अब नहीं लेना पड़ेगी टीबी के मरीजों को सात प्रकार की दवाई

-टीबी की दवाई हुई अपडेट, अब हर दिन मरीज को दी जाएगी दवा -ग्रामीण क्षेत्र में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता व प्रायवेट प्रेक्टिसकर्ता देंगे दवाई -टीबी का एक मरी

By: harinath dwivedi

Published: 09 Dec 2017, 02:24 PM IST

नीमच. अब तक टीबी के मरीजों को एक दिन छोड़कर करीब सात गोलियों का डोज दिया जाता था। चाहे मरीज किसी भी उम्र या वजन का हो, उसे एक ही प्रकार की दवाईयां दी जाती थी। ऐसे में कुछ मरीज एक साथ सात सात गोलियों का डोज होने के कारण दवाईयां लेने में विचार करते थे। लेकिन अब टीबी के मरीजों को इतनी अधिक दवाईयां न देकर एक ही प्रकार की दवाई दी जारही है। ताकि टीबी के मरीज नियमित उपचार लेकर अपनी बीमारी को जड़ से समाप्त करें। क्योंकि अगर टीबी का मरीज नियमित उपचार नहीं लेता है तो वह वर्ष में १० से १५ नए मरीज पैदा कर देता है।
दो सप्ताह से अधिक खांसी चलना, खांसी के साथ बलगम आना, भूख नहीं लगना, वजन कम होना, शाम को हल्का बुखार रहना आदि टीबी के प्रारंभिक लक्षण हैं। अगर इस प्रकार के लक्षण नजर आए तो व्यक्ति को बिना देर करे अपना उपचार कराना चाहिए। क्योंकि जितनी जल्दी टीबी का उपचार प्रारंभ हो जाए, उतनी ही जल्दी टीबी का मरीज ठीक हो सकता है। लेकिन कुछ लोग समय से ध्यान नहीं देते हैं। जिससे उन्हें अपने जीवन से भी हाथ धोना पड़ सकता है।
एक मरीज बढ़ा देता है १० से १५ नए मरीज
टीबी माइक्रो बेक्टिरियम ट्यूबर क्लोसिस नामक जीवाणु के कारण फैलती है। यदि टीबी का कोई मरीज नियमित उपचार नहीं लेता है तो वह एक साल में नए १० से १५ मरीज पैदा कर देता है। क्योंकि उसके द्वारा खांसने, झिकने आदि से जीवाणु फैलते हैं जिससे अन्य लोग भी इस बीमारी की चपेट में आ जाते हैं। इस कारण टीबी के हर मरीज को दवाई लेना जरूरी होता है। इसी कारण डाट्स पद्धति द्वारा दी जाने वाली दवाईयों को अपडेट किया गया है। यह दवाई मरीज को उसकी उम्र व वजन के आधार पर निर्धारित कर २ से ४ गोली तक दी जाती है।
आंखों के सामने खिलाई जाती है दवा
वर्ष २०२५ तक टीबी मुक्त भारत बनाने के लिए टीबी के मरीजों को डॉट्स पद्वति द्वारा चिकित्सकों, क्षय नियंत्रण केंद्र, ग्रामीण क्षेत्रों में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता व प्रायवेट प्रेक्टिसरत चिकित्सक द्वारा आंखों के सामने ही दवाई खिलाई जाती है। ताकि मरीज घर ले जाने के बाद दवाई लेना भूल न जाए। टीबी की दवाई जिले में नीमच, जीरन, जावद, पालसोड़ा, डीकेन, रतनगढ़, सिंगोली, मनासा, रामपुरा में स्थित केंद्रों पर खिलाने के साथ ही मरीजों के बलगम की जांच भी माईक्रोस्कोप के द्वारा की जाती है। वहीं जिला चिकित्सालय में एक्स-रे के माध्यम से भी जांच होती है। इस बीमारी से पूर्ण रूप से छुटकारा लेने के लिए मरीज को ६ से ८ माह तक पूर्ण उपचार लेना पड़ता है। लेकिन अगर उसके बावजूद भी टीबी की बीमारी ठीक नहीं होती है। तो सीवी नॉट मशीन के द्वारा मरीज के बलगम की जांच की जाती है। यह मशीन केवल जिला चिकित्सालय में उपलब्ध है। जिस मशीन से यह पता चल जाता है कि मरीज को प्रथम चरण के तहत दी गई दवाई का लाभ मरीज को क्यों नहीं मिल। इसके बाद एमडीआर कोर्स जो करीब दो वर्ष का रहता है वह चालु किया जाता है। ताकि मरीज को टीबी की समस्या से जड़ से निजात मिल जाए। लेकिन कुछ मरीज बीच में ही दवाई लेना छोड़ देते हैं या फिर काफी समय बीत जाने के बाद ध्यान देते हैं। जिससे उनका बचना भी मुश्किल हो जाता है।
वर्ष खंखार की जांच जांच में पाए गए टीबी के मरीज
२०१४ ६३७९ १८८२
२०१५ ७८१० १८४५
२०१६ ७७७२ १७४०
२०१७ ७६१३ १४५०
वर्जन.
पहले टीबी के मरीजों को सात गोलियों का डोज दिया जाता था। इस कारण कुछ मरीज दवाईयां लेने में विचार करते थे। लेकिन अब एक ही प्रकार की गोली दी जाने लगी है। जिसके कोई साईड इफेक्ट भी नहीं है। यह दवाई मरीज को वजन अनुसार प्रतिदिन २ से ४ तक दी जाती है। जिसे खाने में मरीज को भी किसी प्रकार की दिक्कत नहीं होगी। जिससे डिफाल्ट रेट भी कम हो जाएगा। मरीज को नियमित उपचार लेना चाहिए, ताकि बीमारी जड़ से समाप्त हो जाए।
-अली असगर गोहर, टीवी सुपरवाईजर
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harinath dwivedi Editorial Incharge
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