ग्राउंंड रिपोर्ट: मुस्लिम मतदाताओं के चुनावी मुद्दे, भूख से बढ़कर भय

ग्राउंंड रिपोर्ट: मुस्लिम मतदाताओं के चुनावी मुद्दे, भूख से बढ़कर भय

Mukesh Kumar Kejariwal | Publish: Apr, 09 2019 05:59:32 PM (IST) New Delhi, Delhi, Delhi, India

  • चुनाव में अल्पसंख्यक तबका खूब सजग है।
  • संख्या का शासन कहे जाने वाले लोकतंत्र में इसे अपनी गिनती ऊपर करवानी है।
  • जानिए इनके मुद्दे क्या हैं और कहां हैं।

मुकेेश केजरीवाल, मुजफ्फरनगर। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इसी इलाके में पिछलेे लोकसभा चुनाव से ऐन पहले 2013 में भारी दंगे हुए। पांच दर्जन से ज्यादा जानें गईं। हजारों लोग महीनोंं अपने घरों से दूर रहने को मजबूर हुए। इसका असर पूरे राज्य के चुनाव पर हुआ। भाजपा गठबंधन ने राज्य में इतिहास बनाते हुए 80 में 73 सीटें जीत लीं। दंगों की टीस तो दोनों तरफ अब भी है लेकिन इन चंद वर्षों में तनाव काफी घटा है।

मुख्य शहर से 15 किलोमीटर दूर बागोंवाली गांंव केे लोगों नेे दंगों के विस्थापित लगभग एक दर्जन परिवारों केे लिए यहां रहने का इंतजाम कर दिया है। भौरा खुर्द गांव से यहां आए 45 साल के शमशाद चुनाव की बात करने पर कहते हैं, ‘हमारे लिए तो सबसे बड़ा मुद्दा सुरक्षा है। हम अपने घर लौट सकें और बिना खौफ के जी सकें।’ इनके पड़ोसी 38 साल के वसीम कहते हैं कि अब सभी लोग पिछली सारी बातें भूल जाना चाहते हैं। लोग फिर से काफी हद तक वैसे ही एक-दूसरे समुदाय पर निर्भर हैं।

नई साझेदारी, नए नारे

जिन जाट और मुसलमानों में तलवारें सबसे ज्यादा टकराई थीं, अब उनके बीच नए चुुनावी समीकरण बनाने की कोशिश भी हो रही है। इस बार ‘लाठी, हाथी 786’ का नया नारा गढ़ा गया है। इसमें सपा और बसपा यादव, जाटव और मुसलमानों की एकता की बात कर रही हैं। साथ ही रालोद इसमें जाट वर्ग को भी जोड़ने में जुटा है, जो पिछली बार भाजपा के साथ था। मगर हम इन दलोंं की दलीलों और नारों से अलग आम मुस्लिम मतदाताओं सेे उनके मुद्दे जानने की कोशिश करते हैं।

मुजफ्फरनगर के शिव चौक के आस-पास के लोग शाम को अपनेे काम निपटा कर लौट रहे हैं। खाला पार इलाके में रहने वाले 60 की उम्र के मोहम्मद इरशाद से चुनावी मुद्दा पूछो तो कहते हैं- ‘इस बार तो हिंंदू-मुस्लिम नहींं है।’ लेकिन लगे हाथ वे यह भी बताते हैं कि इस बार भी यहां अधिकांश मुस्लिम मतदाताओंं की पसंद एक ही है और इसका आधार भी एक ही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अधिकांश इलाके में बेहद पिछड़े होने के बावजूद इस वर्ग के कम ही लोग शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की बात कर रहे हैं।

इस स्थिति के बारे में मेरठ के वरिष्ठ पत्रकार हरि जोशी कहते हैं, ‘मुसलमानोंं के पास विकल्पहीनता है। इन्हें ऐसा विकल्प चाहिए जो इन्हें भयमुक्त करने के साथ ही इनके कल्याण पर वास्तव में काम कर सके।’ विकास के मोदी केे नारे पर ये कतई विश्वास करने को तैयार नहीं। इस बारे में पूछने पर इरशाद नाम के बुजुर्ग कहते हैं- ‘बच्चों को गुब्बारा और समझदार को इशारा। अब आप खुद समझ लें।’

चुनाव में निर्णायक, पर अपने मुद्दों पर अनिर्णय

मेरठ रोड पर थोड़ा आगे सिटी सेंटर मार्केट के पास हमारी ऐसी ही एक चर्चा के बीच एक अल्पसंख्यक युवक अचानक अपना मोबाइल हमारे आगे कर देता है। इसमें स्थानीय भाजपा उम्मीदवार संजीव बालयान का वीडियो चल रहा है। वे स्थानीय मुस्लिम समाज से वोट देने की अपील करते हुए कह रहे हैं कि जब विकास होता है तो उसका लाभ सभी वर्ग को मिलता है। लेकिन यहां मौजूद ज्यादातर लोग इसे सियासी तमाशा बताते हैं।

इसी तरह यहां से 60 किलोमीटर दूर मेरठ के मुस्लिम आबादी वाले लिसाड़ी गेेट इलाके में वर्षों से छोटा-मोटा काम करने वाले कदीर नोटबंंदी से कारखाने बंद हो जाने की बात करते हैं तो दिल्ली से सटे गाजियाबाद केे कैला भट्टा में कसाई का काम करने वाले नुसरत पास केे स्कूल में शिक्षक की कमी की बजाय जीएसटी से हुई परेशानी की बात करते हैं, जिससे इनका कोई लेना-देना नहीं।

अपनी अलग पहचान कायम रखने पर जोर

ऐसा क्योंं है, इस बारे में पूछने पर गाजियाबाद के इसी मुहल्ले के पढ़े-लिखे और थोड़े संंपन्न बुजुर्ग के.जेेड. बुखारी बिना किसी लाग-लपेट के कहते हैं, ‘यहां के मुसलमानों का एक ही मुद्दा है। फलां पार्टी को हराना। अलग-अलग पार्टियों के लोग हर बार इन्हें डरा कर वोट बटोर लेतेे हैं और फिर इनका हाल तक जानने नहींं आते।’

मगर स्थानीय कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले वसीम कहते हैं, ‘यह ठीक है कि कांग्रेस हो या सपा-बसपा, सबने हमें 'बेवकूफ' बनाया और विकास से दूर रखा। लेकिन जब दंंगे होते हैं या हमें पीट-पीट कर मार दिया जाता है तब भाजपा हमारे साथ कभी खड़ी नहीं होती। आदर्श स्थिति तो तब हो जब हमें गैर फिरकापरस्त पार्टियों में बेहतर को चुनने का मौका मिले।’

पत्रकार हरि जोशी कहते हैं, ‘अल्पसंख्यक वर्ग की सोच में बदलाव आ रहा है। मगर यह बदलाव बहुत धीमा है। आज भी इनके लिए अपनी अलग धार्मिक और सांस्कृृतिक पहचान बहुत अहम है।’

हर पार्टी का कट्टरवाद का अपना स्वरूप

इस चुनाव में एक तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक मुस्लिम उम्मीदवार को पाकिस्तानी आतंंकवादी का दामाद बता कर अपनी मंशा जताई है तो उधर, बसपा प्रमुख मायावती ने देवबंद की जनसभा में सीधे मुसलमानों से एकजुट हो कर वोट करने की अपील कर दी है। गठबंधन में शामिल नहीं हो सकी कांग्रेस ने भी कट्टर चेहरोंं को आगेे ला कर साफ कर दिया है कि वह अल्पसंख्यक कट्टरता पर ही दाव लगा रही है।

आबादी 19 फीसदी, प्रतिनिधित्व शूून्य

पिछली जनगणना के मुताबिक राज्य में मुस्लिम आबादी 19.2 प्रतिशत है। जिन इलाकों में पहलेे चरण में चुनाव हो रहे हैं, उनमें यह औसत और भी ज्यादा है। लेकिन पिछले लोकसभा चुुनाव में देश केे सबसे बड़े राज्य में इनका प्रतिनिधित्व शून्य रहा।

चुनाव में अपनी संख्या का इन्हें इतना सहारा जरूर है कि इनकी पहचान से जुड़े और भावनात्मक मुद्दों पर कुछ पार्टियों का सहारा मिलता है। लेकिन इस संख्या बल का इस्तेमाल अभी तक ये अपने आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करनेे के राह पर नहीं बढ़ सके हैं।

Muzzafarnagar ground report
IMAGE CREDIT: Photo by Mukesh Kejriwal
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