ममता के साथ खड़े नजर नहीं आए अखिलेश, क्या थी गैरमौजूदगी की वजह... पढ़िए यहां

Kaushlendra Singh

Publish: Nov, 30 2016 02:53:00 (IST)

Lucknow, Uttar Pradesh, India
 ममता के साथ खड़े नजर नहीं आए अखिलेश, क्या थी गैरमौजूदगी की वजह... पढ़िए यहां

ममता से अखिलेश ने मुलाकात की, आशीर्वाद लिया लेकिन विरोध करने नहीं पहुंचे, आखिर क्यों?

- कौशलेन्द्र बिक्रम सिंह

लखनऊ।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने मंगलवार को नोटबंदी के खिलाफ लखनऊ से मोर्चा खोला। ममता ने यूपी की राजधानी के 1090 चौराहे से मोदी के फैसले के विरोध में आवाज बुलंद की। ममता की जनसभा में समाजवादी पार्टी के नेताओं ने काफी मेहनत की। ममता के साथ मंच पर कई समाजवादी नेता और मंत्री भी नजर आए लेकिन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कहीं नजर नहीं आए।

बताया जा रहा है कि जनसभा में सीएम अखिलेश यादव अपनी व्यस्तता और पहले से तय कार्यक्रमों के चलते शामिल नहीं हो सके। क्या सच में अखिलेश के न आने की केवल यही वजह रही होगी? ममता और अखिलेश की सोमवार को हुई मुलाकात बहुत आत्मीय भरी रही थी, ममता ने उन्हें सत्ता में वापसी का आशीर्वाद भी दिया लेकिन फिर अखिलेश मंच पर नजर क्यों नहीं आए, आइए कुछ प्रमुख कारणों पर डालें एक नजर...

Mamta banerjee and CM Akhilesh Yadav

नोटबंदी को जनसमर्थन


अखिलेश यादव की ममता के मंच पर नामौजूदगी की सबसे बड़ी वजह मोदी के नोटबंदी के फैसले को मिला जनसमर्थन भी हो सकता है। अखिलेश यादव पिछले दिनों से अपने कदम काफी फूंक-फूंक कर रख रहे हैं। नोटबंदी पर जनता पूरी तरह मोदी सरकार की तरफ है। लोग खुलकर बोल रहे हैं कि हमको तकलीफ हुई है लेकिन हम खुश हैं। ऐसे में अखिलेश नोटबंदी का खुलकर विरोध करते नजर नहीं आना चाहते होंगे।

ममता का बढ़ता कद

2017 के विधानसभा चुनावों से ज्यादा महत्वपूर्ण है 2019 का आम चुनाव। अधिकतर पार्टियां प्रचार भी उसी के मुताबिक करती नजर आ रही हैं। इसी जद में ममता का लखनऊ का दौरा भी आता है। विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी की कोई ठोस जमीन नहीं है, वे यहां लोकसभा चुनावों के मकसद ही आई नजर आती हैं। महागठबंधन के नेताओं में एक बार फिर आगे बढ़ने की होड़ लगी हुई है। साफ जाहिर है कि अखिलेश अपने पिता मुलायम सिंह यादव के सामने किसी अन्य को थोड़े ही देखना चाहेंगे।

गठबंधन पर विरोध

पिछले दिनों यूपी चुनाव की खातिर गठबंधन और महागठबंधन की तमाम चर्चाएं हुईं। अखिलेश ने इस मुद्दे पर अपना रुख साफ रखा वे अकेले चुनावी मैदान में जाना चाहते हैं। ऐसे में ममता के मंच से दूरी बनाकर शायद वे यह भी संदेश देना चाह रहे हों कि गठबंधन पर उनका रुख अभी भी अटल है।

भाजपा के लिए गुंजाइश

अब तक हुए चुनावी सर्वे भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी बताते रहे हैं। ऐसी उम्मीद की जा रही है कि उत्तर प्रदेश में एक बार फिर त्रिशंकु विधानसभा वापस आ सकती है। ऐसे में सरकार बनाने के लिए गठबंधन ही एकमात्र विकल्प रह जाएगा। ऐसे हालातों में हो सकता है कि अखिलेश किसी भी तरह का जोखिम न लेना चाह रहे हों और चुनाव बाद भाजपा के लिए गुंजाइश छोड़ रहे हों। अभी हाल ही में उन्होंने मोदी से दिल्ली में मुलाकात भी की थी।

अपनी साफ छवि बचाए रखने की कोशिश

नोटबंदी के पक्ष में आई जनता और भाजपा समर्थक नोटबंदी के फैसले का विरोध करने वालों को भ्रष्टाचारी और कालाधन रखने वाले के तौर पर देख रहे हैं। शायद इस वजह से भी अखिलेश खुलकर नोटबंदी के खिलाफ सामने नहीं आना चाहते हों। उनके इस प्रयास से जनता में उनकी अबतक बनी साफ-सुथरी छवि को कोई नुकसान नहीं होगा।

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