World AIDS Day: एक रूहानी रिश्ता ऐसा भी, जिसे तोड़ नहीं पाया वो सच

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World AIDS Day: एक रूहानी रिश्ता ऐसा भी, जिसे तोड़ नहीं पाया वो सच

इस सच्ची कहानी के पात्र हैं अरेरा कॉलोनी में रहने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर राहुल और मुंबई की प्रियंका। राहुल 2006 में नौकरी करने मुंबई गए थे। वहीं प्रियंका से मुलाकात हुई और इश्क परवान चढ़ा। 

प्रवीण श्रीवास्तव
भोपाल। सच्ची मोहब्बत की कहानी सुनिए, सिर्फ पात्रों के नाम बदले हैं। ऐसा इश्क, जिसे एड्स का खौफ भी नहीं डिगा सका। जुल्फों की ओट से निगाहों की शरारत के साथ एक रिश्ते की नींव रखी गई। सात जनम के सपने संजोये गए। इसी दरम्यान साथी एक बड़ी गलती कर बैठा, जिंदगी माला के मोतियों सरीखी बिखर गई। दूरी बनाने की कोशिश करने लगा, दोस्त ने सात फेरों के लिए जिद ठानी तो मजबूरी बताना जरूरी था। दोनों के बीच एक सन्नाटा खिंच गया।

एक तरफ मोहब्बत थी, दूसरी तरफ मौत की ओर जाने वाला रास्ता। दो दिन की कश्मकश के बाद इश्क ही सिकंदर बना। दोस्त ने तय किया कि गलती हुई तो कोई बात नहीं। जिंदगी साथ गुजारेंगे। परिवार को बड़े फैसले की जानकारी हुई तो बेटी को बहुत समझाया, लेकिन जिद अटूट थी। दोनों ने बगावत का झंडा थामा और जीवनसाथी बन गए। तय किया कि जिस्मानी रिश्ते नहीं बनाएंगे। वादा कायम है। मम्मी-पापा बनने की चाहत पूरी करने के लिए वर्ष 2012 में एक बेटी को गोद लिया तो आंगन में किलकारी गूंजने लगी।



इस सच्ची कहानी के पात्र हैं अरेरा कॉलोनी में रहने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर राहुल और मुंबई की प्रियंका। राहुल 2006 में नौकरी करने मुंबई गए थे। वहीं प्रियंका से मुलाकात हुई और इश्क परवान चढ़ा। राहुल बताते हैं कि वर्ष 2008 में तबीयत खराब रहने लगी। रोजाना बुखार रहता था, वजन घटने लगा। जांच कराई तो जिंदगी में भूचाल था। एचआईवी पॉजिटिव रिपोर्ट के बाद राहुल ने प्रियंका से बात करना बंद कर दिया। जिंदगी में किसी दूसरी के दखल की आशंका से प्रियंका डर गई थी। हकीकत मालूम हुई तो खूब रोई।


दो दिन का वक्त मांगा...
इसके बाद ऐसा फैसला किया, जो आसान नहीं था। बहरहाल इश्क की ताकत देखिए। एचआईवी पॉजिटिव रिपोर्ट के मुताबिक राहुल की रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहद कम थी, उनकी जिंदगी के दिन गिने-चुने थे। प्रियंका की मोहब्बत से राहुल को हिम्मत मिली। इलाज शुरू किया, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ गई। वक्त गुजरता गया, दोनों के परिवार ने राहुल-प्रियंका के रिश्ते और निर्णय को कबूल कर लिया। फिलहाल दोनों खुशहाल जिंदगी गुजार रहे हैं। 


दोनों की जिंदगी तन्हा थी अब खिलखिलाती है
पुराने शहर के राजपाल शेखावत की जिंदगी तन्हा-तन्हा थी। वर्ष 2008 में एक गलती ने उन्हें समाज-परिवार से दूर कर दिया था। दोस्त भी छिटक चुके थे। ऐसे हालात में लोग मौत का रास्ता अख्तियार कर लेते हैं। राजपाल तो 'जिंदगी जिंदाबाद' पर विश्वास करते थे। एक बरस बाद एआरटी सेंटर में एक दिन राजपाल की नजर एक चेहरे पर अटक गई। जज्बातों को टटोला तो मालूम हुआ कि उसकी कहानी भी राजपाल जैसी है। दोनों करीब आए और रिश्तों की डोर बंध गई। बेगानी जिंदगी में रौनक लौट आई। अब मियां-बीवी मिलकर एक NGO के साथ काम करते हैं। अपने जैसे दूसरे लोगों को जिंदगी जिंदाबाद का संदेश बांटते हैं।

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