकड़े जाते हैं तो घूस देकर निकल जाते हैं। यहाँ तक कि राज्य पुलिस भी इसमें शामिल है।

वर्ष 2018 में इससे जुड़ा मामला भी सामने आया था जब कैमूर में जब्त कर रखे गए 11 हजार बोतल शराब की जानकारी अदालत ने पुलिस ने मांगी थी तो पुलिस ने नौ हजार लीटर शराब खत्म होने का दोष चूहों पर मढ़ा था। इसी से स्पष्ट है कि प्रदेश में इतनी पाबंदी के बावजूद शराब की होम डिलीवरी कैसे संभव है।

अब तक की कार्रवाई पर नजर

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अनुसार, अप्रैल 2016 से जनवरी 2021 तक शराबबंदी से जुड़े 2 लाख 55 हजार 111 मामले दर्ज किए गए हैं। बिहार की सीमा और नेपाल के इलाकों से 5,401 शराब कारोबारियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। शराब से संबंधित मामलों में 37,484 गाड़‍ियां जब्त की गईं हैं और 3 हजार 482 गाड़‍ियां नीलाम की गई हैं। शराबबंदी कानून तहत शराब पीने और बिक्री करने वालों को मिला कर लगभग 3 करोड़ का जुर्माना लगाया जा चुका है, जबकि शराब का सेवन करने वाले 195 लोगों को और शराब की बिक्री करने वाले 131 लोगों को सजा दी जा चुकी है।

मद्य निषेध आईजी अमृत राज ने भी बताया, "1 अप्रैल 2016- 20 मार्च 2021 तक, पुलिस द्वारा शराबबंदी के उल्लंघन के कुल 21,2015 मामले दर्ज किए गए थे और कई माफियाओं और शराब आपूर्तिकर्ताओं सहित कुल 27,9360 लोगों को गिरफ्तार किया गया है।" उन्होंने ये भी बताया कि 20 मार्च 2021 तक 1.7 लाख करोड़ लीटर से अधिक शराब जब्त की गई है। मद्य निषेध आईजी ने ये भी जानकारी दी कि जीरो टॉलरेंस नीति को कायम रखते हुए अब तक 644 पुलिस अधिकारियों एवं कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की गयी है।

शराबबंदी को लेकर सख्ती के बावजूद प्रदेश में नकली शराब से जुड़े नेटवर्क को सरकार कमजोर नहीं कर पाई है। इसका मुख्य कारण प्रदेश में इन माफियाओं को कुछ बड़े दिग्गजों से मिल रहा राजनीतिक संरक्षण भी है। भ्रष्ट नेता और अफसरों की मिलीभगत के कारण ही बिहार आज शराबबंदी के बावजूद नकली शराब और उससे होने वाली मौतों का दंश झेल रहा है।

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