बिटिया इन ऑफिस: पापा का साथ देने आईं बेटियां, बिजनेस को दी नई दिशा

Gwalior, Madhya Pradesh, India
  बिटिया इन ऑफिस: पापा का साथ देने आईं बेटियां, बिजनेस को दी नई दिशा

सदियों से यह परंपरा चली आ रही है कि पिता का  हाथ बटाने के लिए बेटे ही आगे आए हैं। उनके बिजनेस को उन्हीं ने संभाला है।

सदियों से यह परंपरा चली आ रही है कि पिता का  हाथ बटाने के लिए बेटे ही आगे आए हैं। उनके बिजनेस को उन्हीं ने संभाला है। समाज बेटियों से यह अपेक्षा नहीं रखता, लेकिन शहर की बेटियों ने इस परिपाटी को बदल कर रख दिया है। उन्होंने जब अपने पिता को उम्र के आधे पड़ाव में अकेले पाया, तो अपनी जॉब छोड़कर न खुद बिजनेस संभाला बल्कि अपने इनोवेटिव आइडियाज से उसे ग्रोथ भी दिलाई। हर बिजनेस में एक समय एेसा टर्न आता है, जब उसमें ब्रेक थ्रो पॉइंट की जरूरत होती है। एेसे में बेटियों ने कमान संभाली और बिजनेस को एक नई दिशा दी।


...और कर दी स्कूल की स्थापना
एमसीए के बाद मैं इंटनेशनल बिजनेस मैनेजमेंट का कोर्स करने दिल्ली गई। मैंने महिंद्रा हॉलीडे कंपनी में जॉब किया। अपने पापा (रमाशंकर सिंह चौहान) की हम तीन बेटियां ही हैं। उस समय मुझे यह फील हुआ कि मुझे पापा के सपने को पूरा करने में मदद करनी चाहिए। कहीं वह अकेले न पड़ जाएं। इसलिए मैं जॉब छोड़कर उनके यूनिवर्सिटी बनाने के सपने को पूरा करने ग्वालियर आ गई। यूनिवर्सिटी में धीरे-धीरे छात्र और कोर्स की संख्या बढ़ती गई। तभी मुझे लगा कि स्टूडेंट्स की क्वालिटी जो हमें मिल रही है, वह सही नहीं है। क्यों न हम इनकी शुरुआती नींव रखने के लिए स्कूल की स्थापना करें। तब मैंने पापा से बात की और आईटीएम ग्लोबल स्कूल की शुरुआत की।
रुचि सिंह चौहान, प्रो चांसलर, आईटीएम यूनिवर्सिटी


पैकेज छोड़कर संभाला बिजनेस
समय के साथ चीजें बदल रही हैं। हर एक चीज हाईटेक हो रही है। कॉम्पीटिशन के इस दौर में अपने आपको मार्केट में खड़ा रख पाना एक चैलेंज है। लगातार इनोवेशन करने वाला व्यक्ति ही मार्केट में स्थायी रह सकता है। दिल्ली में वेडिंग कंपनी में जॉब के दौरान मैंने पापा को कुछ निराश पाया। शायद उन्हें अब किसी सहारे की जरूरत थी। इस पर मैं 9 लाख पैकेज की जॉब छोड़कर ग्वालियर आ गई और पापा के वैवाहिक गार्डन को संभाला। यहां मैंने सबसे पहले मैनेजमेंट सिस्टम मजबूत किया। प्रोडक्शन संभाला। शादी में आने वाले खर्च को बैलेंस किया और ग्वालियराइट्स को कम रेट में मेट्रो सिटी की फैसिलिटी प्रोवाइड कराने पर फोकस रखा।
सलोनी खंडेलवाल, डायरेक्टर, वैवाहिक  गार्डन

पूरा सिस्टम किया चेंज
शहर में एेसी कई इंडस्ट्री हुईं, जो समय के साथ बदलाव नहीं कर पाईं और धराशायी हो गई हैं। इसके कारण लीडर के पीछे किसी हेल्पिंग हैंड का न होना व समय-समय पर बिजनेस में इनोवेशन न होना था। बांबे में जॉब के दौरान मैंने भी कुछ एेसा ही अपने पापा के साथ फील किया। तब मैंने जॉब के ऑफर को ठुकराकर  पापा के साथ बिजनेस संभालना उचित समझा। घर पर हम दो बहनें ही थे। ऑफिस में बैठी, तो बहुत सारी चीजें ट्रेडिशनल पैटर्न पर थीं। इस पर मैंने सबसे पहले पूरे सिस्टम को डिजिटिलाइज किया। इसके बाद मेट्रो सिटीज से कॉन्टेक्ट बढ़ाकर अपने पूरे काम को ऑनलाइन किया। आज हमारा बिजनेस ऑल ओवर इंडिया रन कर रहा है।
मृगना कुकरेजा,  डायरेक्टर, रियल स्टेट कंस्ट्रक्शन

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