युद्ध में चीन को इस फौजी ने चटाई थी धूल, देश में नहीं मिल पा रहा हक

Kamal Singh

Publish: Feb, 17 2017 07:11:00 (IST)

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युद्ध में चीन को इस फौजी ने चटाई थी धूल, देश में नहीं मिल पा रहा हक

सरकार ने सैनिकों के कल्याण के लिए जमीन देने की घोषणा की थी, इसी आदेश का हवाला देकर नरसिंह ने जमीन की मांग की है।


इंदौर. 1962 में भारत ने चीन के साथ महत्वपूर्ण युद्ध लड़ा था। इस युद्ध के जाबांज फौजी नरसिंह गंगाराम बरसों बाद प्रशासन से अपना हक मांग रहे हैं।
दरअसल, आजादी के बाद मध्यप्रदेश शासन ने हर फौजी को 8 बीघा जमीन खेती के लिए पट्टे पर देने का फैसला किया था। 54 साल पुराने इसी आदेश का हवाला देकर नरसिंह ने जमीन की मांग की है। आजादी के बाद राज्य शासनों के सैनिकों को भारत सरकार ने अपनी सेना में शामिल कर लिया था। इस दौरान प्रदेश शासन ने फौजियों को पट्टे पर जमीन देने का फैसला किया था। इसी आदेश को आधार बनाकर कलेक्टर की अदालत में होलकर आर्मी और हैदराबाद फील्ड इन्फेंट्री के स्पेशल आरक्षक नरसिंह पिता गंगाराम ने आवेदन लगाया है।

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इंदौर रियासत के सैनिक
उनका कहना है कि मध्यप्रदेश शासन द्वारा 20 नवंबर 1963 से किए गए संशोधन अनुसार मध्यप्रदेश स्पेशल आम्र्ड फोर्स से रिटायर्ड फौजियों को 8 बीघा जमीन खेती के लिए पट्टे पर दी जाना है। नरसिंह का कहना है कि वे भूतपूर्व इंदौर रियासत में सैनिक थे और भारत स्वतंत्र होने के बाद उनकी सेवा स्पेशल आम्र्ड फोर्स में स्थानांतरित की गई। इसका प्राथमिक कार्यालय हैदराबाद फील्ड इन्फेंट्री में था। जिला पुलिस अधीक्षक इंदौर के अधीनस्थ प्रदेश शासन का सेवक मानकर 31 जनवरी 1980 को सेवानिवृत्त किया गया।  शासन के राजपत्र में हुए संशोधन की जानकारी नहीं थी जिसकी वजह से आवेदन पेश नहीं कर पाया।

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कईयों को मिली थी जमीन
उस समय कई फौजियों को जमीन मिली थी। नरसिंह के आवेदन को इंदौर तहसीलदार चरणजीतसिंह हुड्डा के पास जांच के लिए भेजा गया ताकि वे राजपत्र और बाद में उसके संशोधनों की जांच करें। उसके बाद तय होगा कि नरसिंह को जमीन मिल सकती है या नहीं?
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आसान नहीं है जमीन मिलना
गौरतलब है कि भूतपूर्व सैनिकों को सरकार ने पूर्व में जमीन दी थी लेकिन अब आवंटन करना आसान नहीं है। जिले में तेजी से हुई बसाहट और सरकारी योजनाओं के उपयोग में आने की वजह से जिला प्रशासन के पास ही बहुत कम जमीन है। सरकार समय पर योजना के लिए जमीनों की जानकारी मांगती है  लेकिन प्रशासन नहीं दे पाता।

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