ISI केस: एक छोटी सी भूल, शातिर पाकिस्तान और टारगेट सिर्फ MP

Bhopal, Madhya Pradesh, India
   ISI केस: एक छोटी सी भूल, शातिर पाकिस्तान और टारगेट सिर्फ MP

एमपी एटीएस को यदि जम्मू-कश्मीर में गिरफ्तार आतंकियों से इनपुट नहीं मिलते तो शायद एमपी में चल रही साजिश का फंडाफोड़ नहीं हो पाता।

भोपाल। मध्यप्रदेश में तमाम खुफिया एजेंसियों की आंखों में धूल झोंककर पाकिस्तान ने धीरे-धीरे अपना नेटवर्क फैला लिया। उसके 19 जासूसों (जो अभी तक पकड़ में आए हैं) ने पैसे के लिए पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई को इंडियन आर्मी और देश की वो तमाम जानकारियां दीं, जो अब तक खुफिया रहती थीं। पूरे प्रदेश में पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश से लाइन कनेक्ट कर सूचनाएं साझा की जा रहीं थीं। आईएसआई के इन 19 जासूसों ने गिरफ्तारी के बाद इतने बड़े-बड़े खुलासे किए, जिन्हें सुनकर सुरक्षा एजेंसियां भी सकते में हैं। इस पूरे मामले में कई सवाल खड़े हुए। आखिर कैसे आईएसआई ने अपना नेटवर्क फैलाया? कैसे जासूसों को काम दिया गया? कई सवाल हैं। आइए हम देते हैं इनका जवाब.....




छोटी सी भूल
एमपी एटीएस को यदि जम्मू-कश्मीर में गिरफ्तार आतंकियों से इनपुट नहीं मिलते तो शायद एमपी में चल रही साजिश का फंडाफोड़ नहीं हो पाता। एटीएस ने जिन आईएसआई एजेंटों को गिरफ्तार किया वे महज 2 लाख के चाइनीज एक्सचेंज से खुफिया जानकारियां पाकिस्तान पहुंचा रहे थे। तकनीक कोई नई नहीं थी, लेकिन कुछ खामियों और कानून की कमजोरियों का फायदा उठाकर उन्होंने खुद का नेटवर्क तैयार कर लिया। जो न तो ट्रेस हो रहा था और न ही सूचनाओं के आदान-प्रदान की भनक किसी को हो रही थी।





इसलिए बचते रहे आरोपी
- फोन या कंप्यूटर से सीधे किसी को कॉल करने या संदेश भेजने के लिए किसी कंपनी के नेटवर्क से होकर जाना होता है। 
- इससे कॉल करने वाले और कॉल प्राप्त करने की पूरी जानकारी ऑन रिकॉर्ड हो जाती है। 
- ऐसे में आईएसआई ने इसे ब्रेक करते हुए खुद का न केवल नेटवर्क तैयार किया, बल्कि फर्जी सॉफ्टवेयर और एक्सचेंज तैयार कर उसके माध्यम से अपनी पहचान छिपा ली। 
- एक्सचेंज में कॉल आने के बाद कॉल करने वाले की पहचान छिप जाती है, जबकि जिसको कॉल किया गया है सिर्फ उसकी जानकारी सैटेलाइट ट्रेस करके कॉल उस तक पहुंचा देता है। 
- सैटेलाइट सिर्फ पोस्टमैन की तरह पत्र को लिखे पते तक पहुंचाने का काम करता है।





इसलिए यह तकनीक उपयोग की
- टेलीफोन एक्सचेंज चंद हजार से लेकर कुछ लाख तक में मिल जाता है।
- दुनिया के कई देशों में सर्वर की जानकारी लीक नहीं की जाती। ऐसे में हैकर्स वहां के ही सर्वर खरीदते हैं।
- इस तकनीक में आईपी एडे्रस और जीपीएस ट्रेस नहीं हो पाता। डाटा भी डिकोड नहीं होता।





कानून में अभी ये कमियां
- ऑनलाइन डाटा ट्रांसफर को लेकर स्पष्ट कानून नहीं
- सैटेलाइट से कोई भी जानकारी निकलना इतना आसान नहीं
- कंपनियां चोरी छिपे वीओआईपी का उपयोग कर रहीं





फिर भी ऐसे पकड़ में आ गए
- खुद के सिम कार्ड नहीं बनाए
- सिम का क्लोन नहीं किया तैयार
- बड़े स्तर पर नेटवर्क फैलाने के कारण



 pakistan

इसलिए सिम जरूरी
- टॉवर और सैटेलाइट से जानकारी भेजने के लिए विशेष कोड की जरूरत होती है। जो सिम में होता है।
- तमाम खामियों और गलतियों के बावजूद भी खुफिया एजेंसी मुखबिर की सूचना पर इन्हें पकडऩे में कामयाब रही।
- भारत से आने-जाने वाले मैसेज में अंतर को ट्रेस कर आर्मी इंटीलेंस ने आईएसआई का नेटवर्क पकड़ा।

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