अब मंगल के मानसून का आकलन करेगा मंगलयान

Shankar Sharma

Publish: Jun, 20 2017 04:58:00 (IST)

Bangalore, Karnataka, India
अब मंगल के मानसून का आकलन करेगा मंगलयान

बेंगलूरु.अपने जीवनकाल काल से छह गुना ज्यादा सफर कर चुका मंगलयान अब भी सक्रिय है। इसरो लाल  ग्रह के नए रहस्यों  का अध्ययन करने के लिए अब भी मंगलयान का उपयोग कर रहा है


राजीव मिश्रा
बेंगलूरु. अपने जीवनकाल काल से छह गुना ज्यादा सफर कर चुका मंगलयान अब भी सक्रिय है। इसरो लाल  ग्रह के नए रहस्यों  का अध्ययन करने के लिए अब भी मंगलयान का उपयोग कर रहा है। मंगलयान का विकास करने वाले इसरो उपग्रह केंद्र के निदेशक एम. अन्नादुरई से पत्रिका की विशेष बातचीत के अंश :

मंगलयान के एक हजार दिन पूरे होने पर आपकी प्रतिक्रिया?

निश्चित रूप से यह बहुत ही संतोषप्रद है। मंगलयान से जितनी हमारी उम्मीदें थी उससे बढ़कर साबित हुआ।

मंगलयान के एक हजार दिन पूरे होना क्या मायने रखता है?
मूल रुप से यह मिशन छह महीने के लिए था। लेकिन, मंगलयान में कई नई तकनीकों का इस्तेमाल हमने पहली बार किया था। इसमेंं ऑटोनोमी सिस्टम और लांग रेंज सिस्टम का उल्लेख प्रमुख रूप से करना चाहूंगा। ऑटोनॉमी सिस्टम की बदौलत उपग्रह ने कई बार विपरीत परिस्थितियों में (जैसे ग्रहण अथवा व्हाइट आउट आदि) खुद को संभाला। वहीं लांग रेंज सिस्टम्स का भी हमने पहली बार उपयोग किया। इस सिस्टम के उपयोग का उद्देश्य था उपग्रह को लंबे समय तक सुरक्षित और सक्रिय रखा जा सके। आज हमें बेहद खुशी है जिन तकनीकों को हमने आजमाया या प्रयोग किया, वे पूरी तरह कारगर रही है और उपग्रह ने एक हजार दिन पूरे किए। वाकई यह बेहद संतोषजनक है पल है।

तकनीकी उपलब्धियों के हिसाब से अंतग्र्रहीय मिशन कितने अहम है?

अंतरग्रहीय मिशनों में स्वचालित परिचालन (ऑटोनोमी मोड ऑपरेशन) काफी अहम होता है। उपग्रह को अधिकांश समय हम ऑटोनॉमी मोड में ही परिचालित करते हैं। मंगलयान में यह पूरी तरह सफल रहा है। अब आने वाले मिशनों में इसका काफी  उपयोग होगा। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि आने वाले समय में हम अधिक से अधिक अंतर्ग्रहीय मिशन शुरू कर सकते हैं लेकिन उसके लिए हमें अलग मैन पावर बढ़ाने की जरूरत नहीं होगी क्योंकि हमारे उपग्रह ऑटोनोमी मोड में स्वत: चालित होंगे। इससे उपग्रहों का  आपरेशन थकाऊ नहीं होगा। अधिक श्रम की जरूरत नहीं होगी।

दूसरे ग्रह पर कठिन परिस्थितियों में एक छोटे से यान को हजार दिन तक सुरक्षित रख पाए। यह हमारी तकनीकी क्षमता को प्रदर्शित करता है?

निश्चित रूप से। मंगल ग्रह की परिस्थितियां बेहद चुनौतीपूर्ण और विपरीत हैं। उन कठिन परिस्थितियों में एक हजार दिन तक किसी उपग्रह को सक्रिय रखना बेहद हमारी तकनीकी क्षमता का सबूत है। इसके लिए वहां परिस्थितियों का अनुमान लगाकर उपग्रह तैयार करने की चुनौती होती है। हमें खुशी है कि हमारी तकनीक वहां के वातावरण के साथ सामंजस्य बैठाने में सफल रही। इतना ही नहीं मंगल ग्रह तक पहुंचने के दौरान भी उपग्रह को सौर विकिरण से नुकसान पहुंचने सहित कई खतरों से निपटने की चुनौती थी। यान के इंजन को बंद कर दिया गया था और मंगल ग्रह की कक्षा में प्रवेश के समय उसे लगभग 300 दिन बाद चालू किया गया। उन तमाम बाधाओं को पार कर हम यहां तक पहुंचे हैं तो निश्चित रूप से यह हमारे उपग्रह निर्माण की तकनीकी क्षमता का नमूना है।

आने वाले दिनों में हम मंगलायन से क्या हासिल करने वाले हैं?
शुरू में मंगलयान को छह महीने के मिशन पर भेजा गया था। लेकिन, एक हजार दिन पूरे होने पर लगभग तीन साल के आंकड़े हमें मिले हैं। इससे हम कई तरह की जानकारियां हासिल करेंगे। हम देखेंगे कि तीन साल के दौरान यान की प्रणालियों में किस तरह की गिरावट आई है। खासकर सौर पैनल का प्रदर्शन कैसा रहा और समय के साथ उसमें किस तरह की कमी आई। दूसरा, मंगलयान की कक्षा में किस तरह के परिवर्तन आए। मंगलायन को मंगल की दीर्घवृत्ताकार कक्षा में स्थापित किया गया। लेकिन, विपरीत परिस्थितियो में उतार-चढ़ाव की वजह से कक्षा किस तरह विकसित हुई और उसमें समय के साथ क्या परिवर्तन आए। एक और महत्वपूर्ण चीज हम देखेंगे कि मंगल की धरती पर सर्द ऋतु से ग्रीष्म ऋतु तक मानसून कैसा रहता है। चूंकि, शुरू में हमने  छह महीने के लिए ही यह मिशन भेजा थालेकिन अब यह तीन साल से अधिक तक परिचालित हो चुका है इसलिए हमारे पर इसका विश्लेषण करने के लिए पर्याप्त डाटा उपलब्ध है। इसके लिए जो तकनीक चाहिए (मार्स एक्सल पावर) वह सिर्फ मंगलायन में ही उपलब्ध है।

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