श्रीकृष्ण-सुदामा की मित्रता वर्षों बाद भी है प्रासंगिक

Kajal Kiran Kashyap

Publish: Jun, 19 2017 08:44:00 (IST)

Bilaspur, Chhattisgarh, India
श्रीकृष्ण-सुदामा की मित्रता वर्षों बाद भी है प्रासंगिक

सुदामा की पत्नी ने पड़ोंसियों के यहां से लाए चावल एक फटी हुई पोटली में बांधकर अपने पति सुदामा को दिया।

बिलासपुर. श्री कृष्ण-सुदामा की मित्रता वर्षों बाद भी प्रासंगिक है। वर्तमान में लोगों को इससे सीख लेना चाहिए। क्योंकि आज जो मित्रता होती है उसमें किसी न किसी तरह का स्वार्थ छिपा होता है। प्रभु श्रीकृष्ण व सुदामा की मित्रता में किसी तरह का स्वार्थ नहीं था। दोनों ने वर्षों बाद मिलने पर भी अपनी मित्र धर्म का पालन किया। मित्रता करनी है तो भगवान श्रीकृष्ण व सुदामा की तरह करनी चाहिए। यह बातें कथावाचक आचार्य पंडित अनिल शर्मा ने ग्राम जलसो में चल रही श्रीमद् भागवत कथा में सुदामा चरित्र का प्रसंग सुनाते हुए कहा। ग्राम जलसो में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया गया है।

 पिछले कुछ दिनों से कथा के माध्यम से श्रद्धालु श्री हरि विष्णु की कथा सुनकर भक्ति में लीन हो रहे है। सोमवार को कथा का समापन हुआ। इसे पूर्व श्री सुदामा चरित्र की कथा विस्तार से सुनाते हुए आचार्य पंडित अनिल शर्मा ने कहा कि सुदामा भगवान श्रीकृष्ण के परम मित्र थे। गरीब ब्राह्मण होने की वजह से परिवार अभावों में किसी तरह पल रहा था। एक दिन उनकी पत्नी सुशीला ने सुदामा को श्रीकृष्ण के पास जाने का आग्रह किया। तब सुदामा ने कहा कि मैं भगवान के दर्शन करने जा सकता हूं। लेकिन भगवान से कुछ मांगने के लिए नहीं जा सकता। इस पर पत्नी ने कहा कि ठीक है आप उनका दर्शन करने चले जाएं। सुदामा की पत्नी ने पड़ोंसियों के यहां से लाए चावल एक फटी हुई पोटली में बांधकर अपने पति सुदामा को दिया।

 इसके बाद सुदामा द्वारिका चले गए। महल में सुदामा के आने की बाद सुनकर प्रभु सुदामा से मिलने के लिए व्याकुल हो गए। उनका आदर सत्कार किया। पोटली से चावल मुठ्ठी में लेकर खाने लगे। जिससे सुदामा की गरीबी दूर हुई और पूरा परिवार सुख-समृद्धि का जीवन व्यतीत करने लगा। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु कथा का श्रवण करने उपस्थित रहे।

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