पेटीएम ने माना- ‘उत्साहित होकर लगा दी थी प्रधानमंत्री की फोटो'

pritesh gupta

Publish: Mar, 16 2017 06:27:00 (IST)

Corporate
पेटीएम ने माना- ‘उत्साहित होकर लगा दी थी प्रधानमंत्री की फोटो'

अपने विज्ञापन में प्रधानमंत्री की फोटो लगाकर पेटीएम काफी विवादों में रहा था, हालांकि अब उन्होंने इस मसले पर माफी मांग ली है। जानिए, क्या कहते हैं पेटीएम के फाउंडर इस फैसले के पीछे...

अपने विज्ञापन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीरों का ताबड़तोड़ उपयोग करने के बाद आलोचनाओं के शिकार हुए पेटीएम के संस्थापक विजय शेखर शर्मा ने आखिरकार सफाई देते हुए माफी भी मांग ली है। 'पत्रिका' के प्रीतेश गुप्ता को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने माना कि यह फैसला उत्साह में लिया गया था। बातचीत के दौरान उन्होंने मोबाइल वॉलेट, नोटबंदी के असर, टेक्नोलॉजी के भविष्य, ग्राहकों की सुरक्षा समेत कई मुद्दों पर अपने विचार साझा किए। जानिए, किस तरह से नोटबंदी के बाद रातों रात पेटीएम के मुनाफे में जबर्दस्त उछाल देखने को मिला...

... क्या 2011 में पेटीएम की शुरुआत के समय नोटबंदी जैसे किसी कदम की अपेक्षा की थी? किस तरह से देखते हैं डिमोनेटाइजेशन को?

2011 में ना ये सरकार थी और ना ही नोटबंदी। हमने इसे सिर्फ नोटबंदी और नोट बदलवाने तक सीमित नहीं माना, बल्कि ऐसे अवसर के रूप में देखा जो टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल और मोबाइल पेमेंट को बढ़ावा दे सके। जब 500-1000 के नोटों के बंद होने की खबर आई तो हमें लगा कि ग्राहकों के पास कैश नहीं रहा तो बड़ी मुसीबत हो जाएगी। खबर मिलते ही एटीएम और बैंकों के बाहर लंबी-लंबी लाइनों की तस्वीरें दिमाग में घनघनाने लगी थी। तब हमने सोचा कि हम उन लोगों की मदद कर सकते हैं, जिनके पास मोबाइल है। यह हमारे लिए एक टेक्नोलॉजी के टेस्ट की तरह था। रिक्शा चालक, सब्जी विक्रेता जैसे कई लोग जो आमतौर पर टेक्नोसेवी नहीं होते उनकी मदद करना एक चुनौती था। इसमें काफी हद तक सफलता भी मिली। यह वो दौर है जब हम कई तरह के प्रयोगों के जरिये नई चीजों की शुरुआत कर सकते हैं।

8 नवंबर रात 8 बजे डिमोनेटाइजेशन होता है और अखबारों के फ्रंट पेज पेटीएम के रंग में रंग जाते हैं। इतनी एग्रेसिव प्लानिंग कैसे?

नोटबंदी के ऐलान के बाद हमारा यह हमारे लिए एक मिशन बन गया था। हमने सेल्स, बिजनेस, मार्केटिंग समेत सारे डिपार्टमेंट्स को मर्चेंट साइनअप पर लगा दिया था। सभी का एक ही काम था। प्रोडक्ट टीम को हमने पेटीएम को ज्यादा से ज्यादा भाषाओं में उपयोग के लायक बनाने का काम सौंप दिया। इससे पहले पेटीएम ज्यादातर इंग्लिश और थोड़ा बहुत हिंदी में चलता था। अब हमने उन्हें हिंदी में पूरी सुविधाएं देने के साथ-साथ तमिल, तेलुगु, मलयालम समेत अन्य भाषाओं में भी शुरू करने को कह दिया। इसके बाद मेरे सहित दो-तीन लोगों की टीम ने कैंपेन करने का जिम्मा उठाया। 

नोटबंदी के बाद आपने सबसे एग्रेसिव अंदाज में कंपनी को बूस्ट किया। इस दौरान कई ऐसी घटनाएं भी हुईं जिन पर सवाल उठे। अपने विज्ञापन में प्रधानमंत्री की तस्वीर के इस्तेमाल पर क्या कहेंगे?

देखिए, जब डिमोनेटाइजेशन हुआ तो एक स्टार्टअप और टेक्नोलॉजी कंपनी के रूप में हमने देखा कि बूस्ट का इससे बेहतर मौका आसानी से नहीं मिलता, क्योंकि इसने लोगों को टेक्नोलॉजी का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित या यूं कहें मजबूर कर दिया। ये इतना ऐतिहासिक निर्णय था कि हमने भी उत्साहित होकर प्रधानमंत्री जी को शुभकामनाएं दे दी। मेरा मानना है कि हमने इसमें किसी तरह से दुरुपयोग नहीं किया। प्रधानमंत्री पद की अपनी गरिमा है, ऐसे में यदि हम इसका व्यावसायिक उपयोग करते तो बात अलग थी। इसलिए हमने अपने ब्रैंड और मैसेज को बिल्कुल अलग रखा। प्रोडक्ट का मैसेज हमने दूसरे पेज पर दिया। कई बार कई तरह की यूनियन इस तरह से धन्यवाद करती हैं। पूरी इंडस्ट्री को शामिल करने के लिए आपको इंडस्ट्री बॉडी में प्रस्ताव पर सहमति लेनी पड़ती है। वो भी हुआ बाद में आईएमईआई की तरफ से भी फोटो आया था। लेकिन इसमें दो हफ्तों का समय लग गया। इसी देरी को पाटने के लिए हमने ये फैसला लिया था। 

राहुल गांधी का कहना है- पेटीएम का मतलब 'पे टू मोदी' है, आप कैसे देखते हैं इसको?

देखिए, हम पेटीएम को क्या समझते हैं यह इतना महत्वपूर्ण नहीं है। सारी दुनिया के यूजर्स पेटीएम को क्या समझते हैं वो अहम है। हम एक टेक्नोलॉजी स्टार्टअप हैं। सियासत के संबंध में कोई जानकारी नहीं रखते हैं। हमने 2011 में इसकी शुरुआत की थी, तब ना तो नोटबंदी थी और ना ये सरकार थी।

Rajasthan Patrika Live TV

1
Ad Block is Banned