यूपी में खेल बदहालः तीन बार रोशन किया प्रदेश का नाम, आज बेच रहा है ब्रेड पकोड़े

Noida, Uttar Pradesh, India
 यूपी में खेल बदहालः तीन बार रोशन किया प्रदेश का नाम, आज बेच रहा है ब्रेड पकोड़े

देखिये कैसे, प्रदेश में खेल की प्रतिभाएं जमीनी स्तर पर तोड़ रही हैं दम

वैभव शर्मा/गाजियाबाद. यूपी में भाजपा की सरकार आने के बाद किसान और आम आदमी के विकास को लेकर ढेरों वादे किए गए। प्रतिभाओं को उभारने के लिए प्लेटफार्म दिए जाने की बात भी कही गई, लेकिन जमीनी स्तर पर प्रदेश में खेल की प्रतिभाएं दम तोड़ रही हैं। दुर्गेश ऐसी ही शख्सियत में से एक हैं जिन्होंने तीन बार अपने दम पर देशभर में उत्तर प्रदेश का नाम रोशन किया, लेकिन खुद आज पहचान के लिए मोहताज हैं। सरकारी स्तर पर कोई आर्थिक सहयोग नहीं मिला तो मजबूर होकर इस चैम्पियन को परिवार पालने के लिए ब्रेड पकोड़े की दुकान लगानी पड़ रही है। गाजियाबाद के लिए अब तक तीन बार वो स्टेट लेवल पर पावर लिफ्टिंग का खिताब जीत चुके हैं।

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2002 में की थी पावर लिफ्टिंग की शुरुआत

पावर लिफ्टर दुर्गेश के मुताबिक वो मूलतः मध्य प्रदेश के भिंड से हैं। दिल्ली में साल 2002 में पावर लिफ्टिंग की शुरुआत की थी और लक्ष्य रखा था कि यूपी का नाम चैम्पियन के रूप में दर्ज कराएं। दिन-रात कड़ी मेहनत की और अपने दमखम पर तीन बार उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व किया, लेकिन सरकार से कोई सहयोग न मिलने की वजह से सपना जिम्मेदारी के बीच दबता चला गया।

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खेत से की थी कुश्ती की शुरुआत

इंदिरापुरम के न्यायखंड-2 में दुर्गेश अपनी पत्नी प्रतिमा और 4 साल की बेटी वैष्णवी उर्फ सौम्या के साथ रहते हैं। उनकी घर के पास ही चाय, पकोड़े और समोसे की दुकान है। उन्होंने बताया कि 10 साल की उम्र में उनके पिता ब्रिज मोहन कुश्ती कराने ले जाते थे। गांव के खेत में अखाड़ा बनाकर तीनों भाईयों को आपस में लड़ाते थे। काफी देर प्रैक्टिस कराने के बाद अगले दिन प्रतियोगिता में हिस्सा भी दिलाते थे, लेकिन पिता ब्रिज मोहन का ये सिलसिला ज्यादा दिन नहीं चल पाया।

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आगरा चैम्पियनशिप में मिला दूसरा स्थान

दुर्गेश के मुताबिक साल 2006 में आगरा के सादाबाद में आयोजित वेस्टर्न यूपी पावर लिफ्टिंग चैंपियनशिप में शामिल होकर सेकंड प्लेस पर कब्जा किया। यहां उन्होंने 67.5 किलोग्राम भार वर्ग में जबर्दस्त प्रदर्शन कर सभी को चौंका दिया था।

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रेलवे में की पार्ट-टाइम पार्सल बाबू की नौकरी

परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी इसलिए दुर्गेश ने 2005 से चैंपियनशिप में हिस्सा लेने के लिए रेलवे में पार्सल बाबू की प्राइवेट नौकरी शुरू कर दी। सुबह के समय जिम में प्रैक्टिस करने के बाद वह पैदल नौकरी पर चले जाते थे। उसके बाद फिर से वैट लिफ्टिंग की प्रैक्टिस करने जिम आ जाते थे, लेकिन ये सिलसिला भी ज्यादा माह तक नहीं चल पाया था। अगले साल अप्रैल माह में वेस्टर्न यूपी स्टेट चैंपियनशिप की प्रैक्टिस के लिए दुर्गेश ने पार्सल बाबू की नौकरी को भी छोड़ दिया।

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साल 2008 में नेशनल के ट्रायल में पांचवीं प्लेस

यूपी पावर लिफ्टिंग एसोसिएशन की ओर से साल 2008 में मथुरा में नैशनल चैंपियनशिप के लिए ट्रायल का आयोजन किया गया था। जहां उन्होंने 67.5 किलोग्राम भार वर्ग में हिस्सा लेकर पांचवीं प्लेस पर कब्जा किया। आयोजकों ने भी दुर्गेश की मेहनत की जमकर तारीफ की। मगर आर्थिक कंडीशन ठीक नहीं होने की वजह से वह नैशनल चैंपियनशिप में हिस्सा नहीं ले पाए।

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2010 में आखिरी चैंपियनशिप में भी जीता सिल्वर मेडल


दुर्गेश ने साल 2010 में मोदीनगर में आयोजित यूपी स्टेट डेड लिफ्ट चैंपियनशिप में हिस्सा लिया। यहां उन्होंने सब जूनियर कैटिगिरी के 82.5 किलोग्राम भार वर्ग में उम्दा प्रदर्शन करते हुए सेकंड प्लेस पर जीत दर्ज की।  आयोजक यूपी पावर लिफ्टिंग Sसोसिएशन के पदाधिकारियों की ओर से दुर्गेश को सिल्वर मेडल पहनाकर पुरस्कृत किया गया।

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