यह आस लेकर जबलपुर आए थे स्वामी दयानंद, नहीं हो सकी थी पूरी

Premshankar Tiwari

Publish: Feb, 16 2017 02:09:00 (IST)

Jabalpur, Madhya Pradesh, India
यह आस लेकर जबलपुर आए थे स्वामी दयानंद, नहीं हो सकी थी पूरी

योग सिद्ध पुरुष की तलाश में खूब भटके थे नर्मदा तटों पर, आर्य समाज की स्थापना कर कुरीतियां की थीं खत्म

जबलपुर। आर्य समाज के संस्थापक के रूप में स्वामी दयानंद सरस्वती को पूरी दुनिया सम्मान के साथ याद करती है। उन्होंने पराधीन भारत में सनातन धर्म में पनप उठीं कई कुरीतियों, रीति-रिवाजों का जमकर विरोध किया था। भारत के आध्यात्मिक और धार्मिक पुनर्जागरण में स्वामी दयानंद का सबसे बड़ा योगदान था। सन्यास ग्रहण करने के पूर्व वे ज्ञान की चाह में देशभर में घूमे थे। इसी दौरान वे महाकौशल क्षेत्र भी आए और जबलपुर व आसपास के नर्मदा तटों पर खूब घूमे। हालांकि स्वामी दयानंद जो आस लेकर यहां आए थे वह पूरी नहीं हो सकी थी और वे यहां से निराश लौटे थे।

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घर से भाग कर घूमे यहां-वहां

स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म सन1825 में गुजरात के काठियावाड़ में हुआ था। उनके बचपन का नाम मूलजी दयाराम उर्फ मूलशंकर रखा गया था। उनके पिता बेहद धनी-मानी परिवार के थे, बड़े मालगुजार थे पर बचपन से ही मूलशंकर को भौतिकता की बजाए आध्यात्मिक और धार्मिक वातावरण लुभाता था। धर्म-कर्म, ज्ञान प्राप्ति की उनकी ऐसी चाहत देख परिवार चिंतित रहता था। ऐसे में उनके पिता ने मूलशंकर का विवाह कर देने का निर्णय ले लिया। बालक मूलशंकर को जब यह बात पता चली तो वे घर से भाग खड़े हुए। वे कई जगहों पर घूमते रहे तब किसी ने उन्हें सामला के प्रसिद्ध रामचंद्र मंदिर में योगी लालाभक्त से मिलने की सलाह दी। वे सामला पहुंचे और योगी लालाभक्त से योग विद्या सीखी। वहीं एक ब्रह्मचारी निर्मल चैतन्य से ब्रह्मचर्य की दीक्षा ली और उनका नाम अब शुद्ध चैतन्य ब्रह्मचारी हो गया। इसी दौरान घरवालों ने उन्हें पकड़ लिया और वापस घर ले आए पर वे मौका पाकर फिर भाग लिए।

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काशी से आए जबलपुर

शुद्ध चैतन्य ब्रह्म्मचारी अब ज्ञान की चाहत में काशी वेदांत सम्मेलन में भाग लेने पहुंचे। काशी में रहकर उन्होंने पौराणिक ग्रंथों का अध्ययन शुरु किया तभी उनकी वास्तविर्क ज्ञान में रुचि देख किसी ने उन्हें नर्मदा की ओर जाने की सलाह दी। वे नर्मदा की ओर आए। नर्मदा के उद्गमस्थल अमरकंटक तथा कोटितीर्थ, मार्केंडेय, भृगु, कपिल आश्रम सहित कई जगहों पर भटके पर उन्हें कहीं भी सिद्ध योगी पुरुष नहीं मिले। इस बीच व्यासाश्रम में हठयोगी कर्मानंद स्वामी ने शुद्ध चैतन्य ब्रह्मचारी को हठयोग की शिक्षा दी।  वहां से वे जबलपुर आए और इसके आसपास सिद्ध पुरुष की तलाश की पर उनकी यह आस पूरी नहीं हुई। 

चाणोद में बने दयानंद सरस्वती

नर्मदा तटों पर भटकते हुए वे चाणोद पहुंच गए। यहां स्वामी परमानंद परमहंस से उन्होंने वेदांतसार आदि की शिक्षा ली। स्वामी परमानंद की ही सलाह पर उन्होंंने सन्यास लेने का निश्चय किया। यहां सन्यास लेने के बाद ही उनका नाम स्वामी दयानंद सरस्वती हुआ।

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