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नाहरगढ़ सेंचुरी की 55 बीघा जमीन प्रशासन ने हेराफेरी कर जेडीए के नाम की, इस पर खड़ी है इंडस्ट्री

सरिस्का टाइगर रिजर्व हो या फिर नाहरगढ़ सेंचुरी। हर किसी की जमीन को होटल, इंडस्ट्री के लिए खुर्द-बुर्द किया जा रहा है। यह खुद सरकारी अमला करवा रहा है। यही कारण है कि जयपुर प्रशासन ने नाहरगढ़ सेंचुरी की 55 बीघा जमीन हेराफेरी करके जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) के नाम कर दी।

अलवरJul 05, 2024 / 11:05 am

susheel kumar

– सहायक वन संरक्षक जयपुर की जांच में खुलासा, संचालित इंडस्ट्री सीज करने व केस दायर करने की संस्तुति

– उप वन संरक्षक चिडि़याघर को सौंपी रिपोर्ट, जेडीए से भूमि वापस लेने को कहा, जिम्मेदारों पर भी हो कार्रवाई
सरिस्का टाइगर रिजर्व हो या फिर नाहरगढ़ सेंचुरी। हर किसी की जमीन को होटल, इंडस्ट्री के लिए खुर्द-बुर्द किया जा रहा है। यह खुद सरकारी अमला करवा रहा है। यही कारण है कि जयपुर प्रशासन ने नाहरगढ़ सेंचुरी की 55 बीघा जमीन हेराफेरी करके जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) के नाम कर दी। वर्तमान में इस जमीन पर इंडस्ट्री चल रही है। इसका खुलासा सहायक वन संरक्षक जयपुर गजनफर अली जैदी (वर्तमान में कोटा डीसीएफ) की जांच में हुआ है। उन्होंने इंडस्ट्री को सीज करके इसका मामला वन विभाग के न्यायालय में चलाने की संस्तुति की है। उप वन संरक्षक चिडि़याघर से यह भी कहा है कि जेडीए से वन विभाग की जमीन वापस ली जाए। रिकॉर्ड भी दुरुस्त कराया जाए। इस मामले में जिम्मेदारों पर कार्रवाई भी होनी चाहिए। यह जांच नाहरगढ़ वन एवं वन्यजीव अभयारण्य सुरक्षा एवं विकास समिति की ओर से सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी व केंद्र सरकार को भेजी शिकायत के बाद सामने आई है। इसे दबाने के लिए पूरा सरकारी अमला लगा हुआ है। यही कारण है कि जांच में की गई संस्तुतियों पर कार्रवाई नहीं की।
यह है जांच रिपोर्ट

– जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि राजस्थान स्मॉल स्केल कॉटेज इंडस्ट्री आमेर विशाल व्यावसायिक प्रतिष्ठान है, जिसमें कई प्रकार की व्यावसायिक गतिविधियां की जाती हैं। यह प्रतिष्ठान अभयारण्य के अनुमोदित नक्शे के अनुसार पूर्वी सीमा में आता है। यह सीमा पर्पल लाइन से अभयारण्य सीमा आमेर-दिल्ली रोड दर्शाई गई है। इस प्रकार यह प्रतिष्ठान नाहरगढ़ वन्यजीव अभयारण्य व इको सेंसेटिव जोन के अंदर है।
– राजस्व रिकॉर्ड के अभिलेखों के आधार पर अभयारण्य के आरक्षित वन क्षेत्र ग्राम मौजा आमेर वन खंड आमेर-54 के पुराना खसरा नंबर 932/1 के हाल खसरा नंबर 4354, 4355, 4356 में इंडस्ट्री ने अतिक्रमण किया है। वन विभाग की भी अनुमति नहीं है। यह वन एवं वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972, वन संरक्षण अधिनियम 1980 की धारा दो व सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना है।
इस तरह बदल दिए गए खसरा नंबर

गूगल सुपर इम्पाॅज नक्शे के अनुसार यह प्रतिष्ठान खसरा नंबर 4353 में है, जिसका एरिया 14.05 हैक्टेयर है, जो कि जेडीए के नाम अमलदराज है। उसके बाद इस खसरे का मिलान क्षेत्रफल कलक्ट्रेट जयपुर से लिया गया, जिसमें खसरे का पुराना नंबर 932/2 है। जिसका राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार न तो कोई पुरानी जमाबंदी है और न ही इसका कहीं इंद्राज है। न ही इस खसरे के नाम अमलदराज है। इसका क्षेत्रफल 110 बीघा 17 बिस्वा है। मिलान क्षेत्रफल के अनुसार 932/1 का नया खसरा नंबर 4354, 4355, 4356 है, जिसका क्षेत्रफल 20.55 हैक्टेयर है। इससे साफ है कि राजस्व विभाग ने वन विभाग के खसरों एवं वन भूमि के साथ छेड़छाड़ करके राजस्व रिकॉर्ड में हेराफेरी की। वन विभाग की शेष भूमि लगभग 28 बीघा वन भूमि को निकालकर उसे नया खसरा नंबर 932/2 दिया गया। इस खसरे को नया खसरा नंबर 4353 दिया जो कि जेडीए के नाम से गैर मुमकिन पहाड़ से अमलदराज है। यह रकबा 55 बीघा है। इस तरह शुरू से ही यह खसरा नंबर स्वीकार्य योग्य नहीं है। जांच अधिकारी ने इंडस्ट्री संचालक से भी जवाब मांगा था लेकिन वह सामने नहीं आए।
राजस्व रिकॉर्ड में वन विभाग के खसरों को बदलकर करीब 55 बीघा जमीन जेडीए के नाम कर दी गई। इस पर इंडस्ट्री स्थापित है। इंडस्ट्री सीज करने के लिए कहा गया है। आगे की कार्रवाई उप वन संरक्षक वन्यजीव चिडि़याघर जयपुर करेंगे।
– गजनफर अली जैदी, जांच अधिकारी

यह मामला मेरे संज्ञान में नहीं है। जांच रिपोर्ट का पता करके कार्रवाई करेंगे। सेंचुरी की जमीन पर अतिक्रमण नहीं हो सकता।

— जगदीश गुप्ता, उप वन संरक्षक वन्यजीव चिडि़याघर जयपुर
मेरी जानकारी में प्रकरण नहीं है। इसको दिखवाया जाएगा।

– बजरंग, एसडीएम आमेर जयपुर

सेंचुरी की जमीन पर अतिक्रमण पर अतिक्रमण हो रहे हैं। जांच रिपोर्ट आ गई लेकिन कार्रवाई अफसर नहीं कर रहे हैं। अब यह प्रकरण एनजीटी में ले जाएंगे।
– राजेंद्र तिवारी, अध्यक्ष, नाहरगढ़ वन एवं वन्यजीव अभयारण्य सुरक्षा एवं विकास समिति

मेरी इंडस्ट्री नहीं, ट्रेडिंग शॉप है, जिसके सभी अभिलेख मेरे पास हैं। इसकी स्थापना 1966 में हुई थी। करीब 35 साल से कॉमर्शियल एक्टिविटी हो रही हैं। न कोई शोर होता है और न कोई अन्य व्यक्ति प्रभावित होता है। इसके पास बस्ती बसी हुई है। यह जमीन वन विभाग की नहीं है। जेडीए, राजस्व विभाग ने गड़बड़ी की है तो वन विभाग उनके पास जाए। जांच रिपोर्ट मेरे पास नहीं आई है।
– महेश गुप्ता, संचालक, राजस्थान स्मॉल स्केल कॉटेज इंडस्ट्री आमेर

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