शंकराचार्य निश्चलानंद ने बताया धर्म का महत्व, बोले धर्म की रक्षा व्यक्ति नहीं, व्यक्ति की रक्षा करता है धर्म

Kajal Kiran Kashyap

Publish: Jun, 20 2017 12:49:00 (IST)

bilaspur
शंकराचार्य निश्चलानंद ने बताया धर्म का महत्व, बोले धर्म की रक्षा व्यक्ति नहीं, व्यक्ति की रक्षा करता है धर्म
बिलासपुर. धर्म नगरी रतनपुर में प्राण-प्रतिष्ठा यज्ञ महोत्सव और विशाल धर्म सभा में पुरी पीठ के शंकराचार्य  निश्चलानंद   महाराज कहा कि धर्म की रक्षा कोई क्या करेगा, धर्म ही व्यक्ति की रक्षा करता है। जब तक आग में दाह और प्रकाश है, जब तक उसका अस्तित्व है और उसकी उपयोगिता है। अग्नि से दाह प्रकाश की रक्षा होती है। मनु भगवान ने कहा कि धर्म की जो रक्षा करता है, अर्थात् धर्म को जो अपने जीवन में उतारता है, वह विधिवत समझकर धर्म के द्वारा रक्षित हो जाता है।

जो धर्म की रक्षा नहीं करता अर्थात् धर्म को अपने जीवन में नहीं उतारता, वह धर्म के द्वारा ही खाक बन जाता और नष्ट हो जाता है। धर्म की रक्षा करने वाले की रक्षा होती है। जो धर्म का पालन नहीं करता, धर्म का अनुपालन नहीं करता, धर्म को धारण नहीं करता और धर्माकुल आचार-विचार नहीं करता, वही व्यक्ति धर्म के अभाव में नष्ट हो जाता है। धर्म से ही जीवन की सार्थकता है। आज के आधुनिक युग में भी सनातन धर्म ही सर्वोच्च है। सभी को लेखन, प्रवचन, आचरण और प्रचार तंत्र के माध्यम से धर्म की रक्षा का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए।

पुरीपीठ के शंकराचार्य ने रतनपुर के ग्राम पोड़ी में आयोजित विशाल धर्म सभा में शामिल हुए। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि एक होता है धर्म और एक होता है धर्मा भास। कुरान शरीर और बाइबिल में धर्म शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है। अंग्रेजी में रिलिजन शब्द है, जो धर्म के भाव को सही रूप से प्रकट करने में समर्थ नहीं है। उन्होंने बताया कि सनातन वैदिक धर्म के अतिरिक्त संसार में जितने भी धर्म हैं, वह सूत संहिता के अनुसार धर्माभास हैं। शंकराचार्य  ने बताया कि धर्म के दो भेद होते हैं। पहला सिद्ध धर्म और दूसरा साध्य धर्म। भगवत तत्व और संसार सिद्ध धर्म है। सिद्ध पदार्थ में जो संन्निहित गुण धर्म है। उसे ही हम सिद्ध धर्म कहते हैं। जैसे पृथ्वी तब तक पृथ्वी है जब तक गंध नामक गुण उसमें है, जल तब तक जल है, जब तक उसमें रस नामक गुण हैं। उन्होंने साध्य धर्म का उदाहरण से समझाया कि भोजन विज्ञान में बनाने से भूख की निवृत्ति नहीं होती। भोजन खाने से भूख की निवृत्ति होती है। ठीक उसी तरह जिस तरह यज्ञ करने से यज्ञ  की सिद्धि होती है। दान करने से दान की सिद्धि होती है। इसे साध्य कोटि का धर्म कहा गया है। शंकराचार्य   ने पुरुषार्थ करने, मोक्ष प्राप्ति, नारी धर्म सहित अपने विषयों में श्रद्धालुओं के प्रश्नों के जवाब दिए। उन्होंने सभी से धर्म के रास्ते पर चलने के की बात कही। इस अवसर पर सैकड़ों लोगों ने शंकराचार्य   से दीक्षा ली। इस अवसर पीठ परिषद के राष्टीय उपाध्यक्ष पं. झम्मन शास्त्री, आनंद वाहिनी के राष्ट्रीय महामंत्री सीमा तिवारी, आदित्य वाहिनी के प्रदेश अध्यक्ष शैलेष पांडेय, राष्ट्रोत्कर्ष समिति के संयोजक प्रफुल्ल शर्मा, प्रदेश कार्यक्रम प्रभारी संदीप पाण्डेय और रतनपुर आदित्यवाहिनी के अध्यक्ष रमेश शर्मा सहित बड़ी संख्या मे लोग उपस्थित थे।

बेटी को  बेटा न कहें
शंकराचार्य  ने बताया कि वर्तमान समय में बेटी को बेटा पुकारने का प्रचलन बढ़ा है। माता-पिता ही बेटी को बेटा कहते हैं। इससे बेटी के मन से यह बात आ जाती है कि बेटा श्रेष्ठ होता है, बेटी होने के बाद मेरे माता पिता मुझे बेटा कह कर बुलाते हैं। उन्होनें कहा कि बेटी पर दो परिवारों का  दायित्व होता है। वे दोनों परिवार को मान रखकर जीवन को चलाती हैं। उन्होनें कहा कि आज तक पुत्र की चाह में भू्रण में जांच की जाती है, यदि पुत्र नहीं होने पर गर्भ में ही कन्या की हत्या कर दी जाती है। उन्होने माताओंं से कहा कि ऐसी बात में कभी भी पुरूषों का समर्थन न करें। उन्होंने कहा कि मां के गर्भ में 9 महीने रहकर ही कोई भी मनुष्य इस संसार में आता है। इसलिए हर किसी में पिता की तुलना में मां की लक्षण अधिक होते हैं।

गौ संरक्षण के लिए आगे आए ग्रामीण
मंदिर परिसर में हजारों की संख्या में ग्रामीणों ने शंकराचार्य से गौ संरक्षण की गुहार लगाई। गौ वध  पर चिंता जाहिर करते हुए ग्रामाणों ने शंकराचार्य  से बात की। इस पर उन्होंने कहा कि गौ वंश की रक्षा करना प्रत्येक हिन्दु का धर्म है, जो लोगों को गाय, जीवन और उसका महत्व लोगों को बताएगा। सभी वर्ग के लोगों को गौ माता अंगों में देवताओं के वास और गौ से पर्यावरण और मनुष्य जीवन के लाभ की जानकारी देने कहा। उन्होंने कहा कि हर वार्ड में गौ रक्षा के लिए समिति बनाई जाए। इसके बाद ब्लाक, शहर और प्रदेश स्तर में यह टीम सामंजस्य से काम करेगी। उन्होंने आदित्य वाहिनी के पदाधिकारियों को इस ओर काम करने के लिए निर्देश दिए।

याद आ गए स्कूल के दिन
मन की एकाग्रता करने के लिए छोटे बच्चों ने प्रश्न किया, जिसका जवाब देते हुए शंकराचार्य  ने अपने बचपन के जीवन की यादें साझा की। उन्होंने बताया कि वे जब 5 साल के थे। तब तक उनका स्कूल में प्रवेश नहीं कराया गया था। वे पूरा दिन खेल  और घूमकर ही बिताते थे। उनके बडे भाई और पड़ोसी ने उनके हाथ-पैर पकड़कर स्कूल प्रवेश दिलाने ले गए। उस समय वे स्कूल नहीं जाना चाहते थे। पूरे रास्ते भर स्कूल नहीं जाउंगा कह कर रोते रहे। उन्होंने मन की एकग्रता पर कहा कि  जिस बात का हम अभ्यास करते हैं, कुछ समय बात उससे पे्ररित हो जाते हैं। बस यहां से ही उस काम में हमारा मन लगना शुरू हो जाता है। इसलिए विद्यार्थियों को पढ़ाई का अभ्यास करना चाहिए तो स्वत: ही एकाग्रता आ जाएगी।

धर्म नगरी में विराजीं मां मंगला गौरी
पुरीपीठ शंकराचार्य  निश्चलानंद  महाराज की अगुवाई में ग्राम पोड़ी में 5 दिवसीय प्राण प्रतिष्ठा यज्ञ महोत्सव और विशाल धर्म सभा का आयोजन किया गया है। सोमवार को ग्राम पोड़ी में मां मंगला गौरी देवी मंदिर में माता एवं आदि शंकराचार्य की विधि विधान से प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की गई। इस अवसर पर अंचल के हजारों श्रद्वालुओं ने मंदिर में पूजा अर्चना की। इस मौके पर शंकराचार्य  निश्चलानंद ने विशेष रूप से उपस्थित  थे। वैदिक मं़त्रौच्चार से रतनपुर का पूरा अंचल गूंज उठा और लोग भक्ति में सराबोर रहे। 15 जून से प्रारंभ हुए इस प्राण प्रतिष्ठा यज्ञ महोत्सव और विशाल धर्म सभा में प्रथम दिवस पंचांग पूजन, मंडप प्रवेश और जलयात्रा निकाली गई, जिसमें हजारों की संख्या में ग्रामीण शामिल हुए। देवी का जयकारा लगाते हुए यात्रा मंदिर परिसर पहुंची। दूसरे  दिन वैदिक रीति से वेद पूजन स्थापना और अग्नि स्थापना की गई। तीसरे दिन मंदिर में जलधिवास, अन्नाधिवास, और घृतधिवास किया गया। प्रतिदिन शाम को मंदिर में भजन-कीर्तन और सत्संग का आयोजन किया गया। इसी तरह चौथे दिन पुष्पाधिवास, फलाधिवास किया गया। 19 जून को मां मंगला गौरी और आदि शंकराचार्य महाराज की दिव्य प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की गई। सुबह से मंदिर में पूजा अर्चना की गई। दोपहर शुभमुहूर्त में सैकड़ों पंडितों ने मंत्रोचार से अंचल भक्ति से सराबोर हो गया। सुदूर अंचल से आए लोगों के देवी दर्शनकर मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना की।

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