छत्तीसगढ़ का खजुराहो है यह 11वीं शताब्दी का भोरमदेव मंदिर, खुबसूरती पर लगा ग्रहण

Ashish Gupta

Publish: Jul, 17 2017 07:35:00 (IST)

Kawardha, Chhattisgarh, India
छत्तीसगढ़ का खजुराहो है यह 11वीं शताब्दी का भोरमदेव मंदिर, खुबसूरती पर लगा ग्रहण

छत्तीसगढ़ के कबीरधाम ज़िले का नाम विदेशों तक ख्याति प्राप्त कर चुका है। इसका एक मुख्य कारण 11वीं शताब्दी का भोरमदेव मंदिर है, लेकिन अब यहां की खुबसूरती पर ग्रहण लगने लगा है।

कवर्धा. छत्तीसगढ़ के खजुराहो भोरमदेव मंदिर में पॉलीथीन के उपयोग पर कुछ वर्ष पूर्व प्रतिबंध लगाया गया था, लेकिन इसका असर अब दिखाई नहीं देता। मतलब स्थिति सुधारने में प्रशासन व प्रबंध समिति नाकाम रही।

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कबीरधाम का नाम विदेशों तक ख्याति प्राप्त कर चुका है। इसका एक मुख्य कारण 11वीं शताब्दी का भोरमदेव मंदिर है, लेकिन अब यहां की खुबसूरती पर ग्रहण लगने लगा है। मंदिर परिसर में पॉलीथीन के उपयोग पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा है। कुछ वर्ष पूर्व यह नियम पारित किया गया था, लेकिन यहां पालीथीन का उपयोग धड़ल्ले से किया जा रहा है।

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आदेश को सख्ती के साथ लागू करने की आवश्यकता है, लेकिन इस ओर कोई भी ध्यान नहीं दे रहे हैं। परिसर के साफ-सफाई की ओर न तो जिला प्रशासन ध्यान दे रहा है और न ही भोरमदेव प्रबंध समिति। यहां आने वाले लोग भी गंदगी को जहां का तहां छोड़ कर चले जाते हंै। सावन माह में हजारों की संख्या में श्रद्धालु भोरमदेव मंदिर पहुंच रहे हैं। भीड़ के अनुसार यहां की व्यवस्था उचित नहीं है। मंदिर समिति द्वारा भी इस ओर ध्यान नहीं दे रही है।

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पॉलीथिन में बेच रहे सामग्री
सफाई व्यवस्था को लेकर उचित प्रबंधन भोरमदेव मंदिर में दिखाई नहीं देता। मंदिर के आसपास बड़ी संख्या में दुकानें है, जहां से ही पॉलीथिन में ही नारियल, फूल, पत्ती, अगरबत्ती बेचा जाता है। इस पर रोक के लिए प्रशासन और प्रबंधन द्वारा कोई पहल नहीं की। इसके चलते ही आज भी पॉलीथिन का कचरा मंदिर परिसर में दिखाई देता है। इसके साथ ही यहां पहुंचने वाले श्रद्धालाओं को भी इस बात से अवगत कराना होगा, ताकि वह इसका पालन करें।

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