स्वदेशी स्पेस शटल के दूसरे परीक्षण की तैयारी में इसरो

Shankar Sharma

Publish: Jul, 18 2017 05:45:00 (IST)

Bangalore, Karnataka, India
स्वदेशी स्पेस शटल के दूसरे परीक्षण की तैयारी में इसरो

स्वदेशी शटल यानी दोबारा उपयोग में लाए जाने वाले प्रक्षेपण यान (आरएलवी-टीडी) के दूसरे प्रायोगिक प्रक्षेपण की तैयारियां शुरू हो गई हैं

बेंगलूरु. स्वदेशी शटल यानी दोबारा उपयोग में लाए जाने वाले प्रक्षेपण यान (आरएलवी-टीडी) के दूसरे प्रायोगिक प्रक्षेपण की तैयारियां शुरू हो गई हैं। अगर सबकुछ ठीक रहा तो भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) एक साल के भीतर आरएलवी का दूसरा परीक्षण कर लेगा। पहले प्रायोगिक प्रक्षेपण के दौरान डेल्टा विंग वाले वायुयान के आकार के स्पेस शटल को अंतरिक्ष में भेजकर बंगाल की खाड़ी में उतारा गया था लेकिन दूसरे परीक्षण में शटल को जमीन पर लैंड कराने की तैयारी है।

इसरो के उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार तिरुवनंतपुरम स्थित विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (वीएसएससी) में दूसरे आरएलवी-टीडी के परीक्षण की तैयारियां प्रगति पर है। आरएलवी-टीडी प्रोटोटाइप-2 भी पहले आरएलवी के जैसा ही होगा लेकिन इसमें एक अतिरिक्त फीचर होगा और वह है लैंडिंग गियर। इसरो अधिकारियों के मुताबिक अगले एक साल में आरएलवी का यह दूसरा मॉडल तैयार हो जाने की उम्मीद है।

दूसरे परीक्षण की वर्तमान योजना के मुताबिक उसे कोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से छोड़ा जाएगा और देशके पूर्वोत्तर राज्यों में वायुसेना की एक गुप्त हवाई पट्टी पर उतार लिया जाएगा।

हालांकि, इसपर अभी अंतिम फैसला होना बाकी है। दोबारा उपयोग में लाए जाने वाले रॉकेट (री-यूजेबल लांच व्हीकल, आरएलवी) के विकास की दिशा में इसरो ने पिछले साल 23  मई को ऐतिहासिक उड़ान भरी थी जब 1.5 टन वजनी स्वदेशी स्पेस शटल को अंतरिक्ष में लगभग 65 किलोमीटर की ऊंचाई पर भेजकर पुन: बंगाल की खाड़ी में सफलता पूर्वक उतार लिया था। पढ़ें स्वदेशी  ञ्च पेज 06


अंतरिक्ष कार्यक्रमों की लागत घटाने के उद्देश्य से पूर्णत: स्वदेशी तकनीक से विकसित किए जा रहे भारतीय स्पेस शटल के तैयार होने के लिए कम से कम 4 से 5 परीक्षण आवश्यक होंगे और इसमें 10 से 15 साल का वक्त लग जाएगा। पूर्ण रूप से विकसित आरएलवी का उपयोग उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए कई बार किया जा सकेगा।

इस बीच पहले प्रायोगिक परीक्षण से प्राप्त आंकड़ों के विश्लेषण के बाद दूसरे परीक्षण में स्पेस शटल में कुछ अहम तकनीकी बदलाव किए जा सकते हैं। विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र दूसरे आरएलवी के विकास की मुख्य जिम्मेदारी निभा रहा है। वहीं इसरो के अन्य केंद्र जैसे इसरो इनर्शियल सिस्टम्स यूनिट तिरुवनंतपुरम, और इसरो उपग्रह अनुप्रयोग केंद्र अहमदाबाद, इसके लिए नेविगेशनल उपकरण आदि मुहैया करा रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र की विमान निर्माता कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को लैडिंग गियर तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

Rajasthan Patrika Live TV

1
Ad Block is Banned