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आम से खास हो गए एन. रंगा राव

मैसूर स्थित भारतीय कोरपोरेट समूह है, जो अगरबत्ती, फै्रग्रेंस, इलेक्ट्रॉनिक और एसेंशियल ऑयल के क्षेत्र में अपना व्यवसाय करता है।

Published: December 24, 2015 01:43:29 pm

मैसूर स्थित भारतीय कोरपोरेट समूह है, जो अगरबत्ती, फै्रग्रेंस, इलेक्ट्रॉनिक और एसेंशियल ऑयल के क्षेत्र में अपना व्यवसाय करता है।

इसकी स्थापना 1948 में एन. रंगा राव ने की थी। इन्होंने बहुत छोटे स्तर पर अगरबत्ती बनाकर इस समूह की नींव रखी थी। आज यह भारत में सर्वाधिक अगरबत्ती बेचने वाला समूह है। यह समूह प्रतिवर्ष 500 करोड़ रुपए से अधिक की अगरबत्ती बेचता है। वर्तमान में संस्थापक की तीसरी पीढ़ी इस समूह को संभाल रही है।

संस्थापक के संघर्ष की कहानी


संस्थापक एन. रंगा राव कर्नाटक राज्य से संबंध रखते थे। जब वे 11 वर्ष के थे, तब पिताजी का साया उनके ऊपर से उठ गया था। अपने सम्पूर्ण परिवार के भरण-पोषण का जिम्मा उन्हीं के नन्हें कंधों पर आ गया था।
उन्होंने तुरन्त अनेकों तरह के छोटे-मोटे कामों पर अपने हाथ आजमा लिए,ताकि कुछ पैसे घर के लिए कमा सकें।

उन्होंने सर्वप्रथम स्कूल में बच्चों की ट्यूशन लेनी प्रारम्भ कर दी। कुछ समय के पश्चात उन्होंने बिस्किट बेचना प्रारम्भ कर दिया। इससे पार नहीं पड़ी, तो उन्होंने कुर्ग आदि क्षेत्र में फैले हुए कॉफी बागानों में दिन-रात मजदूरी करनी प्रारम्भ कर दी।

इन सब कार्यों के बीच इनको गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का भी सामना करना पड़ा, परन्तु उन्होंने इसकी परवाह नहीं की। और अपना श्रम जारी रखा।

सन् 1948 तक उन्होंने अपने पास लगभग 500 रुपए की बचत कर रखी थी। तब उन्होंने कर्नाटक के मैसूर शहर में स्थानान्तरित होने का निर्णय लिया। यहां पर उन्होंने अपनी एक संस्था स्थापित की, जिसका नाम उन्होंने 'मैसूर प्रॉडक्ट्स व जनरल ट्रेडिंगÓ कंपनी रखा।

इस संस्था में उन्होंने सोपनट पाउडर, हल्दी पाउडर और अगरबत्ती का छोटा-सा व्यवसाय प्रारम्भ किया। धीरे-धीरे उनको लगने लगा कि उनके अपने कुटीर उद्योग में अगरबत्ती के क्षेत्र में विस्तार की अपार संभावनाएं हैं। अत: उन्होंने अपना ध्यान सिर्फ अगरबत्तियों पर लगाया। उन्होंने बहुत ही सरल व सुंदर अगरबत्तियों का निर्माण किया और धीरे-धीरे मैसूर व कर्नाटक के लोग उनकी बनाई अगरबत्तियों के दीवाने हो गए।

उन्होंने भी अपनी अगरबत्तियों को अधिक गुणवत्ता वाली बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अपनी अगरबत्तियों में आद्वितीय व मनमोहक सुगंधों के विकास के लिए उन्होंने एक समर्पित प्रयोगशाला की स्थापना की। वहां अपने परिवार के सदस्यों की सहायता से गुप्त तरीके से 200 से भी अधिक सुगंधों का विकास कर डाला।

उनको अपना प्रथम निर्यात का ऑर्डर सन् 1954 में श्रीलंका से मिला। उसके बाद अमरीका, यूरोप, चिली, जापान आदि से निर्यात के विशाल ऑर्र्डर मिलने लगे। वर्तमान में इनके कुटीर उद्योग से प्रारम्भ की गई अगरबत्तियां विश्व की सबसे अधिक बिकने वाली अगरबत्ती हैं और 60 से भी अधिक देशों में निर्यात की जा रही है।

संस्थापक के सफलता के मंत्र
उनकी जिन्दगी से हम ये सीख सकते हैं कि हमें कठिनाइयों से बिलकुल घबराना नहीं चाहिए। उनका पूरे साहस के साथ सामना करना चाहिए। हमें याद रखना चाहिए कि 'शुद्धतम स्वर्ण अयस्क सबसे गर्म भट्टी से ही निर्मित किया जा सकता है।

उसी तरह से हमारी प्रतिभा का तेज भी कठिन समय में निखर कर सामने आता है।Ó संस्थापक के व्यक्तित्व में साहस, स्पष्टता, अनुशासन और स्वतंत्र दृष्टिकोण कूट-कूट कर भरा हुआ था, जिसके कारण से उनके जीवन की अपार बाधाएं भी उन्हें अपने लक्ष्य प्राप्ति से रोक नहीं पाई।

उन्होंने अपनी अगरबत्तियों को 'साइकलÓ ब्राण्ड नाम के साथ बाजार में उतारा था। इसके पीछे उनकी गहरी सोच थी। वे अपनी सरल व सुन्दर अगरबत्तियों के लिए एक ऐसा सार्वभौमिक नाम व प्रतीक चाहते थे, जिसके भारत व विश्व के विभिन्न देशों के लोग आसानी से पहचान सकें। साइकल नाम विभिन्न संस्कृतियों की विभिन्न भाषाओं में साइकल केे नाम से ही पहचाना जाता है।
n. ranga rao
संस्थापक ने अपनी संस्था में 20 से भी अधिक डिजानयर्स का अलग विभाग खड़ा किया है जो दिन-रात उनकी अगरबत्तियों की नायाब पैकेजिंग के ऊपर कार्य करता है। शायद उनको मालूम था कि 'किसी प्रोडक्ट को बेचने के लिए उसकी प्रस्तुुति और पैकेजिंग का महत्वपूर्ण योगदान होता है। एक अच्छे डिजायन दुकान में आपके प्रोडक्ट के लिए मूक विक्रेता के रूप में अति सराहनीय कार्य कर सकता है। सुन्दर पैकेजिंग एक थिएटर की तरह कार्य करती है, ये कई सुन्दर कहानियां चुपचाप आपके ग्राहकों को सुना देती है।Ó

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