शुक्र पर भारत का मिशन वर्ष 2020 के बाद

Shankar Sharma

Publish: Apr, 21 2017 11:46:00 (IST)

Bangalore, Karnataka, India
शुक्र पर भारत का मिशन वर्ष 2020 के बाद

चांद और मंगल पर सफल अभियान भेज चुका भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) अब शुक्र पर अभियान भेजने की योजना बना रहा है। इसरो ने वैज्ञानिकों से शुक्र मिशन के लिए सुझाव भी आमंत्रित किए हैं

बेंगलूरु. चांद और मंगल पर सफल अभियान भेज चुका भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) अब शुक्र पर अभियान भेजने की योजना बना रहा है। इसरो ने वैज्ञानिकों से शुक्र मिशन के लिए सुझाव भी आमंत्रित किए हैं। इसमें वैज्ञानिकों से कहा गया है कि शुक्र के किन-किन पहलुओं का अध्ययन किया जाए उसके बारे में सुझाव दें।


हालांकि, इसरो के उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार शुक्र पर मिशन वर्ष 2020 से पहले नहीं भेजा जाएगा। योजना के तहत शुक्र पर भेजे जाने वाले आर्बिटर को पहले उसकी दीर्घ वत्ताकार कक्षा में स्थापित किया जाएगा फिर उसे शुक्र ग्रह के करीब लाया जाएगा।

शुरुआती योजना के अनुसार 175 किलोग्राम वजनी एक वैज्ञानिक उपकरण यान के साथ भेजा जाएगा 500 वॉट ऊर्जा से चालित होगा। वैज्ञानिक समुदाय को 19 मई की समय सीमा दी गई है और उनसे अंतरिक्ष आधारित अध्ययन के लिए सुझाव मांगे गए हैं। इसरो अधिकारियों का कहना है कि अवसर की घोषणा केवल एक शुरुआत है। इसके बाद मिशन पर विस्तृत अध्ययन होगा।


और परियोजना रिपोर्ट तैयार की जाएगी जिसे मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। मिशन को मंजूरी मिलने के बाद ही उस पर काम शुरू होगा। सबसे पहले अंतरिक्ष विज्ञान पर गठित इसरो की सलाहकार समिति से यह मंजूरी हासिल करनी होगी उसके बाद अंतरिक्ष आयोग और अंत में केंद्र सरकार से मंजूरी लेनी होगी। यह वर्ष 2020 से पहले संभव नहीं होगा।

वैज्ञानिकों के लिए होता है अवसर
गौरतलब है कि पत्रिका के साथ बातचीत में इसरो अध्यक्ष एएस किरण कुमार ने कहा था कि ग्रहों पर मिशन भेजना जरूरी होता है क्योंकि वह दूसरे मिशनों के लिए काफी उपयोगी साबित होती है। ग्रहों पर भेजे जाने वाले मिशन में स्वचालित प्रणालियों (ऑटोनामी फीचर्स) का अधिकतम इस्तेमाल होता है।

मंगलयान उपग्रह के बाद जो भी उपग्रह बना रहे हैं उसमें ऑटोनामी फीचर्स बढ़ाए जा रहे हैं। ग्रहों पर भेजे जाने वाले मिशन काफी दूर तक जाते हैं जिससे वैज्ञानिकों की क्षमता को चुनौती मिलती है और उन्हें अपनी क्षमता बढ़ाने का अवसर मिलता है। चूंकि, विश्व के अन्य अंतरिक्ष संपन्न देश बहुत तेजी से तरक्की कर रहे हैं इसलिए भारत को भी ऐसे मिशन भेजने होंगे। इससे पहले इसरो ने वर्ष 2013 में महज 450 करोड़ की लागत से मंगल ग्रह पर मिशन भेजा जो अभी भी लाल ग्रह की कक्षा में चक्कर लगा रहा है।


मंगलयान से पहले इसरो ने वर्ष 2008   में चांद पर पहला मिशन चंद्रयान-1 भेजा था और अगले वर्ष दूसरा चंद्र मिशन चंद्रयान-2 भेजने की योजना है।


शुक्र पर अब तक
वर्ष 1963 में अमरीका ने मैरिनर-2 रोबोटिक स्पेस प्रोब भेजा था। उसके बाद वर्ष 1970 में सोवियत संघ का अंतरिक्षयान वेनेरा-7 शुक्र की सतह पर उतरा और धरती पर काफी आंकड़े भेजे। वर्ष 1978  में नासा की शुक्र पर पायनियर वेनस परियोजना से भी शुक्र के बारे में काफी जानकारियां मिली। वर्ष 198 0 से 90 के बीच शुक्र पर कई फ्लाई-बाई मिशन भेजे गए। अप्रेल 2006  में यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ने शुक्र पर दीर्घावधि मिशन के तहत वेनस एक्सप्रेस भेजा। वहीं वर्ष 2015 में जापान ने अपना मिशन अकात्सुकी भेजा।

धरती का नजदीकी ग्रह
सौरमंडल में सूर्य से दूरी के हिसाब से शुक्र दूसरे स्थान पर है। कई मायनों में यह धरती जैसा है। सूर्य का एक परिभ्रमण यह 225 दिनों में ही पूरा कर लेता है। सूर्य से करीब होने के कारण यह काफी गर्म है। अगर इसरो शुक्र पर सफलतापूर्वक मिशन भेजता है तो यह एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी।

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