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मौलिक अधिकारों से अनजान बेघर लोग जीते नहीं, किसी तरह बचाते हैं अस्तित्व

कड़वी हकीकत: झुग्गीवासियों की पुनर्वास याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट की टिप्पणी

नई दिल्ली

Published: July 06, 2022 11:30:49 pm

नई दिल्ली. दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि बेघर लोग जीते नहीं, बल्कि किसी तरह से अपना अस्तित्व बचाते हैं। वे भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत प्रदान किए गए जीवन के मौलिक अधिकार से अनभिज्ञ होते हैं। हाई कोर्ट ने नई दिल्ली के रेलवे स्टेशन के विस्तार के समय प्रशासन की ओर से एक मलीन बस्ती (स्लम) से दूसरी मलीन बस्ती में भेजे गए पांच व्यक्तियों के पुनर्वास का निर्देश देते हुए यह टिप्पणी की।
मौलिक अधिकारों से अनजान बेघर लोग जीते नहीं, किसी तरह बचाते हैं अस्तित्व
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हाई कोर्ट जस्टिस सी. हरिशंकर ने मामले में झुग्गीवासियों की ओर से दायर याचिका की सुनवाई करते हुए कहा कि झुग्गीवासी दरिद्रता से त्रस्त होते हैं। वे ऐसी जगहों पर मर्जी से नहीं रहते। झुग्गियों में रहने वाले लोगों का निवास स्थान उनके लिए संविधान की ओर से प्रदत्त आश्रय के अधिकार और उनके सिर पर छत से संबंधित अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार को सुरक्षित करने के लिए अंतिम प्रयास है।

प्रावधानों को लेकर न्यायपालिका को संवेदनशील रहने की आवश्यकता
जस्टिस सी. हरिशंकर ने कहा कि न्यायपालिका को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 38 एवं 39 के मद्देनजर संवेदनशील रहने की आवश्यकता है। संविधान के इन प्रावधानों के तहत सरकार का दायित्व है कि वह सभी के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित कर समाज से असमानता को कम करे।

याचिकाकर्ताओं को वैकल्पिक रिहाइश आवंटित करने का आदेश
हाई कोर्ट ने अपने 32 पन्नों के आदेश में पुनर्वास नीति के तहत रेलवे के समक्ष उपयुक्त दस्तावेज पेश करने की तारीख से छह महीने के भीतर याचिकाकर्ताओं को वैकल्पिक रिहाइश आवंटित करने का आदेश दिया।

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