शहीदों की मां ने सांसद को ऐसा क्या बताया कि वे भी रह गए अवाक, पढि़ए पूरी खबर

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 शहीदों की मां ने सांसद को ऐसा क्या बताया कि वे भी रह गए अवाक, पढि़ए पूरी खबर

देश के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर करने वाले शहीदों के परिजनों की उपेक्षा हो रही है। इसका उदाहरण उस समय सामने आया जब सांसद उनके परिवार को शॉल श्रीफल से सम्मानित करने गए।

भिलाई. देश के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर करने वाले शहीदों शहीदों के परिजनों की उपेक्षा हो रही है। इसका ताजा उदाहरण उस समय सामने आया जब सांसद ताम्रध्वज साहू और महापौर देवेन्द्र यादव ने अखिल भारतीय कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी के जन्म दिन पर शहीदों के परिवार को शॉल श्रीफल से सम्मानित करने गए। जहां शहीदों के परिजनों ने अपनी व्यथा बताई। उनकी व्यवस्था ने सरकार के दावे की पोल खोल दी। जानिए शहीदों के परिजनों ने सांसद के सामने कैसे अपनी व्यवस्था व्यक्त की।

शहीद चुम्मन यादव

शहीद चुम्मन यादव की मां राधा बाई ग्रुप बीमा की राशि के लिए तीन साल से शासकीय दफ्तर का चक्कर लगा रही है। उनका कहना है कि वह कलक्टर कार्यालय में कई बार आवेदन दे चुकी हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। इसलिए अब वह आवेदन देना ही छोड़ दिया। उन्होंने बताया कि सुरक्षा विभाग से गु्रप बीमा के अंतर्गत 4 लाख रुपए और प्रतिमाह 25 हजार रुपए पेंशन की जानकारी दी थी। पेंशन के रूप में हर माह 25 हजार रुपए मिलती है, लेकिन बीमा की राशि नहीं मिली। उन्होंने घोषणा के मुताबिक छावनी चौक पर शहीद बेटे की प्रतिमा नहीं लगाए जाने पर दु:ख प्रकट की।

30 अगस्त 2014 को शहीद

बता दें कि शहीद चुम्मन 30 अगस्त 2014 को काश्मीर में आतंकवादियों से लोहा लेेते हुए शहीद हो गया था।
 mother of the martyrs
शहीद विश्राम मांझी

कैंप-2 मिलन चौक निवासी शहीद विश्राम मांझी के पिता सीताराम के चले जाने के बाद मानों मां रुखमण्ी मांझी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। मां का कहना है कि जब तक पिता थे। तब तक शासन ने उन्हें पेंशन दी। उनके जाने के बाद पेंशन बंद हो गया। 2014 में रक्षा मंत्रालय को नाम जुड़वाने के लिए कलक्टर कार्यालय और सेना के दफ्तर में आवेदन दिया। सुनवाई नहीं हुई तो तीन साल में चार से अधिक आवेदन दे चुकी हूं। लेकिन नाम नहीं जुड़ पाया। बेटा और बेटी के साथ तंगहाली में जीवन जी रही है।

10 नवंबर 2006 को शहीद

बता दें कि विश्राम मांझी 10 नवंबर 2006 में शहीद हुआ था। इसके बाद उनके पिता को हर माह 25 हजार रुपए पेंशन मिलती थी।  
 mother of the martyrs
शहीद किरण देखमुख

शहीद किरण देखमुख के परिवार को पेंशन तो मिल रही है। फिर भी शहीद की मां रुपा देशमुख एक-एक रुपए के लिए मोहताज हो गई है। शहीद की मां का कहना है कि पेंशन शहीद की पत्नी को मिलती है। शासन ने उन्हें क्लर्क की नौकरी देने ऑफर लेटर भी भेजा। उन्हें क्लर्क की नौकरी पंसद नहीं आई। उन्होंने शासन से शिक्षाकर्मी की नौकरी की मांग की। जब शासन से कोई जवाब नहीं आया तो वह घर छोड़कर मायके चली गई। तो बेटी सहारा बनीं। मितानीन के रूप में शासन से जो प्रोत्साहन राशि मिलती है। उससे ही परिवार का खर्चा चल रही है।

2015 में वीर गति को प्राप्त

रिसाली निवासी किरण देशमुख बस्तर में नक्सली से लड़ाई करते हुए 2015 में वीर गति को प्राप्त हो गया था।

उनका हक मिलना चाहिए

सांसद ताम्रध्वज साहू ने कहा कि शहीद परिजनों से मुलाकात में पेंशन की समस्याएं में आई है। उच्च स्तर पर निराकरण के लिए प्रयास करूंगा। यह बहुत खेद जनक है कि शहीदों के परिजनों को सरकारी व्यवस्था में परेशान होना पड़ रहा है। उनका जो हक है। वह मिलना चाहिए।

स्थानीय स्टायफंड के लिए शासन को पत्र लिखेंगे

महापौर देवेन्द्र यादव ने कहा कि शहीद परिवार से मुलाकात में बहुत सी बातें सामने आई। परिवार को पेंशन को लेकर कहां, क्या दिक्कत है, इस बारे में जानकारी लेकर पेंशन के लिए प्रयास किया जाएगा। स्थानीय स्टायफंड के लिए भी शासन को पत्र लिखेंगे।

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