२००० वर्ष प्राचीन है नीमच सिटी का शांतिनाथ भगवान मंदिर ....

-पर्युषण पर्व पर हर दिन होगी भगवान शांतिनाथ की अंगरचना
-सभी पर्वों का राजा है पर्युषण पर्व

By: bhuvanesh pandya

Published: 18 Aug 2017, 12:56 PM IST

नीमच. भारतीय संस्कृति का मूल आधार तप, त्याग और संयम है। मानव की सोई हुई अन्त: चेतना को जागृत करने, आध्यात्मिक ज्ञान के प्रचार, सामाजिक सद्भावना एवं सर्व धर्म समभाव के कथन को बल प्रदान करने के लिए पर्युषण पर्व मनाया जाता है। यह पर्व सिखाता है कि धर्म, अर्थ, मोक्ष आदि की प्राप्ति में ज्ञान व भक्ति के साथ सद्भावना का होना भी अनिवार्य है। जैन धर्म में पर्युषण पर्व एक ऐसा पर्व है जो क्षमा से प्रारंभ होता है और क्षमा पर ही उसका समापन होता है। क्षमा वाणी शब्द का सीधा अर्थ है कि व्यक्ति और उसकी वाणी में क्रोध, बैर, अभिमान, कपट व लोभ न हो।

बतादें की पर्युषण पर्व सभी पर्वोंं का राजा है। इसे आत्मशोधन का पर्व भी कहा गया है। जिसमें तप कर कर्मों की निर्जरा कर अपनी काया को निर्मल बनाया जा सकता है। पर्युषण पर्व को आध्यात्मिक दीपावली की भी कहा जाता है।
पर्युषण पर्व १८ अगस्त से प्रारंभ होकर आठ दिनों तक चलेगा, जानकारी के अनुसार इस पर्व में अठ्ठाई महोत्सव और कल्प सूत्र का वाचन किया जाता है। अठ्ठाई महोत्सव में जैन धर्म के बारे में विस्तार से जानकारी बताई जाती है। वहीं कल्प सूत्र में जीवन जीने की कला बताई जाती है। कि किस प्रकार जन्म लेने से लेकर एक व्यक्ति को मृत्यु होने तक किस प्रकार से जीवन यापन करना चाहिए। इस दौरान दोनों समय सामायिक, स्नात्र पूजन, नवपद पूजन की जाती है।
२ हजार वर्ष पुराना है नीमच सिटी स्थित शांतिनाथ मंदिर
नीमच सिटी चौधरी मोहल्ले में स्थित भगवान शांतिनाथ का मंदिर आज से करीब २ हजार वर्ष प्राचीन है, यह शिखरबद्ध मंदिर है, इस प्रकार का मंदिर आसपास के १०० किलोमीटर के दायरे में कहीं नहीं है। कहा जाता है कि यतियों द्वारा इस मंदिर को उड़ाकर लाया गया था। यहां पर पूर्व में भगवान पाश्र्वनाथ की प्रतिमा विराजित थी, जो खंडित होने के बाद में करीब ६५ वर्ष पूर्व भगवान शांतिनाथ की प्रतिमा विराजित की गई। पर्यूषण पर्व के अंतर्गत अठ्ठाई महोत्सव और कल्पसूत्र का वाचन किया जाता है। जिसके माध्यम से व्यक्ति को संस्कारों का पालन करते हुए जीवन जीने की कला सीखाई जाती है।
-राजमल नागौरी, पूर्व अध्यक्ष, नीमच सिटी राजेंद्र सूरी ज्ञान मंदिर
पर्युषण पर्व के तहत आठों दिन तक नवपदजी की पूजा की जाती है। जो एक मात्र नीमच सिटी स्थित शांतिनाथ भगवान के मंदिर पर ही होती है। पर्व के दौरान यहां प्रतिदिन भगवान की अंगरचना की जाती है। साथ ही १४ स्वप्न का जुलूस भी निकाला जाता है। पर्युषण पर्व में हमें जीवन जीने की कला सीखाता है।
-मंगला चौधरी, सचिव, अभा राजेंद्र सूरी महिला परिषद

पांच कर्तव्यों का पालन करना सीखाता है पर्युषण पर्व
पर्युषण पर्व सभी पर्वों में सर्वश्रेष्ठ है। इस पर्व की आराधना तप और त्याग से होती है। पर्युषण पर्व ५ कर्तव्यों का पालन करना सीखाता है।
१. परिवर्तन-खुद अहिंसक बनना और दूसरों को भी हिंसा रोकने के लिए प्रेरित करना।
२. क्षमापना-एक दूसरे के प्रति क्षमा की भावना रखना।
३. सधार्मिक वात्सल्य-सहधर्मी के प्रति प्रेम भाव रखना।
४. अठ्ठम तप- कम से कम तीन दिन का उपवास करना चाहिए।
५. चेत्य परिपाठी-सभी मंदिरों के दर्शन करना चाहिए।
-मुनि जिनवल्लभ विजय मसा

आठ दिन का यह पर्व जैन कुल में जन्म लिए हुए प्रत्येक जैनी के लिए आत्मा का शुद्धीकरण व मोक्ष मार्ग को प्रशस्त करने का सबसे महत्वपूर्ण समय होता है। पर्व के दौरान हर दिन पूजा अर्चना के साथ संतों के प्रवचन उस मार्ग पर चलने का रास्ता बताते हैं। जिससे जीवन में कौन कौन से कार्य करना चाहिए स्पष्ट होता है।
-मुकेश आचलिया, समाजसेवी

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