एक बागी ऐसा जिसके दहाडऩे भर से थर्राने लगती चंबल घाटी 

Deepesh Tiwari

Publish: Apr, 17 2017 04:20:00 (IST)

Bhopal, Madhya Pradesh, India
एक बागी ऐसा जिसके दहाडऩे भर से थर्राने लगती चंबल घाटी 

अपनी ही जमीन को छुड़ाने के लिए जब एक सच्चा देशभक्त बागी बना तो केवल उसके दुश्मन ही नहीं,पुलिस वाले तक उसके नाम से ही कांपने लगे।


भोपाल। चंबल के डाकुओं के जीवन की कहानी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। यही कारण है कि आज भी इनके जीवन पर फिल्में बनती रहती हैं। इनमें से कुछ डकैत जहां अपने को बागी कहलाना पसंद करते हैं, क्योंकि उनके अनुसार उन्होंने अपने उपर हुए अत्याचारों के बाद बगावत की थी न कि पैसा कमाने के लिए यह रास्ता चुना था। 

वहीं बाद में यहां की इस व्यवस्था में भी बदलाव आया और चंबल डकैतों का क्षेत्र बनता चला गया। यहां पकड़ ने एक उद्योग का रूप ले लिया और चंबल में बसे डकैतों ने इसे सीधे अपनी आमदानी का जरिया बना लिया।


  
चंबल के बागियों मे से एक था पानसिंह तोमर, कहा जाता है कि वह एक सच्चा देशभक्त होने के साथ-साथ ही एक एथलीट भी था। सेना का जवान होने के बावजूद उसे परिस्थितिवश डाकू बनना पड़ा। 1950 से 1960 के दशक में उसने सात सालों तक लंबी बाधा दौड़ में सफलता का रिकॉर्ड बनाया, जिसे 10 सालों तक कोई नहीं तोड़ सका।



daku pan singh tomar


वहीं कहा जाता है कि बागी बनने के बाद पान सिंह जब एक बार दहाड़ता, तो पूरी चंबल घाटी थर्राने लगती। पान सिंह का एनकाउंटर करने वाले तात्कालीन डीएसपी एमपी सिंह चौहान बताते हैं कि खुद पुलिस वाले भी पान सिंह के नाम से कांपते थे।

सेना में सूबेदार की जिम्मेदारी संभालते हुए उसने अपनी देशभक्ति दिखाई। पान सिंह तोमर का कैरियर भारतीय सेना के राजपूताना राइफल्स में शुरू हुआ, यहां उन्होंने लंबी दूरी के धावक के रूप में प्रशिक्षित किया। जहां उन्हें सुबेदर के रूप में पदोन्नत किया गया और रुडक़ी में बंगाल इंजीनियर्स ग्रुप में तैनात किया गया।



8 साल तक मांगता रहा सहायता :
वहीं समय पूर्व सेवानिवृत्ति लेने के बाद पान सिंह अपने गांव आ गया। उसका गांव मध्यप्रदेश में मुरैना के करीब था। यहां वह जमीनी विवाद में फंस गया। उसकी अपनी जमीन किसी साहूकार ने हड़प ली। खुद की जमीन पर कब्जा पाने के लिए तोमर 8 साल तक पुलिस और पंचायत की सहायता मांगता रहा।
इस दरम्यान उन्होंने अपने पदक और अपनी सफलता के कई प्रमाण भी इन्हें दिखाए, लेकिन पुलिसवालों पर उसका कोई असर नहीं हुआ। ऐसे में सिस्टम ने उसे पूरी तरह से तोड़ दिया था। मजबूरन उसे बंदूक उठानी पड़ी। उसके भतीजे बलवंता के अनुसार वह एक जीवट इंसान था। सेना में सेवा देने के कारण वह हमेशा अनुशासन में रहता था।




पान सिंह तोमर किसी प्रकार के नशे का आदि नहीं था। हां, वो पत्ते खेलने का काफी शौकीन था, लेकिन जुआ खेलना उसे पसंद नहीं था। कहा जाता है कि अपने दल में वो किसी को भी शराब नहीं पीने देता था। बलवंता के अनुसार एक आदमी का अपहरण करके 75,000रु. की फिरौती ली गई, जिससे हथियार खरीदे गए और एक दल बनाया गया।




पान सिंह तोमर के दल में कुल 28 डकैत थे। वो गरीबों पर कभी जुल्म नहीं करता था और महिलाओं की इज्जत करना उसके दल के सभी साथियों का प्रमुख कर्तव्य था। हर गरीब की मदद करने के कारण वह अपने इलाके में काफी मशहूर हो गया था। यहां तक कि तोमर ने खुद ये कहा कि एक खिलाड़ी के तौर पर उसे कोई नहीं जानता था, लेकिन डकैत होते ही वह काफी मशहूर हो गया।




pan singh home

जमीन पर आज भी उसके दुश्मनों का कब्जा :
चैम्पियन रहे रिटायर्ड सूबेदार पान सिंह तोमर ने जमीन पर कब्जे व हालातों से मजबूर होकर बंदूक थाम ली थी, लेकिन पुलिस एनकाउंटर में पान सिंह के मरने के बाद भी गांव नहीं बदला। पान सिंह की जमीन और मकान पर आज भी उन्हीं चचेरे भाइयों के वारिसों का कब्जा है, जिनकी प्रताडऩा से तंग आकर पान सिंह डाकू बना था।
पान सिंह की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी और बच्चे दूसरे शहरों में जाकर रहने लगे, साथ में डाकू रहे भतीजे बलवंत सिंह ग्वालियर में पत्थर के कारोबार में रम गए। इसके बाद गांव में रह गए उनके मकान पर अभी भी बाबू सिंह के वारिसों ने कब्जा कर लिया।  



पान सिंह का एनकाउंटर करने वाले तात्कालीन डीएसपी एमपी सिंह चौहान बताते हैं कि पुलिस वाले पान सिंह के नाम से कांपते थे। अपने भाई मातादीन की हत्या के बाद उसने तात्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को चैलेंज कर दिया था।






दरअसल 1981 में पान सिंह का भाई मातादीन पुलिस मुठभेड़ में मारा गया, जिसके बदले में पान सिंह ने गुर्जर समुदाय के छह लोगों की हत्या कर दी। इस घटना से एमपी की राजनीति में भूचाल आ गया। इसके बाद पान सिंह ने एमपी के तात्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को सीधे चैलेंज कर दिया। ये बात अर्जुन सिंह को खल गई। इसके बाद उन्होंने पान सिंह को जिंदा या मुर्दा पकडऩे का फरमान सुना दिया। बाद में तात्कालीन डीएसपी ने पान सिंह के गांव के लोगों को नौकरी का लालच देकर पान सिंह को पकडऩे के लिए मुखबिरी कराई। कहते हैं कि अक्टूबर 1981 में लगभग 10,000 की फ़ोर्स ने पान सिंह को घेरकर मार गिराया।



क्यों बना पान सिंह तोमर बागी:
साढ़े छह फिट ऊंचे कद वाले मुरैना के पान सिंह ने जमीन के लिए 8 साल तक जूते घिसे, लेकिन इसके बाद जब उसको अपनी जमीन वापस नहीं मिली तो वह डकैत बना गया। इससे पहले वह सेना में सूबेदार के पद पर तैनात था। ये डकैत राष्ट्रीय चैम्पियन भी रहा। सूबेदार के पद पर रहते उसने सात सालों तक ये मुकाम अपने नाम कर रखा था। एक बार उसने जमीनी विवाद में अपने रिश्तेदार बाबू सिंह की हत्या कर दी थी। इस घटना के बाद पान सिंह ने खुद को बागी घोषित कर दिया।

बागी बनने के बाद कभी देश के लिए दौडऩे वाला पान सिंह अब बीहड़ों में दौड़ रहा था। कुछ ही दिनों में बीहड़ों को रौंदते हुए पान सिंह पूरी चंबल घाटी का डकैत बन गया। कहते हैं कांटो से भरी चम्बल घाटी में शेर नहीं होते, लेकिन दुनिया ने पान सिंह को नाम दिया चंबल का शेर। 




arjun singh with police team

पान सिंह पर हुए थे सरकार के करोड़ों रुपये खर्च :
पान सिंह को पकडऩे के लिए बीएसएफ़ की दस कंपनिया, एसटीएफ़ की 15 कंपनिया लगाई गई थी। इसके अलावा जिला फ़ोर्स अलग था। डकैत पान सिंह को पकडऩे के लिए सरकार के करोड़ों रुपए खर्च हुए थे। पान सिंह के कभी दुश्मन रहे वीरेंद्र सिंह बताते हैं कि पान सिंह की खौफ से वह स्वयं 24 घंटे पुलिस साये में रहता था।



ताश खेलने का शौक़ीन था पान सिंह :
पान सिंह अपने गैंग में शामिल डाकुओं से नशा न करने की अपील करता था। पान सिंह का भतीजा बलवंत के अनुसार पान सिंह मजाकिया किस्म का इंसान था। वो बड़े बूढों से लेकर सबसे मजाक करता था। पान सिंह ताश खेलने का शौक़ीन था, उसे ताश में देहला पकड़ (ताश का एक खेल) बहुत पसंद था। पान सिंह की बेटी अट्टाकली बताती हैं कि पान सिंह फरारी के वक्त तीन-से चार बार घर आया, लेकिन वो घर पर कुछ लेकर नहीं आता था बल्कि घर से चार सौ-पांच सौ रुपया ले जाया करता था।



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