फिल्म के प्रारंभ में राष्ट्रगान, लोग खुश या नाखुश

Bhanu Pratap

Publish: Nov, 30 2016 10:47:00 (IST)

Agra, Uttar Pradesh, India
फिल्म के प्रारंभ में राष्ट्रगान, लोग खुश या नाखुश

सर्वोच्च न्यायालय ने सिनेमा हॉल में पिक्चर शुरू होने से पूर्व राष्ट्रगान अनिवार्य कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय पर लोगों ने मिलीजुली प्रतिक्रिया दी है।

आगरा। सर्वोच्च न्यायालय ने सिनेमा हॉल में पिक्चर शुरू होने से पूर्व राष्ट्रगान अनिवार्य कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से लोग खुश हैं तो साथ ही कुछ व्यावहारिक समस्याएं भी बता रहे हैं। कुछ ने इसे व्यर्थ की बंदिश बताया है।


राष्ट्रभक्ति की उमंग जाग्रत होगी
प्रगतिशील किसान और वकील चैतन्य पालीवल एडवोकेट सिनेमा हॉल में पिक्चर शुरू होने से पहले राष्ट्रगान, सिनेमा स्क्रीन पर तिरंगा और दर्शकों का सम्मान में खड़ा होना संबंधी सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर बहुत खुश हैं। श्री पालीवाल कहते हैं राष्ट्रीय भाव जगाने के लिए राष्ट्रगान एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। स्कूल से निकलते ही शाद ही कोई नागरिक राष्ट्रगान में भाग ले पाता है। इसके बाद हम सिवाय जब कभी टीवी स्क्रीन पर 26 जनवरी की परेड के अतिरिक्त खेल प्रतियोगिता आदि मैं राष्ट्रगान की धुन तो सुन पाते हैं, लेकिन राष्ट्रगान में भाग कभी नहीं ले पाते। ज़्यादातर लोगों को राष्ट्रगान याद भी नहीं होता है। अब यदि सिनेमा हाल में ही सही राष्ट्रगान अनिवार्य हुआ है तो निश्चय ही इससे राष्ट्रभक्ति की उमंग जाग्रत होगी।


स्वागत योग्य कदम
आगरा के एडवोकेट आमीर अहमद जाफरी कहते हैं ‘सुप्रीम कोर्ट का निर्देश निश्चय ही स्वागत योग्य है। राष्ट्रगान कहीं भी हो, हमेशा वतन से मोहब्बत का जज्बा पैदा करता है। 


व्यावहारिक समस्या
इस निर्णय की अव्यावहारिकता के बारे में ध्यान आकर्षित करते हुए व्यापारी संजय अग्रवाल कहते हैं ‘सिनेमा हॉल मैं राष्ट्रगान की प्रथा पहले भी थी लेकिन वह गायन फिल्म के बाद होता था। तब अक्सर हर दर्शक को जल्दी रहती थी, तो किसी को ये देखने का खयाल नहीं होता था कि दूसरा दर्शक क्या कर रहा है। अब फिल्म की शुरुआत में कोई दर्शक बैठा रह जाय अथवा कुछ बोले या हरकत करेगा तो विवाद हो सकता है। यहाँ दर्शक का धर्म भी कुछ अप्रिय स्थिति पैदा कर सकता है। 


व्यर्थ की बंदिश
सैमरा (खंदौली) के किसान और पूर्व प्रधान मुकेश चौहान का कहना है कि व्यक्ति मनोरंजन और अपना तनाव कम करने के लिए सिनेमा हॉल में जाता है, तब उस पर ये व्यर्थ की बंदिश क्यों? क्या राष्ट्रभक्ति जबरन लादने की चीज है। वैसे जो नागरिक राष्ट्रभक्ति अपनी शेष जीवनचर्या में नहीं सीख पाया हो, वो एक सिनेमा जैसी हिंसक और अपराधपूर्ण थीम के साथ क्या एक राष्ट्रगान के सहारे सीख जाएगा?


अनुपालन कौन कराएगा
युवा लालकृष्ण गोयल के मन में सवाल है कि उक्त निर्णय के पालन की व्यवस्थाएं कौन सुनिश्चित करेगा। पिक्चर हॉल संचालक केवल राष्ट्रगान की व्यवस्थाएँ ही कर सकता है, शेष सारी स्थितियां वे ही हैं, जिनके कारण पूर्व में राष्ट्रगान की परंपरा बंद की गयी होगी। अंततः किसी विशेष युद्धकाल या अन्य किसी अकाल आदि विशेष परिस्थितियों में राष्ट्रगान द्वारा राष्ट्रीयभाव पैदा करने का कोई औचित्य बनता है। सामान्य परिस्थितियों में तो ये केवल राष्ट्रगान के अपमान जैसे विवादों को ही जन्म देगा।

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