पांच साल बाद बेटी से मिला पिता तो खुशी से भर आईं आंखें

Bareilly, Uttar Pradesh, India
  पांच साल बाद बेटी से मिला पिता तो खुशी से भर आईं आंखें

पांच साल तक पुलिस लाशें दिखाती रही, पिता की आंखें बेटी को तलाशती रही

बरेली। पांच साल बाद जब एक पिता को अपनी बेटी से मिला तो उसकी आंखें खुशी से भर आईं। बेटी की गुमशुदगी के बाद लाचार पिता पांच साल तक दिल्ली पुलिस के चक्कर लगाता रहा लेकिन उसकी एक न सुनी गई। इस बीच सीबीआई लापता बेटी की तलाश में जुटी थी। बेटी का सुराग देने वाले को पांच लाख का इनाम भी देने की घोषणा की थी। दिल्ली से गायब बेटी बरेली के एक ममता आश्रम में मिली। इसकी सूचना जब उसके पिता को मिली तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। सोमवार को वो अपनी बेटी को लेने बरेली पहुंचे।

23 मई 2012 से लापता थी बेटी
मूल रूप से उत्तर प्रदेश के जिला प्रतापगढ़ के रहने वाले रामप्रसाद नार्दन रेलवे दिल्ली के तुगलकाबाद में टेक्नीशियन वन के पद पर कार्यरत हैं। उसका परिवार तुगलकाबाद रेलवे कॉलोनी के 86 ए 2 क्वार्टर में रहता है। 23 मई 2012 की दोपहर उनकी जवान बेटी किरन कुमारी घर से 100 मीटर दूरी पर सिलाई-कढ़ाई सीखने को निकली थी। घर में रामप्रसाद की पत्नी फूलकली और मानसिक रूप से बीमार छोटा बेटा राजकुमार था, जबकि रामप्रसाद ड्यूटी पर थे। शाम तक किरन घर नहीं लौटी, तो उसके परिवार वालों को चिंता हुई। उन्होंने उसकी काफी तलाश की, लेकिन कोई पता नहीं लगा। रामप्रसाद सिलाई-कढ़ाई केंद्र पर गए तो बंद मिला। अगले दिन फिर वहां पहुंचे तो सिलाई-कढ़ाई केंद्र चलाने वाली सुधा ने बताया कि किरन हंगामा कर रही थी तो उसने 100 नंबर पर फोन कर पुलिस को बुलाया था। पुलिस उसे थाने ले गई थी। रामप्रसाद ने अगले दिन यह बात थाने जाकर कही तो उसे पुलिस कर्मियों ने हड़काकर भगा दिया।

पुलिस कस्टडी से गायब हुई
पुलिस अभिरक्षा से रहस्मय ढंग से गायब हुई किरन को खोजने के लिए रामप्रसाद ने दिल्ली पुलिस के तमाम चक्कर काटे लेकिन उनकी एक न सुनी। इतना ही नहीं रामप्रसाद को दिल्ली पुलिस ने कई लाशें दिखाई, कई बार तो उनपर जबरन दबाव डाला की कह दो यही तुम्हारी बेटी है लेकिन वो नहीं माने। जब भी कोई लावारिस लाश मिलती तो दिल्ली पुलिस रामप्रसाद को शिनाख्त करवाने के लिए अपने साथ ले जाती थी। इसके बाद हाईकोर्ट के आदेश पर यह मामला 2014 में सीबीआई को ट्रांसफर हो गया। सीबीआई के एसपी एसएस ग्रुम की अगुवाई में किरन को तलाशने पर काम चल रहा था।

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तीन साल पहले आई थी किरन
ममता आश्रम की अधीक्षिका दुर्गेश जौहरी का कहना है कि तीन साल पहले किरण उनके पास आई थी। मेरठ के नारी निकेतन से उसे यहां भेजा गया था। जिस वक्त किरण यहां आई थी तो वो अपना नाम तक नहीं बता पाती थी लेकिन आश्रम में उसका इलाज किया गया और अब वो अपना नाम, पता सब कुछ बताती है। जब पांच साल बाद उसके पिता आए तो उन्हें भी पहचान लिया। तीन दिन पहले समाजसेवी शैलेश कुमार शर्मा ने ममता आश्रम में किरन को ढूंढा और काउंसलिंग कर पता जानने के बाद संबंधित थाने को फोन किया। जिसके बाद किरन के परिजनों का पता चला। हालांकि ये नहीं पता चल पाया कि किरन दिल्ली से मेरठ कैसे पहुंची।

बेटी ने पिता को पहचाना
जैसे ही रामप्रसाद को दिल्ली में फोन पर खबर लगी कि उसकी बेटी जिंदा है और सही सलामत है वो फौरन बरेली के लिए रवाना हो गए। यहां बेटी को पाते ही उसे गले लगा लिया और बेटी ने भी उन्हें पहचान लिया। ये पांच साल रामप्रसाद के लिए किसी सज़ा से काम नहीं गुजरे। जवान बेटी के गायब होने के बाद वो एक दिन भी चैन की नींद नहीं सोये। सबसे बड़ी  कमी उसे ये खली कि दिल्ली पुलिस ने उसकी कोई भी मदद नहीं की।

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