scriptWithdrawal of Farm laws ruined strategy of Congress and AAP | Uttarakhand: कृषि कानूनों की वापसी से कांग्रेस और AAP की बनी बनाई रणनीति पर फिरा पानी, बदला इन क्षेत्रों का समीकरण | Patrika News

Uttarakhand: कृषि कानूनों की वापसी से कांग्रेस और AAP की बनी बनाई रणनीति पर फिरा पानी, बदला इन क्षेत्रों का समीकरण

उत्तराखंड में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस किसान बहुल इलाकों में रैलियां कर रहे थे। कांग्रेस सत्ता वापसी के लिए किसानों के मुद्दे को फोकस में लेकर चल रही थी। यहां तक कि किसानों के मुद्दों के अनुसार ही राज्य में अपने संगठन में बदलाव तक किये जा रहे थे।

नई दिल्ली

Published: November 19, 2021 06:21:13 pm

पंजाब और उत्तर प्रदेश के बाद अगर किसी राज्य में किसान आंदोलन ने भाजपा के लिए चुनौतियां बढ़ाई हैं, तो वो उत्तराखंड है। हालांकि, उत्तराखंड राज्य की परिस्थितियां अन्य राज्यों से भिन्न है। यहाँ कुछ किसान इसका पूर्ण रूप से समर्थन कर रहे थे तो कुछ इसके विरोध में थे। इसी को मद्देनजर रखते हुए आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ने अपनी रणनीतियां बनाई थीं, जिसपर अब पानी फिर गया है।
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उत्तराखंड चुनावों से ठीक पहले मोदी सरकार द्वारा कृषि कानून को वापस लेना भाजपा के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है। यहाँ कई क्षेत्रों के किसान भाजपा से नाराज चल रहे थे। यहाँ तक कि कई सर्वे में भाजपा को भारी नुकसान होने की भविष्यवाणी की जा रही थी। उत्तराखंड राज्य में करीब 13% भू-भाग पर खेती की जाती है जोकि मुख्य रूप से प्रदेश के मैदानी जिलों देहरादून, हरिद्वार और उधमसिंह नगर में होती है।
बता दें कि उत्तराखंड के हरिद्वार, यूएसनगर, देहरादून और नैनीताल जिले की कई सीटों पर किसानों का प्रभाव है। उत्तराखंड में हमेशा से गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्रों का ही चुनावी नतीजों पर प्रभाव देखा गया है, परंतु इस बार किसान आंदोलन के कारण कृषि प्रभावित इलाकों का महत्व बढ़ गया है। इनमें भी तराई क्षेत्र सबसे अधिक चर्चा में रहा, यहाँ के किसानों ने जमकर आंदोलन में भाग लिया है। किसानों से सहानुभूति रखने वाले कई पर्वतीय लोग भी भाजपा से नाराज दिखे। कहा जा रहा था कि हरिद्वार की 9 विधानसभा सीटों को किसान सीधे तौर पर प्रभावित कर सकते थे। अब कृषि कानून को वापस लेकर सरकार ने डैमज कंट्रोल करने का प्रयास किया है। सरकार के इस ऐतिहासिक निर्णय से उत्तराखंड के चुनावी समीकरण में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
इसके इतर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस किसान बहुल इलाकों में रैलियां कर रहे थे। कांग्रेस सत्ता वापसी के लिए किसानों के मुद्दे को फोकस में लेकर चल रही थी। यहां तक कि किसानों के मुद्दों के अनुसार ही राज्य में अपने संगठन में बदलाव तक किये जा रहे थे। आम आदमी पार्टी ने तो कांग्रेस की तरह तराई क्षेत्र का अलग कार्यकारी अध्यक्ष बनाया था। कांग्रेस ने तो परिवर्तन यात्रा भी किसान आंदोलन को देखते हुए खटीमा, यूएसनगर, रुद्रपुर जैसे इलाकों से शुरू की थी। चूंकि अब कृषि बिल वापस ले लिया गया है तो इन दलों के पास अब किसानों का मुद्दा नहीं बचा है। ऐसे मे ये देखना दिलचस्प होगा कि ये दल अपनी अगली रणनीति का आधार किसे बनाते हैं।

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