इस गुफा में छुप गए थे शिवजी, दुनिया में इकलौता है यह अनोखा शिवलिंग

Itarsi, Madhya Pradesh, India
इस गुफा में छुप गए थे शिवजी, दुनिया में इकलौता है यह अनोखा शिवलिंग

होशंगाबाद जिले के इटारसी से 18 किमी दूर है यह स्थान। जिसे लोग तिलक सिंदूर के नाम से जानते हैं। यहां शिवजी का प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर दुनिया में अपना अलग स्थान लगता है।


भोपाल। होशंगाबाद जिले के इटारसी से 18 किमी दूर है यह स्थान। जिसे लोग तिलक सिंदूर के नाम से जानते हैं। यहां शिवजी का प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर दुनिया में अपना अलग स्थान लगता है। यहां शिवलिंग पर जल, दूध आदि तो चढ़ता ही है, इसके साथ ही सिंदूर चढ़ाने की परंपरा है। शिवलिंग को सिंदूर का तिलक लगाने से इस का नाम तिलक सिंदूर पड़ गया।

महाशिवरात्रि पर लगता है मेला
हर वर्ष महाशिवरात्रि पर प्रदेश भर से हजारों श्रद्धालु भगवान भोलेनाथ के दर्शन के लिए यहां आते हैं। कहा जाता है कि यह एकमात्र ऐसा स्थान है जहां भगवान शंकर को सिंदूर चढ़ाया जाता है। इस स्थान का अस्तित्व राजा महाराजाओं के समय से हैं। प्राचीन समय में आदिवासी राजा द्वारा यहां पर पूजन का कार्य कराया जाता था।


भस्मासुर से बचने के लिए यहीं छुप गए थे शिवजी
माना जाता है कि भस्मासुर से पीछा छुड़ाने के लिए शिवजी यहीं क पहाड़ों और गुफाओं में छुपे थे। इसी स्थान से पचमढ़ी जाने के लिए भी सुरंग तैयार की थी। माना जाता है कि यह सुरंग आज भी मौजूद है, जो पचमढ़ी में खुलती है। शिवजी इसी रास्ते से पचमढ़ी गए थे। जहां वे जटाशंकर में छुपकर रहे थे।



यह है पौराणिक महत्व
सतपुड़ा पर्वत श्रंखला में मौजूद इस स्थान का पौराणिक महत्व है। इसके पुख्ता प्रणाण तो नहीं मिलते हैं, लेकिन तपस्वी ब्रह्मलीन कलिकानंद के मुताबिक यह ओंकारेश्वर स्थित महादेव मंदिर के समकालीन शिवलिंग है। यहां शिवलिंग पर स्थित जलहरी का आकार चतुष्कोणीय है, जबकि सामान्य तौर पर जलहरी त्रिकोणात्मक होती है। ओंकारेश्वर के महादेव के समान ही यहां का जल पश्चिम दिशा की ओर जाता है, जबकि अन्य सभी शिवालयों में जल उत्तर की ओर प्रवाहित होता है। ग्रंथों में भी भारतीय उपमहाद्वीप में इस स्थान अनूठा माना गया है।

खटामा के मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। तिलक सिंदूर ग्राम जमानी में है जो इटारसी से किलोमीटर दूर है। यह मंदिर ढाई सौ मीटर ऊंची पहाड़ी पर मौजूद है। उत्तरमुखी शिवालय सतपुड़ा के पहाड़ों में है। इस क्षेत्र में सागौन, साल, महुआ, खैर आदि के पेड़ अधिक हैं। यहां छोटी धार वाली नदीं हंसगंगा नदी बहती है।

शिवरात्रि पर लगता है मेला
यहां बरसों से महाशिवरात्रि पर मेला लगता है। यहां आदिवासी अंचल और दूरदराज से लोग मंदिर में दर्शन करने आते हैं। मेले के दौरान यहां लाखों लोग शामिल होते हैं।



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