'लिटरेचर को खेमों से बाहर निकलना होगा'

New Delhi, Delhi, India
'लिटरेचर को खेमों से बाहर निकलना होगा'

रंजीत वर्मा प्रतिरोधी धारा के गंभीर कवि हैं। वह ‘हाशिए के साहित्य’ के हिमायती हैं। उनका मानना है कि वर्तमान भारतीय साहित्य सत्ता के गलियारे के इर्द-गिर्द घूम रहा है, उसे वहां से निकालकर जन-जन तक ले जाना होगा। अपने इस मकसद को मूर्त रूप देने के लिए उन्होंने एक प्लेटफॉर्म तैयार किया है, जिसके तहत वह देश के कोने-कोने तक प्रतिरोधी साहित्य को लेकर जाएंगे। 

मज्कूर आलम
रंजीत वर्मा प्रतिरोधी धारा के गंभीर कवि हैं। वह ‘हाशिए के साहित्य’ के हिमायती हैं। उनका मानना है कि वर्तमान भारतीय साहित्य सत्ता के गलियारे के इर्द-गिर्द घूम रहा है, उसे वहां से निकालकर जन-जन तक ले जाना होगा। अपने इस मकसद को मूर्त रूप देने के लिए उन्होंने एक प्लेटफॉर्म तैयार किया है, जिसके तहत वह देश के कोने-कोने तक प्रतिरोधी साहित्य को लेकर जाएंगे। 

आप पूरे हिंदी साहित्य को किस तरह से देखते हैं?
 मुझे लगता है कि हिंदी साहित्य पर हमेशा से एक वर्ग ने अपना कब्जा जमाए रखा है। हिंदी साहित्य के इतिहास की यह आमफहम घटना है, जहां हम देखते हैं कि जरूरतमंद करोड़ों लोगों को साहित्य के आसपास भी फटकने नहीं दिया जाता। वे तो वैसी रचनाओं को भी बाहर का रास्ता दिखा देते हैं, जो मेहनतकशों की बस्तियों की तरफ निकल पड़ती है। यह सब वे साहित्य की शुचिता के नाम पर करते है, जबकि उनका असल मकसद कला और अभिव्यक्ति की दुनिया में अपना वर्चस्व बनाए रखना होता है। 

प्रतिरोध की कविता को साहित्य में कभी वह स्थान नहीं दिया गया जो किसी भी साहित्यिक वाद, जैसे छायावाद, प्रतीकवाद, प्रयोगवाद, अकवितावाद आदि इत्यादि में समा जाने वाले कवियों की खराब कविताओं को भी प्राप्त है। फिर यह सवाल भी दिमाग को मथता है कि एक कवि की तीस, चालीस या पचास साल के अंतराल में लिखी गई तमाम कविताएं क्या एक ही साहित्यिक वाद के अंतर्गत आ सकती हैं? आप ही बताएं क्या निराला पूरे के पूरे छायावादी हैं? क्या धूमिल को पूरा का पूरा अकवितावाद का कवि माना जा सकता है? मुक्तिबोध, नागार्जुन, त्रिलोचन, शमशेर या रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना किस साहित्यिक वाद के कवि थे? 

यह तो तय है कि विशुद्ध साहित्यिक वाद में अंटने वाले कवि ये नहीं हैं। खैर, वे इस प्रतिरोध को किसी वाद का नाम दें या नहीं लेकिन पिछले पचास साल से कविता का मुख्य स्वर राजनैतिक चेतना से लैस जनपक्षधर कविताओं का ही रहा है। भले ही इस दौरान जनपक्षधरता के स्वर को दबा देने की भरपूर कोशिश की जाती रही हो, उसे दबा देना सत्ता या साहित्य के किसी भी मठाधीश के लिए संभव नहीं रहा। फिर भी जाहिर है कि कोशिश उनकी जारी रहेगी क्योंकि प्रतिरोध को वे एक साजिश के तहत नकारते हैं। 



साहित्य को तो वैसे भी प्रतिरोध के स्वर के तौर पर ही देखा जाता है। फिर ऐसा वे क्योंकर करेंगे?
दरअसल, प्रतिरोध की आवाज को नकार कर हमीं में से कुछ लोग सत्ता के प्रति अपनी वफादारी निभाते हैं। सत्ता प्रतिष्ठानों को तब ऐसी रचनाओं से बचने में बहुत मदद मिलती है। उन्हें रचनाओं में पूछे गए सवाल का जवाब देना भी जरूरी नहीं लगता, क्योंकि वैसी रचनाओं की तो साहित्य के अंदर ही कोई मान्यता ही नहीं है।

अगर ऐसा है तो फिर ऐसे लोग क्यों परेशान रहते हैं? 
वे नहीं, परेशान तो लेखन खुद हो जाता है उनकी जकड़बंदी से। उसे अपनी ताकत का बड़ा हिस्सा साहित्य के अंदर खुद को साबित करने में झोंक देना पड़ता है। मुक्तिबोध की कविताएं इसका उदाहरण हैं। दूसरी ओर साजिश रचने वाले अपने इस कुकर्म के एवज में सत्ता से हमेशा कुछ न कुछ न कुछ पाने की स्थिति में होते हैं। 

इस जकड़बंदी से साहित्य को बाहर निकालने का फिर क्या उपाय है?    
बहुत सही सवाल है यह। अब समय आ गया है कि कविता की इस मुहिम को राजधानियों और शहरों से निकाल कर दूर-दराज के इलाकों और वहां की जिंदगानियों के बीच ले जाया जाए। यह कोई आसान काम नहीं है, इसके बावजूद साहित्यकारों को यह काम करना होगा। इसलिए हमने एक प्लेटफॉर्म ‘जुटान’ बनाया है। इस प्लेटफॉर्म  के तहत 25 अप्रेल को हम देशभर के प्रतिरोधी स्वर वाले साहित्यकारों को एक मंच पर लाएंगे और कार्यक्रमों की बदौलत देश के कोने-कोने तक जाएंगे। हमारे दूसरे प्रोग्राम की तारीख भी तय हो गई है, वह हम मई में करने जा रहे हैं। वहां से छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में जाएंगे। यह सिलसिला जारी रहेगा। मैं मानता हूं कि इसमें जोखिम बहुत है, खर्च भी बहुत है और हमारे पास संसाधन नहीं है, लेकिन हमें यह जोखिम उठाना ही होगा। 

आखिर इस तरह के किसी मुहिम की आपको जरूर क्यों पड़ी?
देखिए, सत्ता को सेलिब्रिटी चाहिए। वह उन्हें तैयार भी करती है और बचाती भी है। उसे हर क्षेत्र से सेलिब्रिटी चाहिए। खिलाड़ी और अभिनेता से लेकर लेखक-कवि तक। इन दिनों साहित्य में सेलेब्रिटी बनाने का काम जोर-शोर से चल रहा है। बड़ी राशियों वाले पुरस्कारों की घोषणाएं और साहित्यिक उत्सवों में भारी खर्च जो इधर देखने को मिल रहा है, उसके पीछे सरकार की यही मंशा काम कर रही है। वह सबको बांट देना चाती है। सरकार चाहती है कि अब लेखक-कवि भी उसके संरक्षण में रहें। ऐसे में साहित्यकार तो सेलिब्रिटी जरूर बन जाएंगे, लेकिन साहित्य मर जाएगा। इसलिए ऐसे प्रतिरोधी स्वरों को एक मंच पर लाना बेहद जरूरी है। 

सबको  बांट देना चाहती हैं से आपका क्या अर्थ है?
आपने देखा होगा आजकल दलित साहित्य, स्त्री साहित्य की बड़ी चर्चा है। इसका क्या मतलब है। दलित साहित्य भारतीय साहित्य से बाहर की कोई धारा है क्या? अगर ऐसा है तो हिंदी-उर्दू या फिर अन्य भाषाओं का साहित्य क्या है? ये सब बांटकर अलग-अलग कर देने की कोशिश ही तो है? जैसे कोई कहता है कि अमुक दलित लेखक श्रेष्ठ है तो इसका सीधा मतलब यही निकलता है कि वह दलित लेखकों में श्रेष्ठ हैं। हिंदी साहित्य के लेखकों में नहीं। यहीं उनकी सीमा तय कर दी जाती है। जबकि होना यह चाहिए कि आप जिस भाषा में लिखते हैं, आपको उस भाषा का श्रेष्ठ लेखक होना है। इसलिए दलित-स्त्री लेखक आदि के बजाय उस भाषा का लेखक कहा जाना चाहिए। 

नए लेखकों से आपकी क्या उम्मीद है?
आज की तारीख में रचनाकारों का सबसे बड़ा दायित्व है कि वह लोगों को बताए कि वे आपस के सारे भेदभाव भूलकर एकजुट हों जाएं, क्योंकि ये सारे भेदभाव थोपे हुए हैं। वह यह बात दिमाग में बैठा लें कि सिर्फ हिंदी साहित्य हिंदुस्तानी साहित्य नहीं है। सभी भारतीय भाषा का लेखन भारतीय है, खासकर उर्दू और हिंदी, क्योंकि ये दोनों भाषाएं पूरे देश को जोड़ती हैं। जब तक ये दोनों नदियों की तरह मिल कर नहीं बहेंगी, न हम साहित्य के भीतर की अपनी लडा़ई जीत सकते हैं और न बाहर की। 

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