धरोहरों से भरपूर है शहीदों का ये क्षेत्र, लेकिन खस्ताहाल हैं इनकी हालत

Gwalior, Madhya Pradesh, India
 धरोहरों से भरपूर है शहीदों का ये क्षेत्र, लेकिन खस्ताहाल हैं इनकी हालत

जिले में पुरातत्व महत्व की एक दर्जन इमारतों-धार्मिक स्थलों को पहचान की दरकार है। संरक्षण और जीर्णोद्धार के लिए बजट के आभाव में उक्त भवनों का अस्तित्व संकट में पड़ता जा रहा है।


ग्वालियर/भिण्ड। जिले में पुरातत्व महत्व की एक दर्जन इमारतों-धार्मिक स्थलों को पहचान की दरकार है। संरक्षण और जीर्णोद्धार के लिए बजट के आभाव में उक्त भवनों का अस्तित्व संकट में पड़ता जा रहा है।

इनमें से कई धामिक स्थलों को महाभारत काल से भी जोड़ कर देखा जा रहा है। पुरातत्व विभाग के अधिकारियों की माने तो भिण्ड के डेढ़ दर्जन से अधिक गंाव में पुरातत्व महत्व विरासतें बिखरी पड़ी हैं। खुदाई के दौरान भी उक्त विरासतों का महत्व सामने आ चुका है। पुरातत्व विभाग की ओर से प्रयास कि ए जाए तो इन इमारतों को सरंक्षण तो मिल ही सकता है, साथ ही पर्यटन के द्वार भी खुल सकते हैं।

" पांडवों ने कराया था पांडरी के शिवमंदिर का निर्माण "
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भिण्ड से 30 किमी दूर पांडरी गंाव के बाहर बने प्राचीन शिवमंदिर की पहचान भूत मंदिर के रूप मेंं है। स्थानीय लोगों का कहना कि उक्त मंदिर का निर्माण पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान करवाया था। मंदिर के सरंक्षण के लिए न तो पुरातत्व विभाग और न ही सरकार की ओर से कोई ध्यान दिया जा रहा है। मंदिर का  जीर्णोद्धार और व्यवस्थाएं पूर्णरूप से स्थानीय लोगों के भरोसे हैं।

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" औरंगजेब ने तोड़ा था पावई माता का मंदिर "
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जिला मुख्यालय से 25 किमी दूर पावई माता मंदिर का इतिहास करीब एक हजार साल पुराना है। भक्तमां की प्रतिमा को करौली मां की छोटी बहन के रूप में पूजते हैं। मुगल शासक औरंगजेब के हमले में मंदिर को तोड़ दिया गया था। परिसर में बिखरी खंडित मूर्तियां आज भी हमले की मूक गवाही दे रही हैं। नव दुर्गा के दौरान यहां पर विशाल मेला लगता है। भक्तों  मानना है कि श्रद्धाभाव से मांगी गई मनौती पूर्ण होती है।

" प्रतिहार राजाओं ने कराया था बौरेश्वर का निर्माण"
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जिला मुख्यालय से करीब 30 किमी दूर बौरेश्वर मंदिर का निर्माण 8वीं सदी में गुप्त काल में कराया गया था। मंदिर में स्थित शिवलिंग तीन फीट लंबी है और मोटाई 2.50 फीट। मंदिर के सामने 15 बीघा जमीन पर तलाब भी बना हुआ है। मंदिर की 450 बीघा जमीन 92 गंाव में फैली बताई जा रही है। बौरेश्वर मंदिर उत्तर नागरी शैली में बना हुआ है। महाशिवरात्रि पर्व पर यहां विशाल मेला लगता है। एक दर्जन से अधिक जिलों के भक्त भगवान शिव के दर्शन करने आते हैं। मंदिर को अभी तक पुरातत्व विभाग का संरक्षण नहीं मिला है।

ये भी लुभा सकतें हैं पर्यटकों को 
गोहद दुर्ग-दुर्ग का निर्माण जाट राजाओं ने कराया था। पुरातत्व विभाग ेके संरक्षण में आने के बाद भी यह पहचान को मोहताज है।

अटेर दुर्ग-दुर्ग का निर्माण 450 साल पहले भदावर राजाओं ने चंबल नदी के किनारे कराया था। पुरातत्व विभाग के संरक्षण में होने के बाद भी सुविधाओंं के आभाव में यह सैलानियों क ो लुभाने में सफल नहीं हो पा रहा है।

भिण्ड दुर्ग-दुर्ग का निर्माण भी भदावर राजाओं ने कराया था। किले के जीर्णोद्धार पर पुरातत्व विभाग दो साल पहले 70 लाख खर्च कर चुका है। इसके बाद भी कई हिस्से ध्वस्त हैं।

वनखंडेेश्वर मंदिर- मंदिर का निर्माण 1175 में पृथ्वीराज चौहान ने सिरसा गढ के राजा मलखान पर विजय प्राप्त करने के बाद कराया था। 

बरासो जैन मंदिर- मंदिर पर्यटन के महत्व का है। मान्यता है कि यहंा पर भगवान महावीर का आगमन हुआ था। इस स्थान पर जाने और ठहने की  कोई सुविधा नहीं हैं।

रेणुका मंदिर- मंदिर जमदारा के बारे में कहा जाता है कि यहां पर भगवान परशुराम की मां रेणुका ने तपस्या की थी। परशुराम ने पिता के आदेश पर उनका सिर काट दिया था। रेणुका की मंदिर में लेटी हुई प्रतिमा है।

रहकोला मंदिर- दबोह के अमहा गांव में मां रहकोला का मंदिर है। प्रतिमा की स्थापना 11 वींं सदी में सिरसा गढ के राजा मलखान  ने कराई थी।

मिहोना का सूर्य मंदिर-यह पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन सकता है। बरहद गांव के आसपास  भी पुरातत्व महत्व के खंडहर हैं।

पर्यटकों लुभा सकती है आलमपुर की छत्रियां 
जिला मुख्यालय से 90 किमी दूर आलमपुर की छत्रियों का निर्माण होल्कर काल में कराया गया था। निर्माण में संगमरमर का उपयोग किया किया गया है। होली के अवसर पर यहां पर कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। छत्रियों की देखभाल वर्तमान में ट्रस्ट की ओर से की जाती है। मरम्मत के लिए बजट न होने के कारण छत्रियों को सौंदर्य मिटता जा रहा है। पर्यटन विभाग ध्यान दे तो छत्रियां सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकती है।

प्रचीन काल में चंबल का यह क्षेत्र काफी विकसित रहा है। पुरातत्व महत्व के कई मंदिर और इमारते पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकती हैं। खुदाई के दौरान कई स्थानों पर महाभारत कालीन खंडहर मिलें है।
वीरंद्र कुमार, पांडेय जिला पुरातत्व अधिकारी भिण्ड

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