बेटी के शव को लेकर आठ किलोमीटर तक पैदल चलता रहा आदिवासी किसान, पर नहीं मिला सहारा

Allahabad, Uttar Pradesh, India
 बेटी के शव को लेकर आठ किलोमीटर तक पैदल चलता रहा आदिवासी किसान, पर नहीं मिला सहारा

प्रसव पीड़ा से कराहती रही महिला पर डाक्टरों ने पैसे के अभाव में उसे भर्ती तक नहीं किया

इलाहाबाद. सूबे के डिप्टी सीएम और स्वास्थ्य मंत्री के गृह नगर में इंसानियत का बेरहम चेहरा सामने आया। आदिवासी किसान प्रसव के दर्द से तड़पती अपनी  गर्वभती पत्नी को लेकर एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में भटकता रहा पर पैसे न होने की वजह से उसे कहीं दाखिला नहीं मिला। आखिरकार रातभर दर्द से कराहती रही। किसी तरह से स्वरूपरानी अस्पताल में देर रात उसे दाखिला मिला भी तो आॅपरेशन के बाद पता चला कि पेट में पल रही उसकी बेटी की सांसे रूक चुकी हैं। इतना ही नहीं बेटी के शव को लेकर पिता को पैसे न होने की वजह से आठ किलोमीटर संगम के किनारे तक पैदल ही ले जाना पड़ा। इस दृश्य को लोग देखते रहे पर किसी ने एक बार भी उसकी मदद करने की कोशिश तक नहीं की। बड़े-बड़े दावों और खुद को गरीबों और पिछड़ों का दर्द समझने का दावा करने वाली सरकार के चार कैबिनेट मंत्रियों के शहर का यह आलम है ।

जिला मुख्यालय से लगभग 80 किलोमीटर दूर के खीरी इलाके के आदिवासी समुदाय का किसान जिसने अपने परिवार के साथ अपने घर में आने वाली खुशियों का इंतज़ार किया। लेकिन अचानक सारी उम्मीदे उस समय टूट गई जब धरती के भगवान ने मुह मोड़ लिया।



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पैसे की वजह से अस्पताल में नहीं मिला दाखिला

गरीब किसान सूबे लाल के पत्नी को अचानक प्रसव पीड़ा हुई तो वो अपनी पत्नी को लेकर स्थानीय खीरी के प्राथमिक उपकेंद्र पहुंचा।लेकिन दिन में भी उसे वहां इलाज नही मिल सका। क्यों की वहां डॉक्टर नही थे और वार्ड ब्याय ने एडमिट करने से मना कर दिया। उसके बाद आदिवासी किसान को खीरी से लगभग 30 दूर अपनी पत्नी को लेकर कोरांव पहुंचा । वहां भी उसे डॉक्टर नही मिला। और पत्नी की हालात गंभीर बनी हुई थी तो उसे लेकर प्राइवेट अस्पताल गया वहां डॉक्टरों ने पैसा न होने की वजह से एडमिट नही किया।




डाक्टरों ने एडमिट करने से मना किया

उसने डॉक्टरों से निवेदन किया कि उसे शहर के किसी अस्पताल पहुंचा दें और एंबुलेंस की व्यवस्था करा दे । लेकिन उसका दर्द और उसकी आवाज को किसी ने नहीं सुना किसान आॅटो से इलाहाबाद के सरकारी अस्पताल बेली पहुंचा। वहां डॉक्टरों ने उसे एडमिट करने से मना कर दिया। वहां से डफरिन पहुंचा। डफरिन अस्पताल ने भी उसकी नही सुनी गई। देर रात एक बजे स्वरूपरानी अस्पताल पहुंचा । जहां उसे एडमिट तो किया गया। लेकिन इस बीच किसान की पत्नी के पेट मे पल रहे बच्ची की तब तक मौत हो चुकी थी ।



गर्भ में ही रूक गई सांसे
रात भर में तड़पती महिला का सुबह सात बजे ऑपरेशन कर बच्ची के शव को निकाला गया। इस दौरान किसान की पत्नी की हालत खराब हो गई उसे आईसीयू में भर्ती किया गया है।किसान के पास जो भी पैसे थे वो टेम्पो और यहां तक पहुचँने में चला गया। दर्द से तड़पती महिला को पता भी नही चला की नौ माह तक जिसे अपनी कोख में पाला वो जन्म लेने के बाद उसकी मौत हो गई । जिसकी वजह सिर्फ यह की उसे समय पर इलाज नही मिला।



आठ किलोमीटर तक शव को लेकर चलता रहा किसान

आदिवासी किसान का दर्द यही कम नही हुआ। इंसानियत का क्रूर चेहरा तब और भयानक दिखा जब वह अपनी मृत बच्ची के शव को लेकर अस्पताल से निकला लेकिन उसे कोई एम्बुलेंस नही मिली। कोई उसे स्वरूप रानी अस्पताल से संगम तक ले जाने को तैयार नही हुआ। आठ किलोमीटर पैदल गया। अपनी बेटी का अंतिम संस्कार करने तपती धूप में कलेजे के टुकड़े को गोद में लेकर रोता रहा और लोग देखते रहे।

क्या गरीब सिर्फ राजनीतिक मोहरा है
एक तरफ जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और यूपी के सीएम योगी जहां गरीबों और आदिवासियों के घर में खाना खाने और उनके घर जाने की होड़ में लगे है। तो वही आदिवासियों और दलितों के परिवारों में जाने का राजनीतिक खेल बिल्कुल चरम पर है। जिसमे नेताओ के जाने का सोशल साइट पर फोटो और वीडियो शेयर कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेक रहे है। वही उन्हीं की सरकार और उन्हीं के राज्य में एक आदिवासी और उसके पूरे परिवार की खुशियां इअलिये इसलिए बिखर गई कि उसके होने वाले बच्चे को समय पर इलाज नहीं मिल पाता है और उसकी मौत हो जाती है।

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