scriptWhy is the pain of workers remembered only on World Labor Day | केवल विश्व मजदूर दिवस पर ही क्यों याद आता है श्रमिकों का दर्द | Patrika News

केवल विश्व मजदूर दिवस पर ही क्यों याद आता है श्रमिकों का दर्द

पत्थर खदान बंद होने से करीब 125 से अधिक परिवार हुए बेरोजगार

नीमच

Published: April 30, 2022 08:48:17 pm

मुकेश सहारिया, नीमच. सिंगोली क्षेत्र की पत्थर खदान बंद होने से 125 से 150 श्रमिक परिवारों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। रोजी-रोटी की तलाश में श्रमिक राजस्थान की खदानों में काम करने को मजबूर हैं। कुछ परिवार गांव से पलायन कर भीलवाड़ा चले गए। कुछ श्रमिक राजस्थान की पत्थर खदानों में सुबह काम के लिए जाते हैं और शाम को गांव लौट आते हैं। क्षेत्र के श्रमिकों का मुश्किलों भरा जीवन हो गया है।
केवल श्रम दिवस पर ही क्यों याद आता है श्रमिकों का दर्द
फुसरिया पंचायत के समीप स्थित पत्थर खदान जो अब बंद पड़ी है।
श्रमिकों के सामने खड़ा हुआ आर्थिक संकट
सिंगोली क्षेत्र की पत्थर खदान बंद होने से फुसरिया पंचायत के करीब आधा दर्जन गांवों के श्रमिकों के सामने रोजी-रोटी का सबसे बड़ा संकट खड़ा हुआ है। बड़ी, चक सोढ़ीजर, फसरिया, माता का खेड़ा, लालगंज, खवइ आदि गांवों के श्रमिक खदान बंद होने से काफी प्रभावित हुए हैं। इन गांवों के श्रमिकों को परिवार का भरण पोषण करने के लिए गांव से पलायन तक करना पड़ा है। प्रत्येक गांव से औसत 25 से 30 श्रमिक राजस्थान स्थित खदानों और औद्योगिक क्षेत्रों काम कर रहे हैं। कुछ ने गांव छोड़ दिए तो कुछ के परिवार गांव में ही हैं। श्रमिक सप्ताह में एक-दो दिन के लिए घर आते हैं। जो परिवार गांव में रह रहे हैं उनकी महिलाएं फुटकर पत्थर जमा कराने का छोटा काम कर आय अर्जित कर रही हैं। सिंगोली से लगे राजस्थान के कास्या में भी माइंस हैं। वहां भी बड़ी संख्या में सिंगोली क्षेत्र के श्रमिक काम करने जाते हैं। जो श्रमिक गांव में रह गए हैं वे मनरेगा के अंतर्गत कार्य कर रहे हैं। पत्थर खदान बंद होने से क्षेत्र के श्रमिकों के सामने बहुत बड़ा संकट खड़ा हुआ है।
राजस्थान जाने को मजबूर श्रमिक
पत्थर खदान बंद होने से पंचायत क्षेत्र में गांवों से करीब 125 से 150 परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। अब इन गांवों के श्रमिक राजस्थान में जाकर मजदूरी करने को मजबूर हैं।
- हुकमीचंद भील, सरपंच
5-6 साल पहले बंद हो गई खदान
करीब 5-6 साल पहले पंचायत क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली पत्थर खदान बंद हो गई थी। खदानों की गहराई अधिक होने से लागत भारी पडऩे लगी थी। खदान बंद होने से यहां कि श्रमिकों को अन्यत्र जाना पड़ा।
- शांतिलाल धाकड़, सहायक सचिव फुसरिया
प्रतिदिन जाते हैं जाते हैं कास्या खदान
सिंगोली से लगी पत्थर खदान बंद होने के बाद यहां के श्रमिकों को रोजी-रोटी के लिए राजस्थान जाना पड़ा। प्रतिदिन औसत 250 से 500 रुपए मजदूरी मिलती है। सुबह कास्या (राजस्थान) खदान चले पहुंच जाते हैं और शाम को घर लौट आते हैं।
- बंशीलाल धाकड़, श्रमिक

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