सतरेंगा मेें पर्याप्त पानी, फिर भी चला रहे जलग्रहण मिशन,फूंक रहे लाखों

Piyushkant Chaturvedi

Publish: Feb, 17 2017 10:24:00 (IST)

Korba, Chhattisgarh, India
सतरेंगा मेें पर्याप्त पानी, फिर भी चला रहे जलग्रहण मिशन,फूंक रहे लाखों

सतरेंगा में पर्याप्त पानी है। इतना पानी की आज तक यहां कभी सूखा नहीं पड़ा। जहां इतना पानी है, वहां नाबार्ड द्वारा जल ग्रहण मिशन जैसे प्रोजेक्ट पर लाखों रूपए फूंका जा रहा है।

कोरबा.  सतरेंगा में पर्याप्त पानी है। इतना पानी की आज तक यहां कभी सूखा नहीं पड़ा। जहां इतना पानी है, वहां नाबार्ड द्वारा जल ग्रहण मिशन जैसे प्रोजेक्ट पर लाखों रूपए फूंका जा रहा है।

नाबार्ड व एनजीओ ने जानबूझकर इस गांव को इसलिए चुना ताकि ज्यादा काम करना न पड़े। इसके बाद जो काम भी किया गया उसमें बड़े स्तर पर घोटाला किया गया है।
सबसे बड़ी बात एक भी किसानों को इससे लाभ नहीं मिला है।

एक तरफ नाबार्ड के अफसर पोड़ी के 1600 किसानों को जल ग्रहण मिशन कार्यक्रम का सब्जबाग दिखाकर कई साल से अपने पीछे दौड़ा रहे हैं, जहां पानी के लिए हर साल त्राहि-त्राहि मचती है।

उस जगह में नाबार्ड ने इतने साल से एक प्रोजेक्ट तक शुरू नहीं किया। वहीं कोरबा से 30 किलोमीटर दूर सतरेंगा जहां पानी अथाह मात्रा में है। आज तक इस गांव में कभी सूखा नहीं पड़ा।

उस गांव में नाबार्ड द्वारा एनजीओ जिजीविषा के माध्यम से जल ग्रहण मिशन कार्यक्रम चला रहा है। यह गांव तीन तरफ से जल स्रोतों से घिरा हुआ है और वहां पानी बचाने का खेल खेला जा रहा है।

जानबूझकर नाबार्ड के अफसरों व एनजीओ ने इसी गांव को चुना। ताकि कोई बड़ा काम न कराना पड़े। और ऐसा हुआ भी गांव में अगर इस मिशन के तहत हुए

कार्यों की तस्दीक भर की दी जाए तो जल ग्रहण मिशन की धज्जियां ही उड़ जाएंगी। खेत के मेड़ की ऊंचाई बढ़ाकर उसके चारों तरफ पत्थर रख दिए गए, और बन गए 20 छोटे पोखरी। जिन खेतों में हमेशा पानी रहता है।

बजट से लेकर खर्च तक सब में संदेह
 सतरेंगा जल ग्रहण विकास समिति के अध्यक्ष लच्छी सिंह ने बताया की इस योजना की शुरूआत के समय कुल बजट 92 लाख रूपए का रखा गया था।

इसमें काम के पूरा होने तक इसमें 49.50 लाख रूपए खर्च हुआ। इसमें पांच लाख रूपए अब तक नाबार्ड ने नहीं दिया है। जबकि शेष 53 लाख रूपए का क्या हुआ वह नहीं जानता। 

अहम बात यह है कि  जब 49.50 लाख रूपए खर्च होना बताया जा रहा है। जबकि 20 पोखरी खोदने में मुश्किल से 10 लाख रूपए।

घास लगाने में एक लाख, छोटे गड्ढे खोदने में 5 लाख तो जाली लगाने में 3 लाख से अधिक खर्च नहीं हुई। यह बात खुद लच्छी सिंह ने भी स्वीकारी।

कागजों में 45 लाख रूपए खर्च होना बताया जा रहा है। ग्रामीणों की मानें तो कार्यान्वयन में  व्यापक गड़बडी की गई है। 

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