नर्क से मुक्ति पाने करती हैं ऐसा DANCE, विवादों में रहती है इनकी LIFE

Bhopal, Madhya Pradesh, India
  नर्क से मुक्ति पाने करती हैं ऐसा DANCE, विवादों में रहती है इनकी LIFE

राई डांस का इतिहास और इससे जुड़े तथ्य-मिथ्य काफी विवादास्पद हैं। यह नृत्य एक समय में बधाई प्रेषित करने का जरिया हुआ करता था।


भोपाल। बेटे की शादी हो या घर में नए मेहमान का आगमन, व्यापार में लाभ हो या किसी बरसों पुरानी मन्नत का पूरा होना, इन सबकी खुशियां बेड़नियों और उनके राई नृत्य के बिना संभव नहीं रही। मप्र के बुंदेलखण्ड के इतिहास में बेड़नियों से जुड़े कई किस्से-कहानियां हैं। राजाओं के साथ इनके प्रेम संबंध और बाजारों में उनकी स्थितियों पर कई किताबें अब तक लिखी जा चुकी हैं। लेकिन बेड़नियों के राई नृत्य का इतिहास काफी विवादस्प रहा है। फिर भी कई रोचक तथ्य हैं जो इस नृत्य विधा को जानने में आपकी मदद कर सकते हैं।


क्यों कहते हैं राई नृत्य 
राई नृत्य का इतिहास बुंदेखण्ड के राजाओं के इतिहास से जुड़ा है। बधाई बांटने और मनोरंजन के लिए बेडिय़ा-बाछड़ा समाज की युवतियों को डांस के लिए बुलाया जाता है। वे चेहरे पर लंबा घूंघट डालकर  मोरनी की तरह नाचतीं हैं। नृतकी का चेहरा घूंघट में होता है लेकिन उसके हाव-भाव देखने के लिए एक पुरूष नृतक मशाल लेकर साथ-साथ नाचता है। इस मशाल में बीच-बीच में राई डाली जाती है ताकि यह बुझे नहीं। यही कारण है किस नृत्य की इस विधा का नाम राई नृत्य पड़ा।


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नृत्य के जरिए नर्क से मुक्ति
बेडिय़ा-बाछड़ा समाज में सालों से वेश्यावृत्ति होती आ रही है। यहां के परिवारों के लिए यह आम चलन है। बेटियां होने पर खुशियां और बधाईंयां बांटने वाला यह समाज राई नृत्य का प्रवृतक रहा है। इन्हीं समाजों में जब लड़कियां वेश्यावृत्ति से छुटकारा पाना चाहतीं हैं तो विवाह के लिए वर की तलाश करती हैं। यह बात कितनी सत्य है इसके बारे में कोई नहीं जानता लेकिन कहा जाता है कि बेड़नियां राई नृत्य के जरिए अपना दूल्हा तलाशतीं हैं जो उन्हें वेश्यावृत्ति के नर्क से निकालकर ले जाए। शादी के बाद समाज की लड़कियां वेश्यावृत्ति नहीं करतीं।

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पहले ऐसे नहीं थे हालात
पुरातत्व की जानकारी रखने वाले और इतिहासकार बताते हैं कि पहले बेड़नियां राई नृत्य के जरिए केवल राजाओं के सभा में मनोरंजन करतीं थीं। उन्हें अच्छा शगुन माना जाता था। बेटे की शादी, जन्मोत्सव आदि पर बेड़नियों के डांस को प्रोत्साहित किया गया। उन्हें समाज में बुरी नजर से नहीं देखा जाता था। लेकिन समय के साथ-साथ जब नृत्य की इस कला में वेश्यावृत्ति शामिल हुई तब से स्थितियां बदल गईं। अब नतृकियों को वेश्या के तौर पर देखा जाने लगा। यह सोच आज भी नहीं बदली है। भले ही राई नतृकियां मंदिरों में नाचें लेकिन देखने वाले पुरूषों के मन में आज भी उनकी वही छवि बनी हुई है।

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सरकार के प्रयास नाकाफी
जानकारी के अनुसार बुंदेलखण्ड समेत प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में अब भी करीब 30 हजार राई नतृकियां हैं। बेडिय़ा-बाछड़ा समाज में अब भी खुलेआम वेश्यावृत्ति होती है। सरकार इन परिवारों के उत्थान और बेटियों की शिक्षा पर काम कर रही है लेकिन ये प्रयास नाकाफी हैं। मप्र में समाज का एक बड़ा हिस्सा अब भी वेश्यावृत्ति की दलदल में फंसा है।


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