रानी पर कोई हाथ न डाल सके इसलिए इस बाहुबली ने काट दिया था उसका गला, पढें रियल लाइफ स्टोरी

Bhopal, Madhya Pradesh, India
रानी पर कोई हाथ न डाल सके इसलिए इस बाहुबली ने काट दिया था उसका गला, पढें रियल लाइफ स्टोरी

15वीं सदी में शेरशाह सूरी ने सिक्कों को गलवा कर बनवाई तोपों से जीता था यह किला। जीतने के लिए शेरशाह ने लिया था धोखे का सहारा। 

भोपाल। मध्यप्रदेश में एक किला ऐसा भी है जहां एक राजा ने अपनी प्राणों से प्यारी रानी का गला अपनी ही तलवार से काट दिया था, ऐसा करने के पीछे उसका उद्देश्य रानी से किसी प्रकार का बदला लेना नहीं बल्कि उसकी सुरक्षा करना था। 

जी हां यह वहीं किला है जिसे जीतने के लिए 15वीं सदी में शेरशाह सूरी ने सिक्कों को गलवा कर तोपें बनवाई थी। इतना ही नहीं मालवा की पूर्वी सीमा पर स्थित इस किले को जीतने के लिए शेरशाह को तक धोखे का सहारा लेना पडा था। जिसके बाद ही वह इस किले पर अपना झंडा लहरा सका, ऐसी स्थिति को देखते हुए ही यहां के तातकालीन राजा पूरनमल ने अपनी पत्नी का स्वयं सिर काटा था।  


raisen kila
 
शानदार इतिहास है किले का...
भोपाल जिले की सीमा से लगे रायसेन में स्थित यह किला रायसेन किले के नाम से जाना जाता है। यह एक ऐसा किला है जिसका न केवल शानदार इतिहास है बल्कि यह बहुत खूबसूरत भी है।
इसके अलावा किले की दीवारों में शिलालेख भी विद्यमान है। यह किला रायसेन जाते समय सड़क के बाईं ओर दिखाई देता है। रास्ते सेे गुजरते समय हमें इसके महत्व का अहसास नहीं होता, लेकिन करीब जाने पर यह पर्यटकों को लुभाने लगता है।  


किले पर हमलों का इतिहास
1223 ई. में अल्तमश, 1250 ई. में सुल्तान बलवन, 1283 ई. में जलाल उद्दीन खिलजी, 1305 ई. में अलाउद्दीन खिलजी, 1315 ई. में मलिक काफूर, 1322 ई. में सुल्तान मोहम्मद शाह तुगलक, 1511 ई. में साहिब खान, 1532 ई. में हुमायू बादशाह, 1543 ई. में शेरशाह सूरी, 1554 ई. में सुल्तान बाजबहादुर, 1561 ई. में मुगल सम्राट अकबर, 1682 ई. में औरंगजेब, 1754 ई. में फैज मोहम्मद ने हमला किया था। 

किला से जुड़ी महत्वपूर्ण घटनाएं
17 जनवरी 1532 ई. में बहादुर शाह ने रायसेन दुर्ग का घेराव किया।
06 मई 1532 ई. को रायसेन की रानी दुर्गावति ने 700 राजपूतानियों के साथ दुर्ग पर ही जौहर किया।
10 मई 1532 ई. को महाराज सिलहादी, लक्ष्मणसेन सहित राजपूत सेना का बलिदान।
जून 1543 ई. में रानी रत्नावली सहित कई राजपूत महिलाओं एवं बच्चों का बलिदान।
जून 1543 ई. में शेरशाह सूरी द्वारा किए गए विश्वासघाती हमले में राजा पूरनमल और सैनिकों का बलिदान।


दीवारों के नौ द्वार व तेरह बुर्ज
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित इस किले की इमारतों तक जाने के लिए पैदल ही चलना होता है। किला बलुआ पत्थर की चट्टान पर ऊंचाई पर खड़ा है।यहां ऊंची दीवार और  बुर्ज किले को और दिलचस्प बनाते हैं। किले के चारों ओर बड़ी-बड़ी चट्टानों की दीवारें हैं। इन दीवारों के नौ द्वार व तेरह बुर्ज हैं। 


gate of raisen fold
 
काट दिया था सिर
तारीखे शेरशाही में उल्लेख है कि दिल्ली का शासक शेरशाह सूरी 4 माह की घेराबंदी के बाद भी किले को नहीं जीत पाया था। तब उसने तांबे के सिक्कों को गलवा कर यहीं तोपों का निर्माण किया। इसके बाद ही शेरशाह को जीत नसीब हो सकी। जब शेरशाह ने इस किले को घेरा तब 1543 ईसवी में यहां राजा पूरनमल का शासन था। वह शेरशाह के धोखे का शिकार हुआ था। जब उसे मालूम पड़ा कि ऐसा हो गया है तो उसने अपनी पत्नी रत्नावली का स्वयं सिर काट दिया था, जिससे वह शत्रुओं के हाथ न लगे।



यह हैं किले की कुछ खास बातें :
रायसेन का किला इतिहास की अनूठी दास्तान है। 11 वीं शताब्दी के आस-पास बने इस किले पर कुल 14 बार विभिन्न राजाओं, शासकों ने हमले किए। तोपों और गोलों की मार झेलने के बाद आज भी यह किला सीना तानकर खड़ा है। भोपाल से 45 किमी दूर जिला मुख्यालय रायसेन में स्थित किला 1500 से अधिक ऊंची पहाड़ी पर लगभग दस वर्ग किमी में फैला है। इतिहासकारों के अनुसार रायसेन किला का निर्माण एक हजार ईपु का माना गया है।

रायसेन के किला की चाहर दीवारी में वो हर साधन और भवन हैं, जो अमूमन भारत के अन्य किलों में भी हैं। लेकिन यहां कुछ खास भी है, जो अन्य किलों पर नजर नहीं आता। किला पहाड़ी पर तत्कालीन समय का वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम और इत्र दान महल का ईको साउंड सिस्टम इसे अन्य किलों से तकनीकी मामलों में अलग करता है।


fort of raisen

एक जगह जमा होता है पानी
लगभग दस वर्ग किमी में फैले किला पहाड़ी पर गिरने वाला बारिश का पानी भूमिगत नालियों के जरिए किला परिसर में बने एक कुंड में एकत्र होता है। नालियां कहां से बनी हैं, उनमें पानी कहां से समा रहा है, कितनी नालियां हैं। ये सब आज तक कोई नहीं जान पाया। सदियों पुराने इस वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम से तत्कालीन शासकों की दूर दृष्टि और ज्ञान का अंदाजा लगाया जा सकता है।

मिसाल है ईको साउंड सिस्टम
इत्रदान महल के भीतर दीवारों पर बने आले ईको साउंड सिस्टम की मिसाल हैं। एक दीवार के आले में मुंह डालकर फुसफुसाने से विपरीत दिशा की दीवार के आले में साफ आवाज सुनाई देती है। दोनो दीवारों के बीच लगभग बीस फीट की दूरी है। यह सिस्टम आज भी समझ से परे है।
किला परिसर में बने सोमेश्वर महादेव मंदिर के अलावा हवा महल, रानी महल, झांझिरी महल, वारादरी, शीलादित्य की समाधी, धोबी महल, कचहरी, चमार महल, बाला किला, हम्माम, मदागन तालाब है।


साल में एक बार खुलता है मंदिर
दुर्ग पर स्थित सोमेश्वर महादेव का मंदिर साल में एक बार ही महाशिवरात्रि पर खुलता है। पुरातत्व विभाग के अधीन आने पर विभाग ने मंदिर को बंद कर दिया था। 1974 में नगर के लोगों ने एकजुट होकर मंदिर खोलने और यहां स्थित शिवलिंग की प्राणप्रतिष्ठा के लिए आंदोलन किया। तब तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाशचंद्र सेठी ने महाशिवरात्रि पर खुद आकर शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा कराई। तब से हर महाशिवरात्रि पर मंदिर के ताले श्रद्धालुओं के लिए खोले जाते हैं और यहां विशाल मेला लगता है।

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