10  माह में 208 नवजात की हुई उपचार के दौरान मौत

1426 नवजात हुए थे जिला चिकित्सालय भर्ती
पर्याप्त स्टॉफ के बाद भी नवजात की मौत से बढ़ी चिंता

By: Mahendra Upadhyay

Published: 03 Mar 2019, 09:46 PM IST

नीमच. जिला चिकित्सालय में संचालित नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाई (एसएनसीयू) में पिछले 10 माह में 1426 नवजात बच्चों को उपचार के लिए भर्ती कराया गया। इनमें से 208 बच्चों की विभिन्न कारणों के चलते उपचार के दौरान मौत हो गई। निजी अस्पतालों में से बड़ी संख्या में ऐसे नवजातों को जिनकी अंतिम सांसे चल रही हों उन्हें भी एसएनसीयू में भर्ती करवा दिया जाता है। बाद में इनकी मौत होने पर एसएनसीयू में मौत के आंकड़े और बढ़ जाते हैं।
14 फीसदी बच्चों की होती है मौत
जिला चिकित्सालय में प्रतिदिन 20 से 25 महिलाओं की डिलेवरी होती है। इनमें 3 नवजात बच्चों को स्वास्थ्य कारणों से एसएनसीयू में भर्ती कराया जाता है। बच्चे शेष 2 बच्चे अन्य अस्पतालों के यहां भर्ती किए जाते हैं। एसएनसीयू में प्रतिदिन औसत ५ बच्चे उपचार के लिए भर्ती किए जाते हैं। प्रतिमाह औसत 150  से 160 नवजात को भर्तीकिया जाता है। इनमें से प्रतिमाह औसत 10  से 15  मासूमों मौत की हो जाती है। किसी महीने में यह संख्या कम या ज्यादा हो जाती है। जिले की औसत मृत्यु दर १४ फीसदी (एक माह तक के नवजात की) है। प्रदेश में यह आंकड़ा एक हजार पर ४२ है।
२८ सप्ताह से पहले जन्मे बच्चों की मौत अधिक
एसएनसीयू में उपचार कराने के लिए भर्ती किए जाने वाले बच्चों में पिछले १० महीने में सबसे अधिक उन बच्चों की मौत हुई है जिनका जन्म 27 सप्ताह से पहले हुई है। एसएनसीयू में ऐसे 31 बच्चे भर्ती हुए थे। इनमें से 28 की मौत हो गई। यह आंकड़ा 83 फीसदी रहा। 28 से 32 सप्ताह के मध्य पैदा हुए बच्चों की संख्या 74 थी। इनमें से 30 बच्चों का निधन हो गया। 32 से 34 सप्ताह के कुल 157 बच्चे भर्ती किए गए थे। इनमें से 25 की मौत हो गई। 34 से 37 सप्ताह में पैदा हुए बच्चों की संख्या 299 थी। इनमें से 31 का निधन हुआ। 37 से 42 सप्ताह में पैदा होने वाले 857 बच्चे थे और इनमें से 96 ने एसएनसीयू में अंतिम सांस ली। 42 से अधिक सप्ताह में 8 बच्चे पैदा हुए और वो पूरी तरह से स्वस्थ थे। एक भी बच्चे की मौत नहीं हुई। आशय यह है अधिकांश उन बच्चों की मौत होती है जो कम समय कम पैदा होते हैं।
नवजात की मौत के प्रमुख कारण
जिला चिकित्सालय स्थित एसएनसीयू में २६ फीसदी बच्चों की मौत जन्म के समय बच्चों के नहीं रोने से होती है। जन्म लेने एक मिनट के अंदर नवजात को रोना चाहिए। मां के स्वास्थ्य की वजह से ऐसा होता है। 25 फीसदी बच्चों की मौत संक्रमण की वजह से होती है। 19 प्रतिशत बच्चे फेफड़ों के पूरा आकार नहीं ले पाने की वजह से मर जाते हैं। 10 प्रतिशत बच्चे अत्यधिक वजन कम होने की वजह से मौत के मुंह में समा जाते हैं। 2से 3 प्रतिशत बच्चों की मौत जन्मजात विकृति की वजह से होती है। जिला चिकित्सालय में एसएनसीयू में शिशुओं को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। कई बार ऐसे हालात बन जाते हैं कि एक बिस्तर पर दो नवजात शिशुओं को रखना पड़ जाता है। शिशु की मृत्यु होने के कारणों में प्रमुख समय से पहले जन्म, सांस में तकलीफ, फेफड़े कमजोर रहना, सेप्टीसिमिया, बर्थएक्सपेसिया शामिल हैं। जिला चिकित्सालय के एसएनसीयू पर जिले के अलावा राजस्थान के निम्बाहेड़ा, छोटी सादड़ी आदि से भी बड़ी संख्या में शिशु उपचार के लिए आते हैं। एक माह में कम से कम 150 से 160 तक बच्चे भर्ती होते हैं। इन आंकड़ों में सरकारी और निजी अस्पताल में जन्में बच्चे भी शामिल हैं। एसएनसीयू में भर्ती नवजात बच्चों को 7 से 15 दिन तक निगरानी में रखा जाता है। जानकार बताते हैं कि प्रदेश में प्रति हजार बच्चों पर शिशु मृत्यु दर 42 है।
पर्याप्त है एसएनसीयू में स्टॉफ
एसएनसीयू में 4 चिकित्सों के पद स्वीकृत हैं। इनमें से एक ही पद रिक्त है। जल्द ही रिक्त पद भी भर जाएगा। उज्जैन से शिशु रोग विशेषज्ञ डा. मोहनलाल मालवीय जल्द ही ज्वाइन करेंगे। 21 नर्सों भी यहां कार्यरत है। यहां बच्चों को गर्मरखने के लिए २० रेडियंट वार्मर हैं। 4 सीपेप मशीन हैं। इनकी मदद से बच्चों का कृत्रिम सांस दी जाती है। एक वेंटिलेटर है। 6 फोटोथैरेपी मशीन भी उपलब्ध है। इसकी मदद से जिन नवजात को पीलिया हो जाता है उनका उपचार किया जाता है। एक सेंट्रल ऑक्सीजन सिस्टम एसएनसीयू में लगा हुआ है।
अंतिम क्षणों में आते हैं निजी अस्पतालों के बच्चे
पिछले 10 माह में एसएनसीयू में कुल 1426 नवजात बच्चों को उपचार के लिए भर्ती कराया गया। इनमें से 447 बच्चे जिला चिकित्सालय में ही पैदा हुए हैं। 641 बच्चे निजी और अन्य शासकीय अस्पतालों में पैदा होने के बाद उपचार के लिए एसएनसीयू में उपचार के लिए भर्ती किए गए थे। यह बिडम्बना ही है कि निजी अस्पतालों में नवजातों को उपचार के लिए भर्ती तो कर लिया जाता है, लेकिन अंतिम क्षणों डाक्टर हाथ खड़े कर देते हैं और मासूम को एसएनसीयू में भर्ती करवा दिया जाता है। जिले में सबसे बेहतरीन सुविधाएं एसएनसीयू में ही उपलब्ध हैं। यहां जितने भी नवजात उपचार के लिए भर्ती होते हैं उनमें से अधिकांश अंतिम क्षणों में आते हैं। हमारा प्रयास सभी का बेहतर उपचार करने का रहता है।
- डा. बीएल रावत, शिश रोग विशेषज्ञ

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