'सूर्य नमस्कार' से होते हैं यह फ़ायदे , बस एक नमस्कार और देखें जीवन में चमत्कार !

Ritesh Singh

Publish: Jun, 20 2017 02:31:00 (IST)

Lucknow, Uttar Pradesh, India
'सूर्य नमस्कार' से होते हैं यह फ़ायदे , बस एक नमस्कार और देखें जीवन में चमत्कार !

सूर्य नमस्कार जिसको हो यह दिक़्क़त वो ना करें |

लखनऊ , सूर्य नमस्कार करने से हमारे जीवन में बहुत से बदलाव आते हैं जिसको आप खुद महसूस कर सकते हैं | सूर्य नमस्कार एक प्रकार का योग हैं जो आप के जीवन पर बहुत बड़ा प्रभाव डालता हैं | शरीर की बहुत ऐसी बीमारियां जो महंगी - महगी दवा से नहीं ठीक होती हैं वो इस Surya Namaskar के रोजाना प्रयोग से ठीक हो जाती हैं | ;बदलते समय के अनुसार बहुत ज्यादा बदलाव आया हैं और हम उसी बदलाव की वजह से अपने जीवन , रहन -सहन की क्रिया में पर ध्यान देना भूल जाते हैं और कई बड़ी बीमारियों के शिकार हो जाते हैओं |

योग दस हज़ार साल से भी बहुत पुराना हैं इसका वर्णन हमारे शास्त्रों में मौजूद हैं | पंडित शक्ति मिश्रा बताते हैंकि योग शब्द संस्कृत की युज से बना हैं | जिसका अर्थ होता हैं जोड़ना यानि की हमारे शरीर , मन , और आत्मा को एक ही धागे में बांध देना | यही होता हैं योग | योग से आप के शरीर में होने वाली दिक्कत सही होने लगती हैं और खुद को स्वस्थ महसूस करते हैं | Surya Namaskar को अपने जीवन में अपनाने से एक बदलाव होने लगता हैं रोज सूर्य नमस्कार को अपने जीवन में शामिल करें | और बदलाव खुद देखे |

Surya Namaskar  जिसको हो यह दिक़्क़त वो ना करें |

पंडित शक्ति मिश्रा ने बतायाकि प्रातःकाल उठ कर सूर्य के सामने बैठकर सूर्य नमस्कार करें | ऐसा करने से आप के अंदर ऊर्जा का प्रभाव बहुत ही तेजी  होगा |

> अगर आप की आँखो की रोशनी में दिक्कत हैं तो सूर्य को लगातार 10 मिनट तक रोज देखें आप की रोशनी ठीक हो जाएगी |

> उन्होंने कहाकि दोनों हाथों को जोड़कर सीधे खड़े हों जाऊ  । आँखो को बंद करें। ध्यान 'आज्ञा चक्र' पर केंद्रित करके 'सूर्य भगवान' का आह्वान 'ॐ मित्राय नमः' मंत्र के द्वारा करो ।

> सांस को भरते हुए दोनों हाथों को कानों से सटाते हुए ऊपर की ओर तानें तथा भुजाओं और गर्दन को पीछे की ओर झुकाएं। ध्यान को गर्दन के पीछे 'विशुद्धि चक्र' पर केन्द्रित करें।


> सांस को धीरे-धीरे बाहर निकालते हुए आगे की ओर झुकाउ । हाथ गर्दन के साथ, कानों से सटे हुए नीचे जाकर पैरों के दाएं-बाएं धरती को छुए । घुटने सीधे रहें। माथा घुटनों का स्पर्श करता हुआ ध्यान नाभि के पीछे 'मणिपूरक चक्र' पर केन्द्रित करते हुए कुछ क्षण इसी स्थिति में रुको ।

> कमर एवं रीढ़ के दोष वाले साधक न करें।


> इसी स्थिति में साँस को भरते हुए बाएं पैर को पीछे की ओर ले जाऊ । छाती को खींचकर आगे की ओर तानें। गर्दन को अधिक पीछे की ओर झुकाऊ । टांग तनी हुई सीधी पीछे की ओर खिंचाव और पैर का पंजा खड़ा हुआ। इस स्थिति में कुछ समय रुको । ध्यान को 'स्वाधिष्ठान' अथवा 'विशुद्धि चक्र' पर ले जाऊ । मुखाकृति सामान्य रखो ।

> साँस को धीरे-धीरे बाहर निकालते हुए दाएं पैर को भी पीछे ले जाऊ । दोनों पैरों की एड़ियां परस्पर मिली हुई हों। पीछे की ओर शरीर को खिंचाव दें और एड़ियों को पृथ्वी पर मिलाने का प्रयास करो । नितम्बों को अधिक से अधिक ऊपर उठाएं। गर्दन को नीचे झुकाकर ठोड़ी को कण्ठकूप में लगाए । ध्यान 'सहस्रार चक्र' पर केन्द्रित करने का अभ्यास करो ।


> साँस भरते हुए शरीर को पृथ्वी के समानांतर, सीधा साष्टांग दण्डवत करें और पहले घुटने, छाती और माथा ज़मीन पर लगा दो । नितम्बों को थोड़ा ऊपर उठा दें। श्वास छोड़ दें। ध्यान को 'अनाहत चक्र' पर टिका दो । श्वास की गति सामान्य करो ।

> इस स्थिति में धीरे-धीरे सांस  को भरते हुए छाती को आगे की ओर खींचते हुए हाथों को सीधे कर दें। गर्दन को पीछे की ओर ले जाऊ । घुटने पृथ्वी का स्पर्श करते हुए तथा पैरों के पंजे खड़े रहो । मूलाधार को खींचकर वहीं ध्यान को टिका दो ।


> सांस को धीरे-धीरे बाहर निष्कासित करते हुए दाएं पैर को भी पीछे ले जाऊ । दोनों पैरों की एड़ियां परस्पर मिली हुई हों। पीछे की ओर शरीर को खिंचाव दें और एड़ियों को पृथ्वी पर मिलाने का प्रयास करो । नितम्बों को अधिक से अधिक ऊपर उठाऊ । गर्दन को नीचे झुकाकर ठोड़ी को कण्ठकूप में लगाऊ । ध्यान 'सहस्रार चक्र' पर केन्द्रित करने का अभ्यास करो ।

>इसी स्थिति में सांस को भरते हुए बाएं पैर को पीछे की ओर ले जाऊ । छाती को खींचकर आगे की ओर तानो । गर्दन को अधिक पीछे की ओर झुकाउ । टांग तनी हुई सीधी पीछे की ओर खिंचाव और पैर का पंजा खड़ा हुआ। इस स्थिति में कुछ समय रुको । ध्यान को 'स्वाधिष्ठान' अथवा 'विशुद्धि चक्र' पर ले जाऊ । मुखाकृति सामान्य रखे ।

> तीसरी स्थिति में सांस  को धीरे-धीरे बाहर निकालते हुए आगे की ओर झुकाउ । हाथ गर्दन के साथ, कानों से सटे हुए नीचे जाकर पैरों के दाएं-बाएं पृथ्वी का स्पर्श करो । घुटने सीधे रहें। माथा घुटनों का स्पर्श करता हुआ ध्यान नाभि के पीछे 'मणिपूरक चक्र' पर केन्द्रित करते हुए कुछ क्षण इसी स्थिति में रुको ।

> कमर एवं रीढ़ के दोष वाले साधक न करें।

> सांस  भरते हुए दोनों हाथों को कानों से सटाते हुए ऊपर की ओर तानें तथा भुजाओं और गर्दन को पीछे की ओर झुकाऊ । ध्यान को गर्दन के पीछे 'विशुद्धि चक्र' पर केन्द्रित करो ।


> यह स्थिति - पहली स्थिति की भाँति रहेगी। Surya Namaskar को जीवन का एक हिस्सा बना के तो देखिये जीवन खुद बदल जायेगा |
 

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