बढ़ते अपराधों से बहस के केंद्र में आ गयी यूपी

नौकरशाह व पुलिस के आला अफ़सर भी बढ़ा रहे योगी सरकार की मुश्किलें

अपराधों से बदलती यूपी की पहचान

By: Vivek Shrivastava

Published: 07 Oct 2020, 01:55 PM IST

राजकेश्वर सिंह

उत्तर प्रदेश में कहां तो बात हो रही थी पूंजी निवेश, उद्योग, रोज़गार, राम मंदिर निर्माण, सबका साथ, सबका विकास व बहुत कुछ दूसरे मसलों पर और कहां अब सारी बहस अपराध और अपराधियों पर आकर टिक गई है। महिलाओं पर बढ़ते अपराधों ने सरकार को मुसीबत में डाल ही रखा है। उस पर भी प्रदेश पुलिस की अराजकता की हालिया कई घटनाओं ने सरकार की बुरी तरह फ़ज़ीहत करा रखी है। क़ानून-व्यवस्था सुधारने पर सारा फोकस होने के बाद भी आला अफ़सरों, नौकरशाहों की नाकामी ने सरकार को एक तरह से असहाय कर रखा है। सरकार चाहकर भी बहुत कुछ नही कर पा रही है।

हाथरस में दलित समुदाय की लड़की से दबंग वर्ग के लड़कों द्वारा रेप, उसकी जीभ काट देने, रीढ़ व गर्दन की हड्डियों को तोड़ देने और मौत के लगभग हफ़्ते भर बाद भी उत्तर प्रदेश इस दुस्साहसिक व जघन्य अपराध के लिए अब भी सुर्ख़ियों में है। इस घटना से जुड़कर हाथरस में बीते दिनों जो कुछ हुआ, उसको सरकार विपक्षियों की प्रदेश में दंगा कराने की साज़िश के रूप में देख रही है। उस लिहाज़ से सरकार इस मामले की तह तक जाने में भी जुट गई है, लेकिन हाथरस में पुलिस व प्रशासन ने जो मनमाना व ग़ैरक़ानूनी कार्रवाई की उससे उठे सवाल अब भी अनुत्तरित हैं। मसलन्, ज़िला प्रशासन की देखरेख में पुलिस वालों ने रेप पीड़िता की मां, पिता, परिजन व गांव वालों के विरोध के बावजूद हिंदू रीति-रिवाज को दरकिनार कर रात 2.30 बजे अंधेरे में रेप पीड़िता का दाह संस्कार करा देना। मौक़े पर मौजूद देश के मीडिया को भी वहां फटकने न देना। पीड़िता के गांव को ही सील करना। उसके परिजनों को धमकाना व कई दिनों तक किसी से मिलने न देना। ये वे सवाल हैं जिसका संतोषजनक जवाब अब तक नहीं आया है। अलबत्ता, प्रदेश के डीजीपी यह कह चुके हैं कि पीड़िता का रात में दाह संस्कार करने का फ़ैसला ज़िला प्रशासन का था। हालाकि डीजीपी के इस कथन के बाद भी सरकार अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकती। ज़िले के कप्तान समेत पांच पुलिस वालों के निलंबन के बाद हाथरस के ज़िलाधिकारी पर अब कार्रवाई न होना भी सवालों के घेरे में है। जबकि, महिलाओं के प्रति होने वाली रोज़ के आपराधिक घटनाओं को छोड़ भी दें तो हाल ही में बलरामपुर ज़िले की एक लड़की के साथ रेप और फिर उसकी मौत की घटना ने भी हाथरस के घाव को बढ़ा ही दिया है। जबकि प्रदेश की मौजूदा सरकार में ही उन्नाव रेप कांड पूरे देश, दुनिया में सुर्ख़ियों में रह चुका है, जिसमें भाजपा विधायक को सजा भी हो चुकी है।

राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ( एनसीआरबी) के आंकड़े भी यह गवाही देते हैं कि प्रदेश में महिलाओं पर सबसे ज़्यादा अत्याचार होते हैं। देशभर में 2018 की तुलना में 2019 में महिलाओं पर जितने अपराध हुए, उसमें उत्तर प्रदेश सबसे ऊपर है। राज्य में 2019 में महिलाओं पर ज़ुल्म-ज्यादती की लगभग 60 हज़ार घटनाएं हुईं, जो पूरे देश में महिलाओं के प्रति हुए कुल अपराधों का लगभग 15 प्रतिशत है। दहेज और छेड़खानी के मामले में भी उत्तर प्रदेश की स्थिति ज़्यादा ख़राब है। स्थिति की गंभीरता का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 2019 में देश में लड़कियों, महिलाओं पर एसिड अटैक की कुल 150 घटनाएं हुईं, जिनमें से 42 अकेले उत्तर प्रदेश में हुईं।

महिलाओं के प्रति उत्तर प्रदेश में बढ़ते अपराधों से इतर भी देखें तो दूसरी भी गंभीर क़िस्म की ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिसने सरकार के इक़बाल पर बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। ज्यादा दिन नहीं हुए, लखनऊ से महज़ 90 किमी दूर, एक तरह से सरकार की नाक के नीचे कानपुर के बिकरू कांड के अभी तीन महीने नहीं हुए हैं। जहां पुलिस के बड़े और छोटे अफ़सरों के संरक्षण में पले और बढ़े अपराधी विकास दुबे ने उसे पकड़ने गये आठ पुलिस वालों की ही हत्या कर दी। बाद में पता चला कि विकास दुबे व उसके साथियों ने अपराध की दुनिया का यह मुक़ाम राजनेताओें के साथ-साथ प्रशासन और पुलिस के आला अफ़सरों की बदौलत ही हासिल किया था। विकास के साथियों के रसूख़ शासन के आला अफ़सरों तक होने के बातें भी सामने आईं, लेकिन सरकार की तरफ़ से ऐसे अफ़सरों को कोई खरोच तक नहीं आई।

दरअसल उत्तर प्रदेश में बढ़ते अपराधों से सरकार की जितनी छवि ख़राब हो रही है, उतनी ही पुलिस व प्रशासन के कुछ बड़े-छोटे अधिकारियों की कारगुज़ारियाें से भी सरकार की फ़ज़ीहत हो रही है। उत्तर प्रदेश में ऐसा पहली बार हुआ, जब रिश्वत के आरोप में सरकार को अपने दो ज़िलों के कप्तानों ( भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी) को निलंबित करना पड़ा। कुछ दिनों पहले कुछ पुलिस थानों में महिला फरियादियों से पुलिस वालों के अश्लील हरकत या फिर अनुचित व्यवहार की घटनाओं ने भी सरकार के दामन को दाग़दार ही किया है। जबकि, इससे पहले खुद एक ज़िले कप्तान ने पांच अन्य पुलिस कप्तानों पर अवैध तरीक़े से लेन-देन के ज़रिए ट्रांसफ़र-पोस्टिंग कराने में शामिल होने का आरोप लगा शासन से शिकायत की थी। ये हालात सवाल पैदा करते हैं कि बीते साढ़े तीन वर्षों में उत्तर प्रदेश में ऐसा क्या हुआ कि सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद क़ानून-व्यवस्था के मामले में प्रदेश बुरी तरह से बेपटरी हो गया।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार व वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Vivek Shrivastava Reporting
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