एक किस्साः काटजू की इतनी बड़ी शर्त नहीं टाल पाया था बिड़ला घराना, जाने क्यों

Bhopal, Madhya Pradesh, India
एक किस्साः काटजू की इतनी बड़ी शर्त नहीं टाल पाया था बिड़ला घराना, जाने क्यों

MP के पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश नाथ काटजू की 17 फरवरी को पुण्य तिथि है। उनकी पुण्यतिथि पर mp.patrika.com बता रहा है उनसे जुड़े रोचक किस्से....।


भोपाल। जब बिड़ला घराने ने मध्यप्रदेश में निवेश की इच्छा जताई तो तत्कालीन मुख्यमंत्री कैलाश नाथ काटजू की शर्त ने सभी को हैरान कर दिया था। वह शर्त थी भोपाल में मंदिर बनवाने की। इस शर्त को बिड़ला परिवार नहीं ठुकरा पाया और उसने सहर्ष इस शर्त को स्वीकार किया और पूरा भी किया।

काटजू चाहते थे कि इस दुर्गम पहाड़ी पर मंदिर होगा और यहां का सौंदर्यीकरण बढ़ेगा। सरकार ने मंदिर के लिए जमीन अलॉट की और ट्रस्ट बनवा दिया। वह शर्त बिड़ला मंदिर के रूप में आज सबके सामने है और MP विधानसभा के बगल में मौजूद है। अब यह मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। यहां के सौंदर्य और पहाड़ी से नए-पुराने भोपाल का एक अलग ही दृश्य लोगं को आकर्षित करता है। बाहर से आने वाले पर्यटक यहां जरूर आते हैं।

(पं. जवाहरलाल नेहरू के साथ कैलाशनाथ काटजूष दूसरे चित्र में वो डाक टिकट जो काटजू पर हुआ था जारी।)

पांच साल रहे प्रदेश के मुख्यमंत्री
काटजू MP के 31 जनवरी 1957 से 14 अप्रैल 1957 तक फिर 15 अप्रैल 1957 से 11 मार्च 1962 तक मुख्यमंत्री रहे। भोपाल के बिड़ला मंदिर की आधारशिला 1960 में रखने वाले काटजू ही थे। इसके बाद 1964 में मंदिर बनने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री द्वारिका प्रसाद मिश्र की मौजूदगी में मंदिर का उद्घाटन हुआ था।

(यह थी काटजू की शर्त, जो लोगों की आस्था और पर्यटन का केंद्र बन गया है।)

दो बार राज्यपाल, केंद्रीय मंत्री भी बने
वर्ष 1946 में UP विधानसभा के गठन में काटजू मंत्री बनाए गए। 1947 से जून 1948 तक उड़ीसा और 1948 से 1951 तक पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहे। इसके अलावा वे कई बड़े पदों पर भी रहे।

मंदसौर से लड़ा था चुनाव
काटजू का चुनाव क्षेत्र मंदसौर था। यहां से जीतकर वे 31 जनवरी 1957 से मार्च 1962 तक MP के चीफ मिनिस्टर रहे। काटजू पहली लोकसभा के भी सदस्य चुने गए थे। इनके अलावा मालवा क्षेत्र ने मध्यप्रदेश को तीन मुख्यमंत्री दिए हैं। इनमें वीरेंद्रकुमार सखलेचा, सुंदरलाल पटवा और कैलाशनाथ काटजू शामिल हैं।

कश्मीरी ब्राह्मण थे काटजू
17 जून 1887 को मालवा की छोटी सी रियासत जावरा में जन्मे काटजू स्वतंत्रता सेनानी थे और कश्मीरी ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। वे कांग्रेस के कई बड़े पदों पर रहे। यह पं. त्रिभुवननाथ काटजू के पुत्र थे। उनके जन्म दिवस 17 जून 1987 को ही भारत सरकार ने उन पर डाक टिकट भी जारी किया था।

लाहौर में था ननिहाल
काटजू का ननिहाल लाहौर में था। उन्होंने वहीं से बीए की परीक्षा पास की थी। उसके बाद वे अपने पिता की तरह ही कानूनविद हो गए। इसके लिए उन्होंने इलाहाबाद में पढ़ाई की। कुछ समय कानपुर के कोर्ट में प्रेक्टिस भी की। वे हाईकोर्ट बार के सदस्य भी बने और इलाहाबाद म्युनिसिपल कौंसिल के चेयरमैन भी बने।


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(ये हैं मार्कंडेय काटजू)
पूर्व CM के पोते हैं मार्कंडेय काटजू
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्केंडेय काटजू कैलाशनाथ काटजू के ही पोते हैं। वे अपने बेबाक बयानों से अक्सर सुर्खियों में बने रहते हैं। उन्होंनेजज रहते हुए कई ऐसे फैसले लिए जिसे आम लोग उनकी सराहना करते हैं। बताया जाता है कि वे किसी आम आदमी के साथ फुटपाथ पर भी बैठकर बतिया लेते थे, लेकिन कोई समझ नहीं पाता था कि चीफ जस्टिस जैसे बड़े ओहदे वाला यह शख्स उनके साथ बैठकर उनके हाल जान रहा है। वे इतने सहज माने जाते हैं।


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