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मुर्गीपालन से मरूवासी होंगे मालामाल

सांचौर।आय के स्रोत बढ़ाने का एक बेहतर साधन बन चुका मुर्गी पालन (पॉल्ट्री) अब मरू प्रदेश मे...

जालोर

Published: January 20, 2015 02:30:26 pm

सांचौर।आय के स्रोत बढ़ाने का एक बेहतर साधन बन चुका मुर्गी पालन (पॉल्ट्री) अब मरू प्रदेश में भी दस्तक दे चुकी है।क्षेत्र में नर्मदा नहर आने के बाद क्षेत्र में भी मुर्गीपालन व्यवसाय के वृहद उद्योग बनने की सम्भावनाएं बननी लगी हंै।क्षेत्र के अचलपुरा गांव में पहली बार मुर्गीपालन का सफल परीक्षण किया जा चुका है।


करीब डेढ़ माह की मेहनत के बाद क्षेत्र में पहला पॉल्ट्री फॉर्मतैयार हो चुका है। दरअसल, क्षेत्र में नर्मदा का नीर आने के बाद किसानों ने कृषि के क्षेत्र में नए प्रयोग करने शुरू कर दिए हैं। किसानों ने फल, सब्जी सहित अन्य व्यापारिक फसलों का सफलतापूर्वक उत्पादन किया है, लेकिन अनुभव के अभाव में आज भी किसान पूरा फायदा नहीं उठा पा रहे हैं। अचलपुर गांव में एक किसान ने पॉल्ट्री फॉर्म तैयार किया है।इसके लिए 25 गुणा 50 फीट क्षेत्र में टीन शेड तैयार किया है। जिसमें एक हजार मुर्गियों के पालन की क्षमता है। फार्म में एक हजार मुर्गी चूजे 1 दिसम्बर 2014 को लाए गए थे, जो आज चालीस दिन में ही तैयार हो चुके हैं। फिलहाल, सभी चूजे स्वथ्य हैतथा प्रत्येक का वजन करीब दो से सवा दो किलोग्राम है। क्षेत्र में मुर्गी पालन को लेकर मौसम अनुकूल है। क्षेत्र के किसान मुर्गी पालन को लेकर नया प्रयोग कर रहे हैं।करीब चालीस दिन से चल रहा प्रयोग अब सफलता की ओर है।


किसानों को नहीं जानकारी


क्षेत्र के किसानों को मुर्गीपालन एवं सरकारी योजनाओं की जानकारी नहीं होने से मुर्गीपालन को बढ़ावा नहीं मिल रहा है। किसानों को मुर्गीपालन की विविध प्रकार की जानकारी मिलने पर मुर्गीपालन को बढ़ावा मिल सकता है वहीं किसानों को नया रोजगार भी मिल सकता है। सांचौर क्षेत्र में नर्मदा नहर का पानी आने से किसान सक्षम हो गए हैं। वहीं पानी आने से क्षेत्रमें सिंचाईहो रही है। वहीं किसान समृद्ध भी हो रहा है। अब किसानों को मुर्गीपालन को बढ़ावा मिलने पर किसान और भी समृद्ध हो सकते हैं।

देसी मुर्गा का व्यवसाय भी लाभकारी


पॉल्ट्री फॉर्म के अलावा गांव-देहात में देसी मुर्गे का व्यवसाय भी लाभकारी साबित हो रहा है। एक तो देसी मुर्गी पालन में ज्यादा खर्च नहीं आता और इसकी कीमत भी ज्यादा होती है, लेकिन यह धंधा व्यवसाय के रूप में कम पारिवारिक लाभ के लिए ज्यादा किया जाता है। बावजूद इसी मांग बनी हुईहै।

मेहनत के अनुरूप लाभ


पॉल्ट्री व्यवसाय में मेहनत के अनुरूप लाभ मिलता है। देख-रेख व साफ.-सफाई पर ध्यान देना जरूरी होता है। दरअसल, मुर्गीपालन के दौरान बीमारी होने पर नुकसान की आशंका भी बनी रहती है। ऎसे में इस व्यवसाय में साफ-सफाई एवं सजग रहने की जरूरत होती है।

मुर्गीपालन की विधि


चूजे को पालनपुर से लाया जाता है।जो एक दिन के होते हैं।चूजे के खाने के लिए तीन तरह के दाने आते हैं। एक दिन से पांच दिन तक प्री-स्टाटर जो 2.50 से 3 एमएम, छह से दस दिन तक स्टाटर जो 3 से 4 एमएम एवं फिनिशर नामक दाना जो 4 से 5 एमएम का होता है।चूजे को 45 दिन तक पालन करते हैं।45 दिनों बाद में चूजे का वजन करीब दो से ढाईकिलो हो जाता है। उसके बाद में उसे व्यापारियों को बेचा जाता है।एक चूजे को परिपक्व होने के बाद बाजार में पहुंचाने तक लागत करीब 130 रूपए आती है, जो तैयार होने पर 200 से 250 रूपए में बाजार में बिकता हैं।

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