मध्यप्रदेश के भोजपुर में मिली सदियों पुरानी ॐ वैली, दुनिया भर से जुटे वैज्ञानिक

Bhopal, Madhya Pradesh, India
मध्यप्रदेश के भोजपुर में मिली सदियों पुरानी ॐ वैली, दुनिया भर से जुटे वैज्ञानिक

भोजपुर और मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के छिपे हुए प्राचीन रहस्य अब सामने आ रहे हैं। वैज्ञानिकों की मानें तो यहां हजारों साल पुरानी एक ओमवैली है।

भोपाल। मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक भोजपुर मंदिर के बारे में तो आपने सुना ही होगा, लेकिन अब ये मंदिर वैज्ञानिक महत्व के लिए भी जाना जाएगा। जी हां, भोजपुर और मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के छिपे हुए प्राचीन रहस्य अब सामने आ रहे हैं। वैज्ञानिकों की मानें तो यहां हजारों साल पुरानी एक ओमवैली है। मॉनसून के समय ये ओमवैली पूरी तरह से सामने आ जाती है। मौसम विभाग के अनुसार एक या दो दिनों मॉनसून राजधानी भोपाल को तरबतर कर देगा। मॉनसून के पहुंचते ही इस ओम वैली का आकार पूरी तरह से निकल कर सामने आ जाता है। यहां पर मौजूद हरियाली के बढ़ने और जलाशय भरने के बाद ओमवैली की तस्वीरें पूरी तरह से साफ नजर आती हैं। 


सैटेलाइट तस्वीरों में इस बात की पुष्टि भी होती है। इस ओम के मध्य में स्थित है प्राचीन भोजपुर मंदिर, और इसके सिरे पर बसा है भोपाल शहर। आपको ये भी बता दें कि भूगोल विज्ञानियों का ये मानना है कि भोपाल शहर स्वास्तिक के आकार में बसाया था। 


मप्र विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के वैज्ञानिक ठीक उसी वक्त ओम वैली का ग्राउंड डाटा लेते हैं, जिस वक्त सैटेलाइट रिसोर्स सेट - 2 भोपाल शहर के ऊपर से गुजरता है। इस दौरान भोपाल, भोजपुर और ओमवैली की संरचना से जुड़ा हुआ डाटा लिया जाता है। परिषद के मुताबिक हर 24 दिनों के अंतराल पर ये सेटेलाइट भोपाल शहर के ऊपर से गुजरता है। इस सैटेलाइट के जरिए गेहूं की खेती वाली जमीन की तस्वीरें ली जाती हैं। 




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सैटेलाइट तस्वीरों में दिखाई दे रहा ये बड़ा सा ओम दरअसल सदियों पुरानी ओम वैली है। आसमान से दिखाई देने वाली ॐ वैली के ठीक मध्य में 1000 वर्ष प्राचीन भोजपुर का शिवमंदिर स्थापित है। मध्यप्रदेश में ओमकारेश्वर ज्योर्तिलिंग के पास भी ऐसी ही प्राकृतिक ओमवैली दूर आसमान से दिखाई देती है। वैज्ञानिकों की नजर में यह ओम वैली है। इसके सैटेलाइट डाटा केलिबरेशन और वैलिडेशन का काम मप्र विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद को मिला है।



परिषद के वैज्ञानिक डॉ. जीडी बैरागी ने बताया, डाटा केलिबरेशन और वैलिडेशन के लिए हमें ठीक उस वक्त ओम वैली का ग्राउंड डाटा लेना होता है, जिस समय सैटेलाइट (रिसोर्स सेट-2) शहर के ऊपर से गुजरे। यह सैटेलाइट 24 दिनों के अंतराल पर भोपाल के ऊपर से गुजरता है। इससे गेहूं की खेती वाली जमीन की तस्वीरें ली जाती हैं।




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परिषद की ताजा सैटेलाइट इमेज से ‘ॐ’ वैली के आसपास पुराने भोपाल की बसाहट और एकदम केंद्र में भोजपुर के मंदिर की स्थिति स्पष्ट हुई है। पुरातत्वविदों के पास राजा भोज की विद्वता के तर्क हैं। उनके मुताबिक लगभग 1000 साल पहले ही भोपाल को एक स्मार्ट सिटी बनाने के लिए इसे ज्यामितीय तरीके से बसाया गया था, इसे बसाने में राजा भोज की विद्वता से ही सारी चीजें संभव हो पाईं थीं।



स्वास्तिक के आकार में बसा है भोपाल
इतिहासकारों का मानना है कि भोज एक राजा ही नहीं कई विषयों के विद्वान थे। भाषा, नाटक, वास्तु, व्याकरण समेत अनेक विषयों पर 60 से अधिक किताबें लिखी। वास्तु पर लिखी समरांगण सूत्रधार के आधार पर ही भोपाल शहर बसाया गया था। गूगल मैप से वह डिजाइन आज भी वैसा ही देखा जा सकता है।



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भोज के समय ग्राउंड मैपिंग कैसे हुई यह रिसर्च का विषय
आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के आर्कियोलॉजिस्ट्स का मानना है कि ओम की संरचना और शिव मंदिर का रिश्ता पुराना है। देश में जहां कहीं भी शिव मंदिर बने हैं, उनके आसपास के ओम की संरचना जरूरी होती है। इसका सबसे नजदीकी उदाहरण है ओंकारेश्वर का शिव मंदिर।


परमार राजा भोज के समय में ग्राउंड मैपिंग किस तरह से होती थी इसके अभी तक कोई लिखित साक्ष्य तो नहीं है, लेकिन यह रिसर्च का रोचक विषय जरूर है। सैटेलाइट इमेज से यह बहुत स्पष्ट है कि भोज ने जो शिव मंदिर बनवाया, वह इस ओम की आकृति के बीचोबीच स्थापित है।

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