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चरमपंथियों के लिए मददगार बन रहा है कनाडा का रवैया

भारत को समय-समय पर ‘विधि का शासन’ का पाठ पढ़ाने वाले कनाडा की संसद एक अलगाववादी अपराधी की बरसी पर यदि मौन रखे तो इससे न तो लोकतंत्र का भला होगा और न ही आतंकवाद पर लगाम लगेगी।

जयपुरJun 27, 2024 / 09:16 pm

Gyan Chand Patni

विनय कौड़ा
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ
कनाडा की उपप्रधानमंत्री क्रिस्टिया फ्रीलैंड के पास उस वक्त कोई जवाब नहीं था जब एक पत्रकार ने उनसे यह सवाल किया कि जिस खालिस्तानी अलगाववादी हरदीप सिंह निज्जर को कनाडा की सरकार ने ‘नो-फ्लाई सूची’ में रखा था और जिसकी मौत से पहले उसके बैंक खाते फ्रीज कर दिए गए थे, अब उसे सम्मानित करने का औचित्य क्या है? उस पत्रकार का इशारा कनाडा की संसद में निज्जर को श्रद्धांजलि देने की ओर था। आखिर क्या वजह है कि जिस अलगाववादी पर कनाडा की सरकार ने ही कानूनी पाबंदियां लगा रखी थीं, उसकी मौत के बाद उसे सम्मान क्यों दिया जा रहा है?
निज्जर कांड को बार-बार सार्वजनिक मंच से उठाकर प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो कनाडा में खालिस्तानी चरमपंथ को बढ़ावा दे रहे हैं। निज्जर कांड आज भारत और कनाडा के राजनयिक संबंधों में सबसे बड़ा अवरोध बन चुका है, लेकिन प्रधानमंत्री ट्रूडो ने आंखें मूंद रखी हैं। पिछले दिनों इटली में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ट्रूडो से एक संक्षिप्त मुलाकात हुई थी जिसमें ट्रूडो ने भारत के साथ मिलकर काम करने की इच्छा जताई थी। इसके बावजूद कनाडा अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर इस बात पर अफसोस जता चुके हैं कि भारत की चेतावनियों के बावजूद कनाडा उन भारतीयों को वीजा जारी कर रहा है जो संगठित अपराध से जुड़े हुए हैं। गौरतलब है कि भारत के शीर्ष आतंकियों की सूची में शुमार रहे निज्जर के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए भारत ने कई बार कनाडा से अनुरोध किया था लेकिन कनाडा की नागरिकता ले चुके सिख समुदाय के चरमपंथी वर्ग के वोट बैंक के डर से ट्रूडो ने इसको लगातार नजरअंदाज किया। पिछले साल 18 जून को ब्रिटिश कोलंबिया के एक गुरुद्वारे के बाहर गोली मारकर निज्जर की हत्या का आरोप ट्रूडो ने भारत पर लगाकर सनसनी फैला दी। बिना सबूत के बेतुके आरोपों से दोनों देशों के रिश्तों में खटास आ गई। हालांकि कनाडा की भड़काऊ हरकतों का भारत ने भी उसी भाषा में जवाब दिया है। वैंकूवर स्थित भारत के वाणिज्य दूतावास और कनाडा में भारतीय उच्चायुक्त ने ओटावा में 23 जून को कनिष्क आतंकी हमले की बरसी पर उस त्रासदी के पीडि़तों को श्रद्धांजलि दी। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी सोशल मीडिया संदेंश में कनिष्क विमान हादसे को आतंकवाद के इतिहास में सबसे बुरे कृत्यों में से एक बताया। दरअसल, कनिष्क विमान हादसा कनाडा की दुखती रग है क्योंकि कनाडा इसकी जांच कभी पूरी नहीं कर पाया और आज तक हादसे के किसी भी आरोपी को सजा नहीं हो पाई है।
एयर इंडिया की फ्लाइट-182 ने 22 जून 1985 को कनाडा के मॉन्ट्रियल एयरपोर्ट से नई दिल्ली के लिए उड़ान भरी थी। लेकिन 23 जून को आयरिश हवाई क्षेत्र में उड़ान के दौरान विमान में विस्फोट के बाद वह अटलांटिक महासागर में जा गिरा जिससे विमान में सवार सभी 329 लोग मारे गए जिसमें 268 तो कनाडा के ही नागरिक थे। ऑपरेशन ब्लू स्टार का प्रतिशोध लेने के लिए बब्बर खालसा के आतंकियों ने इस भयावह हमले को अंजाम दिया था। कनाडा ने भारत की चेतावनियों पर ध्यान नहीं दिया था। अब एक बार फिर कनाडा की सरकार वही गलती दोहरा रही है। खालिस्तानी आतंकियों का महिमामंडन किया जा रहा है। कनाडा की लोकतांत्रिक व्यवस्था और अभिव्यक्ति की आजादी के खास प्रावधानों का नाजायज फायदा उठाने में खालिस्तानी अलगाववादियों ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। असल में चरमपंथियों ने कनाडा के सिख वोटों पर अपनी अच्छी खासी पकड़ बना ली है और यही कारण है कि सरकार में उनका दबदबा बढ़ गया है। भारत को समय-समय पर ‘विधि का शासन’ का पाठ पढ़ाने वाले कनाडा की संसद एक अलगाववादी अपराधी की बरसी पर यदि मौन रखे तो इससे न तो लोकतंत्र का भला होगा और न ही आतंकवाद पर लगाम लगेगी।

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