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आइआइएससी ने विकसित की भू-जल से आर्सेनिक हटाने की नई विधि

स्वास्थ्य के लिए खतरनाक भारी धातु का भी हो सकेगा निपटान

बैंगलोरJun 15, 2024 / 07:20 pm

Rajeev Mishra

भारतीय विज्ञान संस्थान (आइआइएससी) के शोधकर्ताओं ने आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे भारी धात्विक प्रदूषकों को हटाकर पानी को शुद्ध करने की नई विधि विकसित की है। यह विधि तीन चरणों में पूरी होती है और यह सुनिश्चित करती है कि, जल से हटाए गए भारी धातु फिर से वातावरण में प्रवेश नहीं करें। उनका पर्यावरण अनुकूल तरीके से पूरी तरह निपटान कर दिया जाता है।
शोधकर्ताओं की टीम का नेतृत्व करने वाले सेंटर फॉर सस्टेनेबल टेक्नोलॉजीज विभाग के सहायक प्रोफेसर यज्ञसेनी रॉय ने कहा कि, मौजूदा हर तकनीक के जरिए पानी से आर्सेनिक को निकालकर स्वच्छ जल हासिल किया जा सकता है। लेकिन, आर्सेनिक को हटाने के बाद उसे छोड़ दिया जाता है जो फिर से भू-जल में मिल जाता है। यह नई विधि विकसित करने के पीछे सोच यही थी कि, इस समस्या का भी हल हो।
विषाक्त धातुओं का सहज निपटान संभव
उन्होंने बताया कि, इस प्रक्रिया में पहले प्रदूषित पानी को एक बायोडिग्रेडेबल एडसोर्बेंट बेड से गुजारना पड़ता जो कि चिटोसन से बना है। यह रेशेदार होता है। दूसरे चरण में सोडियम हाइड्राक्साइड और आर्सेनिक को एक प्रणाली के जरिए अलग किया जाता है। तीसरा चरण बायो-री-मेडिसिन में अकार्बनिक आर्सेनिक को कम जहरीले कार्बनिक आर्सेनिक में परिवर्तित कर दिया जाता है। आठ दिनों के भीतर इसकी विषाक्तता काफी कम हो जाती है और उसका कहीं भी निपटान किया जा सकता है। ये कार्बनिक प्रजातियां भू-जल में मौजूद अकार्बनिक पदार्थों से 50 गुणा कम विषाक्त होती हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक देश के 21 राज्यों के 113 जिलों में आर्सेनिक का स्तर 0.01 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक है। वहीं, 23 राज्यों के 223 जिलों में फ्लोराइड का स्तर 1.5 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक है। यह भारतीय मानक ब्यूरो और विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित सीमा से काफी अधिक है। ये प्रदूषत मानव और पशु स्वास्थ्य को काफी प्रभावित करते हैं।

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