आचार्य श्री द्वारा रचित मूक माटी महाकाव्य के गुजराती संस्करण का हुआ विमोचन

veerendra singh

Publish: Oct, 18 2016 09:59:00 (IST)

Ashoknagar, Madhya Pradesh, India
आचार्य श्री द्वारा रचित मूक माटी महाकाव्य के गुजराती संस्करण का हुआ विमोचन

गुजरात के भरत कापडिय़ा ने किया गुजराती भाषा में अनुवाद, मुनिसंघ के सानिध्य में हुए कार्यक्रम, जैन समाज ने किया सम्मान


अशोकनगर.
आचार्य भगवन ने बहुत साहित्य लिखा हैजिसमें सबसे ज्यादा चर्चित मूक माटी महाकाव्य है। मूक माटी महा काव्य का तीन बार अंग्रेजी में, तीन बार मराठी, बंगला एवं कन्नड़ में अनुवाद किया गया है तथा एक बार गुजराती में भी अनुवाद हुआ जिसे 14 अक्टूबर को भोपाल में प्रधानमंत्री ने अपनी भाषा में उस काव्य साहित्य को पढ़ा।  यह बात मुनिश्री अभयसागर जी महाराज ने मूक माटी महाकाव्य के गुजराती संस्करण के विमोचन अवसर पर बताई। उन्होने बताया कि आचार्य भगवन की दिव्य देसना को पढऩे का अवसर मिलेगा तो बहुमान होगा।

मंगलवार प्रात: सुभाषगंज जैन मंदिर में आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज द्वारा रचित सबसे अधिक लोकप्रिय कृति मूक माटी महाकाव्य के गुजराती संस्करण का विमोचन जैन समाज के अध्यक्ष रमेश चौधरी ने गुजरात के राजकोट से भरतजी कापडिय़ा उनकी जीवन संिगनी गीता कापडिय़ा, ब्रह्मचारिणी बहिन बिन्दु दीदी, ऊषा दीदी द्वारा मुनिश्री के सानिध्य में किया गया। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भरतजी कापडिय़ा द्वारा बताया गया कि टीकमगढ़ में मुनिश्री अभयसागर जी की प्रेरणा से हमें मूक माटी महाकाव्य का गुजराती अनुवाद करने का निर्देश मिला था। जब-जब जो भी साहित्य की आवश्यकता पड़ी मुनिश्री की प्रेरणा से हमें उपलब्ध हुआ तथा आचार्य श्री के आर्शीवाद से हम महाकाव्य का हिन्दी से गुजराती अनुवाद कर सके।

इस दौरान जैन पंचायत के महामंत्री महेन्द्र कड़ेसरा ने बताया कि आचार्य श्री की वाणी जन-जन तक पहुंच सके इसके लिए हमने मूक माटी महाकाव्य के गुजराती संस्करण की सौ प्रतियां भरतजी को गुजरात में विश्वविद्यालयों एवं अन्य साहित्य सृजन के लिए दी हैं जिन्हे वह अपने क्षेत्र के शिक्षण संस्थानों में अध्ययन करने के लिए दे सकेंगे। इस दौरान जैन समाज के पदाधिकारियों द्वारा भरतजी को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया तथा गीताजी को ब्रह्मचारिणी बहिनों ने स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया।   

धर्म सभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री अभय सागर जी महाराज ने बताया कि लोक अलोक है जो आकाश के बीच विद्यमान है लोक अनंत आत्मिक है जिसमें गणित की प्रक्रिया से लोक अलोक का वर्णन होता है वह करूणानुयोग कहलाता है। उन्होने बताया कि युग के परिवर्तन की जानकारी करूणानुयोग में मिलती है आगम में हर बात की निश्चित व्यवस्था बताई गई है। स्वास्तिक में आगम की बात प्रतीक रूप में बताई गई है नीचे की ओर एक ध्वजा हैवह नरक गति का प्रतीक है। बाजूवाली तिरछी बनी हैवह आड़ी लाईन तिर्यंच गति को आपको बता रही है। मध्य लोक में भ्रमण करने के साईड की लाईन पाप करोगे तो नीचे तक तथा निगोती यात्रा हो सकती है तथा सत्कर्मों से मनुष्य गति पुण्य का संचय होगा। कर्मकाण्ड की चार गतियां हैं तथा आचार्य की पांचवी गति होती है जो सिद्ध गति है। ऐसा करूणानुयोग ग्रन्थ है इसमें हम किन कारणों से हमारी चारों गतियों में भटकन होती है और कैसे हम पांचवी गति मोक्ष गति को प्राप्त कर सकते हैं यह सब हमें करूणानुयोग में मिलता है।

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