EXCLUSIVE: तीन लाख से ज्यादा टीबी के अज्ञात मरीज हो सकते हैं हमारे बीच

कोरोना से कई गुना ज्यादा जान लेने वाली बीमारी की भारी उपेक्षा। अज्ञात मरीजों की तादाद बढ़ी। इलाज मुश्किल होगा और दूसरों में संक्रमण भी अधिक फैलेगा।

By: Mukesh Kejariwal

Published: 24 Jul 2020, 05:50 PM IST

कम नहीं टीबी का खतरा

हर साल भारत में 4.5 लाख लोग मारे जाते हैं टीबी से

अब तक भारत में 30 हजार लोग मारे गए कोरोना से

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दुनिया के 24% टीबी के मरीज भारत में ही

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कोरोना के दौर में भारत में इससे भी ज्यादा जान लेने वाली बीमारी टीबी के इलाज में भारी उपेक्षा हो रही है। लॉकडाउन शुरू होने के बाद से टीबी के लगभग आधे मरीज सामने ही नहीं आ पा रहे हैं। अप्रैल से जून की तिमाही में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भी मरीजों की पहचान में 48 फीसदी की गिरावट आ गई है। समय से इनकी पहचान नहीं होने की वजह से इनका इलाज तो मुश्किल होगा ही दूसरों को संक्रमण का खतरा भी बढ़ जाएगा।

केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक बीती तिमाही के दौरान देश भर में सिर्फ 3.39 लाख नए मरीजों की ही पहचान हो सकी है। जबकि पिछले साल इस दौरान 6.48 लाख मरीजों की पहचान कर उनका इलाज शुरू कर दिया गया था। यानी हर महीने लगभग एक लाख मरीज की पहचान कम हो रह है।

क्या हैं वजहें

- लंबे समय तक रहा राष्ट्रीय और फिर क्षेत्रीय लॉकडाउन

- कोरोना जैसे लक्षण होने की वजह से प्राइवेट अस्पताल और क्लीनिक का इन मरीजों से बचना

- सरकारी डॉक्टरों और कर्मियों की कोरोना ड्यूटी

- टीबी की जीन एक्सपर्ट जैसी आधुनिकतम जांच मशीनों का कोरोना जांच में उपयोग
परिवहन के साधनों की कमी

अप्रैल से जून के दौरान इतनी कम हुई मरीजों की पहचान:

पिछले साल- 6.48 लाख मरीज

इस वर्ष- 3.39 लाख मरीज

कमी- 47.6%

ऐसा होना क्यों गंभीर

हमारे देश में अब भी सालाना साढ़े चार लाख लोग इस बीमारी से मारे जा रहे हैं। दुनिया भर के लगभग एक चौथाई टीबी मरीज भारत में ही हैं। इससे निपटने के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि नए मरीजों की समय से पहचान कर उनका इलाज शुरू किया जाए। पिछले कई दशकों से देश भर में इसकी जांच और इलाज पूरी तरह मुफ्त है।

क्या कह रही सरकार

डॉ. केएस सचदेवा, हेड, सेंट्रल टीबी डिवीजन, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार

क्या कोरोना के दौरान टीबी नियंत्रण के संसाधनों का उपयोग उधर लगा देना पड़ा?

जब देश के सामने एक नई चुनौती आई तो स्वभाविक तौर पर उसमें सभी को लगना पड़ा। टीबी कार्यक्रम के पास ऐसे संक्रामक रोगों से निपटने में विशेषज्ञता थी, इसलिए हम आगे आए। लेकिन अब देश भर में टीबी की जांच और इलाज की सरकारी सुविधाएं पहले की तरह उपलब्ध करवा दी गई हैं। लोग इसका लाभ लेने के लिए तुरंत आगे आएं। हम दुगनी रफ्तार से जुट रहे हैं कि ये जो केस छूट गए हैं, इनको कैसे सामने लाया जाए।

क्या लोग कोरोना जैसे लक्षण होने की वजह से भी डर रहे हैं टीबी की जांच से?

ऐसा नहीं है। बल्कि ठीक उल्टा है। ऐसे लक्षण होने पर लोगों को कोरोना का डर हो रहा है। कोरोना जैसे लक्षण होने की वजह से संभव है कि कुछ लोगों ने कोरोना की जांच करवाई और निगेटिव आने पर संतुष्ट हो गए। इसलिए अब हम कोरोना के साथ ही लक्षणों के आधार पर टीबी जांच की भी व्यवस्था कर रहे हैं।

एक्सपर्ट व्यू

-डॉ. नरगिस मिस्त्री, निदेशक, फाउंडेशन फॉर मेडिकल रिसर्च

कहीं लॉकडाउन से तो नहीं घटा टीबी का प्रसार?

डॉ. मिस्त्री: ऐसा नहीं मान सकते। इसके कई कारण हैं। टीबी का इनक्यूबेशन पीरियड काफी लंबा भी हो सकता है। संक्रमण होने के एक से दो साल बाद भी लक्षण आ सकते हैं। आम तौर पर लक्षण आने के भी 23 से 30 दिन बाद ही इसकी जांच होती है।

यानी जो लोग लॉकडाउन से पहले संक्रमित हुए थे, उनकी पहचान भी इसी दौरान होनी थी। बाहर कम जाने से प्रसार की आशंका घटी होगी तो घर में बंद रहने से दूसरे सदस्यों में फैलने का खतरा बढ़ा भी है।

Mukesh Kejariwal Incharge
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