Rajasthan High Court में Salve और Singhvi ने की सियासी संकट पर जिरह

  • राजस्थान के सियासी संकट ( rajasthan political crisis ) पर हाईकोर्ट ( Rajashtan High Court ) में हुई हाई वोल्टेज बहस।
  • सचिन पायलट ( Sachin Pilot ) की ओर से पहुंचे हरीश साल्वे ( Harish Salve ) ने बताया अभिव्यक्ति की आजादी का मुद्दा।
  • कांग्रेस ( Congress ) की ओर से अभिषेक मनु सिंघवी ( Abhishek Manu Sighvi ) ने याचिका को बताया प्रीमैच्योर।

 

 

जयपुर। राजस्थान में जारी सियासी संकट ( rajasthan political crisis ) शांत होता नहीं दिख रहा है। सचिन पायलट और उनके नेतृत्व वाले असंतुष्टों ने उन्हें विधायकों के रूप में अयोग्य ठहराने के कदम के खिलाफ कांग्रेस को अदालत में घसीट लिया है। राजस्थान हाईकोर्ट ( Rajashtan High Court ) में शुक्रवार को हरीश साल्वे ( Harish Salve ) और अभिषेक मनु सिंघवी ( Abhishek Manu Sighvi ) जैसे देश के दो नामी वकीलों के बीच हुई जिरह के बाद अब अदालत ने मामले की सुनवाई आगामी 20 जुलाई तक के लिए रोक दी है।

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दरअसल राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच की लड़ाई अब दिग्गज वकीलों के बीच होती नजर आ रही है। पूर्व में केंद्र में भाजपा की अगुवाई वाली सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाले हरीश साल्वे और मुकुल रोहतगी ( Mukul Rohatgi ) सचिन पायलट खेमे का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जबकि अशोक गहलोत ( Ashok Gehlot ) खेमे ने कांग्रेस ( Congress ) के दिग्गज नेता और वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी को मामला सौंपा है।

शुक्रवार को मामले की सुनवाई के दौरान राजस्थान हाईकोर्ट में हरीश साल्वे ने यह कहकर अपना तर्क समाप्त किया कि पायलट ( Sachin Pilot ) और अन्य विधायकों को स्पीकर द्वारा सौंपा गया अयोग्यता नोटिस अवैध है। जो विधायक राजस्थान से बाहर हैं, वे परेशान हैं, उन्हें राहत दी जाए।

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पायलट की तरफ से साल्वे ने तर्क दिया, "मैं सरकार को गिरा रहा हूं या किसी सीमा को पार कर एक पाप करता हूं, तो समझ में आता है कि मैं गलत हूं। लेकिन अगर मैं एक निष्ठावान मुख्यमंत्री चाहता हूं, भ्रष्ट और तानाशाही रवैये के खिलाफ बोलता हूं तो यह एक अधिकार है। मैं आर्टिकल 19 के तहत मिले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के तहत आवाज उठा रहा हूं। मैंने विधायक के रूप में सरकार को गिराने के लिए काम नहीं किया है।"

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राजस्थान उच्च न्यायालय में साल्वे ने कहा कि जब एक विधायक एक मुख्यमंत्री के भ्रष्ट आचरण और निरंकुश कार्यों के खिलाफ बोलता है और कार्रवाई करने के लिए अपने केंद्रीय नेतृत्व को जगाता है, तो यह अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार है बगावत नहीं। यूपी विधानसभा के राणा मामले का हवाला देते हुए, हरीश साल्वे ने तर्क दिया कि राजस्थान में हालात उत्तर प्रदेश के उलट है, जहां बसपा विधायक अपने सीएम को हटाने और सपा नेता को सीएम के रूप में नियुक्त करने के लिए राज्यपाल के पास गए और सपा को वोट दिया।

साल्वे ने आगे कहा कि सदन के बाहर के कार्यों के संबंध में व्हिप के निर्देशों का उल्लंघन संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत दल-बदल कानून के दायरे में नहीं आता है। मुख्यमंत्री के तानाशाही कामकाज को लेकर अपनी असहमति जताना अंदरूनी मामला है और इसमें कोई बुराई नहीं। जबकि अयोग्यता का नोटिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आंतरिक चर्चा को रोकने की कोशिश है।

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वहीं, विधानसभा अध्यक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने अपने तर्क में कहा कि सचिन पायलट की याचिका प्रीमैच्योर है ना कि चर्चा योग्य। सिंघवी ने यह भी कहा कि उक्त दल-बदल विरोधी कानून को निरस्त नहीं किया गया है, इसलिए अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती है।

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सचिन पायलट और बागी विधायकों की याचिका पर राजस्थान हाईकोर्ट में सुनवाई 20 जुलाई सोमवार को सुबह 10 बजे जारी रहेगी। अदालत ने निर्देश दिया कि तब तक सचिन पायलट और उनके शिविर के 18 विधायकों के खिलाफ अध्यक्ष कोई कार्रवाई नहीं करेंगे। सिंघवी सोमवार को अपना पक्ष प्रस्तुत करेंगे। अदालत ने राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष को 21 जुलाई को शाम 5:30 बजे तक सचिन पायलट और 18 विधायकों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया है।

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अमित कुमार बाजपेयी
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