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दुनिया में हर सेकंड चार फुटबॉल मैदान के बराबर बंजर हो रही है जमीन

हर वर्ष करीब 10 करोड़ हेक्टेयर भूमि खराब हो रही है।

जयपुरJun 17, 2024 / 12:17 am

pushpesh

न्यूयॉर्क. इंसानी गलतियों से जलवायु परिवर्तन में तेजी आई, अब जलवायु परिवर्तन के बहाने प्रकृति इसकी कीमत वसूल रही है। दुनिया की बड़ी आबादी अपने भोजन और अन्य जरूरतों के लिए भूमि की उर्वरता पर निर्भर है। लेकिन अब यह तेजी से कम हो रही है। रविवार को ही संयुक्त राष्ट्र ने बताया है कि हर सेकंड चार फुटबॉल मैदान के बराबर भूमि बंजर हो रही है, यानी हर वर्ष करीब 10 करोड़ हेक्टेयर भूमि खराब हो रही है। अब तक धरती का लगभग 40 फीसदी हिस्सा क्षरित हो चुका है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक मरूस्थलीकरण और सूखे के कारण दुनियाभर में लाखों लोगों के विस्थापन का खतरा पैदा हो गया है। क्योंकि स्वस्थ भूमि न केवल इंसान के 95 फीसदी भोजन की व्यवस्था करती है, बल्कि रोजगार और आश्रय भी देती है।
17 जून को ‘विश्व मरूस्थलीकरण एवं सूखा रोकथाम दिवस’ से पहले संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरस ने कहा, हम उस पृथ्वी को नष्ट कर रहे हैं, जो हमें जीवित रखती है। इस वर्ष की थीम है, भूमि के लिए एकजुट। हमारी विरासत। हमारा भविष्य। इस बार मुख्य आयोजन जर्मनी के बोन में होगा।
सूखे से हर वर्ष साढ़े 5.5 करोड़ लोग प्रभावित
मरूस्थलीकरण और सूखा दोनों ही परिस्थितियां एक दूसरी की पूरक हैं। जहां भूमि क्षरण या मरूस्थलीकरण ज्यादा होगा, वहां सूखे के हालात ज्यादा विकट होंगे। संयुक्त राष्ट के मुताबिक वर्ष 2000 के बाद हर वर्ष सूखे के कारण 5.5 करोड़ लोग प्रभावित होते हैं, जो पहले के मुकाबले 29 फीसदी ज्यादा है। 2050 तक सूखे के कारण दुनिया की तीन चौथाई आबादी प्रभावित होने का अनुमान है।
100 साल में 10 फीसदी बढ़ गया ‘सहारा’
नेशनल साइंस फाउंडेशन (एनएसएफ) की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया का सबसे बड़ा रेगिस्तान सहारा पिछले 100 वर्षों में 10 फीसदी बढ़ चुका है। अब ये हर साल साढ़े 7 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा तेजी से फैलने लगा है। सहारा ही नहीं, दुनिया के सारे बड़े रेगिस्तानों में फैलाव देखा जा रहा है। चीन और मंगोलिया में फैले गोबी के मरूस्थल का दायरा हर साल करीब 6 हजार वर्ग किमी बढ़ रहा है।
भारत में 30 फीसदी भूमि बंजर
स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरमेंट-2017 के मुताबिक भारत का लगभग 30त्न हिस्सा बंजर हो चुका है या रेगिस्तान बनने की कगार पर है। देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र 328.72 मिलियन हेक्टेयर में से 94.4 मिलियन हेक्टेयर रेगिस्तान बन चुका है।
ये है बड़ी वजह
वर्षा और सतही अपवाह के कारण मिट्टी की परत को होने वाला नुकसान। 10.98 फीसदी मरूस्थलीकरण के लिए यही जिम्मेदार है। इसके बाद वायु क्षरण है।
मरुस्थलीकरण के ये नुकसान
पर्यावरणीय प्रभाव: वनस्पति की हानि, मिट्टी में कटाव और उर्वरता में कमी।
आर्थिक प्रभाव: कृषि उत्पादकता प्रभावित होती है, जिससे खाद्य सुरक्षा कम होती है और गरीबी बढ़ती है।
सामाजिक प्रभाव: आबादी का विस्थापन हो सकता है, क्योंकि लोग अधिक उपजाऊ भूमि की तलाश में पलायन करते हैं।
भारत में मरुस्थलीकरण रोकने की पहल
-राष्ट्रीय हरित भारत मिशन (जीआईएम) से क्षतिग्रस्त पारिस्थितिकी तंत्र को बहाल करने में मदद मिलेगी।
-राष्ट्रीय वनरोपण कार्यक्रम वर्ष 2000 में शुरू किया गया।
-राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (एनएमएसए) से कृषि पद्धातियों में सुधार।
-मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के जरिए मिट्टी की गुणवत्ता का ध्यान।

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