सरकार के साथ संतों को भी करना होगी जनहित की चिंता: मुनि प्रज्ञा सागर

Indore, Madhya Pradesh, India
सरकार के साथ संतों को भी करना होगी जनहित की चिंता: मुनि प्रज्ञा सागर

पत्रिका से खास बातचीत में मुनि प्रज्ञा सागर ने कहा नोटबंदी से धर्म बेअसर, संतों का करना होगी जनहित की चिंता। 

इंदौर. नई पीढ़ी को संस्कारों का पाठ नहीं पढ़ाया तो आने वाला समय भयावह होगा। जनहित में चिंतन की जिम्मेदारी सरकार के साथ संत की भी है। नोटंबदी का असर जैन समाज के कार्यक्रमों पर नहीं हुआ है। पत्रिका से विशेष चर्चा में यह बातें मुनि प्रज्ञा सागर ने कही।

प्र. भौतिकवाद के समय में युवा में सबसे अधिक किस बात की जरूरत है?
उ. वर्तमान समय में नई पीढ़ी को संस्कारों का पाठ पढ़ाना जरूरी है। इसके लिए हटकर सोचना होगा।

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प्र. संस्कार के लिए शिक्षा पद्धति कितनी जिम्मेदार है?
उ. शिक्षा से ही संस्कार मिलते हैं। आज की शिक्षा ऐसी है कि बेटा अपने माता-पिता को ही नहीं पूछता। शिक्षा संस्कार के साथ होना चाहिए।

प्र. जनहित में सोचने का काम किसका है?
उ. जनहित में सोचने का जिम्मा सिर्फ सरकार ने नहीं लिया है। अब संतों को भी इस बारे चिंतन करना होगा। समाज के लिए जब तक संत नहीं सोचेगा तब तक देश आगे नहीं बढ़ेगा। 

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प्र.सोच में परिवर्तन लाने के लिए संत को कैसे काम करना चाहिए?
उ. हमने दुर्घटनाओं में कमी लाने के लिए गाड़ी चलाते वक्त मोबाइल पर बात करने का त्याग का संकल्प दिलाने की शुरुआत की है। एक वर्ष में 12 हजार लोगों से संकल्प दिलवाएंगे। संत की बात युवा अधिक मानते हैं।




प्र.  नोटबंदी का असर क्या होगा?
उ.नोटबंदी का कोई असर नहीं है। ऐसा होता तो जैन समाज के कार्यक्रम कैंसल हो जाते। महिलाओं ने जो पैसा बचाया है, उसे कालाधन नहीं कहा जा सकता है।

प्र.  स्वच्छता अभियान को किस तरह देखते हैं?
उ. स्वच्छता अभियान एक सकारात्मक सोच है। जब तक सोच नहीं बदलेगी तब तक परिवर्तन संभव नहीं है।

प्र.  समाज के लिए कोई नई योजना शुरू की है?
उ. उज्जैन में नैकी की दीवार शुरू की है। उसमें चार लोग कपड़े धोने के साथ पैंकिग कर जरूरतमंदों को देते हैं। सवा लाख में शादी की योजना भी है। वर-वधु पक्ष के 250 लोग ही इसमें शामिल होते हैं। इससे पैसे की बर्बादी कम होती है।  

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